भाड़ में गया सिस्टम! जब टूटी आस तो आदिवासियों ने चंदा कर बनाया बच्चों का भविष्य
यह कहानी मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले की है। यहां के आदिवासियों का अब सरकारी दावों से भरोसा उठ गया है। नेताओं-अधिकारियों के वादों से जनता पूरी तरह परेशान हो चुकी थी। आखिरकार ग्रामीणों ने सिस्टम के भरोसे बैठना पूरी तरह छोड़ दिया।
समनापुर ब्लॉक के एक सुदूर गांव में अद्भुत नजारा दिखा। ग्रामीणों ने मिलकर अपने बच्चों के लिए खुद स्कूल बना डाला। अब यह ग्रामीण आसपास के गांवों के साथ ही प्रदेशभर में मिसाल के रूप में देखें जा रहे है।
तीन साल पहले तोड़ा था भवन
मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में एक आदिवासी गांव का स्कूल तीन साल पहले जर्जर घोषित होकर गिरा दिया गया था। प्रशासन ने नया भवन बनाने का वादा किया, लेकिन तीन साल तक कुछ नहीं हुआ। थककर गांव के करीब 100 परिवारों ने खुद स्कूल बनाने का फैसला किया। हर परिवार ने 500 रुपए का चंदा दिया और निर्माण सामग्री खरीदी गई। अब गांव के लोग खुद मजदूरी करके स्कूल भवन तैयार कर रहे हैं।
रुक गई थी बच्चों की पढ़ाई
समनापुर ब्लॉक के इस गांव में तीन साल से बच्चों की पढ़ाई अटकी हुई थी। स्कूल की इमारत टूटने के बाद बच्चों को पढ़ने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची थी। ग्रामीणों ने कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई। हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, काम कुछ नहीं हुआ।
तीन साल गुजर गए, मगर निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हुआ। गांव के बच्चे इस दौरान बिना ठीक जगह के पढ़ने को मजबूर रहे।
गांव ने खुद उठाया बीड़ा
जून महीने में गांव में एक आपात बैठक बुलाई गई। सभी ने मिलकर तय किया कि अब और इंतजार नहीं किया जाएगा। हर घर से 500 रुपए जुटाए गए ताकि सामान खरीदा जा सके। इसके बाद पुरुष, महिलाएं और बुजुर्ग तक निर्माण कार्य में जुट गए।
सोशल मीडिया पर इस काम के वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। इनमें ग्रामीण सीमेंट का मसाला तैयार करते नजर आते हैं। कुछ लोग ईंटें ढो रहे हैं तो कुछ नींव खोद रहे हैं। पूरा गांव इस काम में एकजुट दिख रहा है।
स्कूल भवन प्रशासन को करेंगे गिफ्ट
ग्रामीणों ने साफ कहा है कि यह कदम उनकी मजबूरी से उठा है। दर्जनों अर्जियां देने और कई बैठकें करने के बावजूद कुछ नहीं बदला। अब वे खुद स्कूल बनाकर इसे प्रशासन को सौंपने की तैयारी में हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि भवन बनने के बाद वहां शिक्षक भेजे जाएं।
अफसर ने मानी लाचारी
जिला परियोजना समन्वयक (DPC – District Project Coordinator) दिवाकर तिवारी ने ग्रामीणों के गुस्से को सही ठहराया है। उन्होंने स्वीकार किया कि स्कूल शिक्षा विभाग को अब तक पुनर्निर्माण के लिए जरूरी फंड नहीं मिला है। यह बयान बताता है कि देरी की जड़ में फंड की कमी है। हालांकि इससे ग्रामीणों की परेशानी कम नहीं होती।
यह घटना बताती है कि जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाएं कैसे अटक जाती हैं। साथ ही यह भी दिखाती है कि जरूरत पड़ने पर समुदाय खुद रास्ता निकाल सकता है। डिंडौरी के इस गांव की मेहनत अब कई और इलाकों के लिए मिसाल बन रही है।
यह खबरें भी पढ़ें...
एमपी सरकार ने फिर उठाया 3600 करोड़ रुपए का लोन, कुल देनदारी 5.6 लाख करोड़ पार
7430 करोड़ रुपए लगाकर एमपी में मछली पकड़ेगा कुवैत, एमओयू साइन
फर्जी रसीदें थमा किसानों से वसूल लिया लाखों का लगान, अब EOW के शिकंजे में पटवारी
एमपी में किसानों के लिए खुशखबरी: अन्नदाता को मिलेंगे 88 हजार करोड़ रुपए के लोन