मेदांता ग्रुप के एमडी कार्डियक सर्जन डॉ. नरेश त्रेहान इंदौर में गैर-इरादतन हत्या के केस से बाल-बाल बचे
विश्वप्रसिद्ध कार्डियोवस्कुलर और कार्डियोथोरेसिक (कार्डियक सर्जन) डॉ. नरेश त्रेहान इंदौर में बाल-बाल बच गए। वह देशभर में मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल (medanta super specialty hospital) का संचालन करने वाली ग्लोबल हेल्थ प्रा. लि. कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।
इंदौर में एक महिला की मौत के मामले में जिला कोर्ट ने उन पर गैर-इरादतन हत्या (आईपीसी धारा 304) के तहत केस दर्ज करने का आदेश दे दिया था।
आखिर में 78 वर्षीय डॉ. त्रेहान ने जिला कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा को उतारा, जिसके बाद उन्हें राहत मिली है।
यह था मामला
इंदौर के गिरीश मंगवानी की पत्नी एकता मंगवानी 23 जून 2022 को मेदांता अस्पताल, इंदौर में उपचार के लिए भर्ती हुई थीं। शाम सात बजे आईसीयू में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था।
इस पर पति ने आरोप लगाए और शिकायत की थी कि डॉक्टर पीयूष कानपुरी, डॉ. ज्योत वाधवानी, डॉ. निवेदिता बाली व अन्य ने इलाज में लापरवाही की।
इसमें सीएमएचओ ने जांच की और रिपोर्ट में भी आया कि संचालक, डॉक्टर और प्रबंधन की लापरवाही है। इसके बाद एमजीएम मेडिकल कॉलेज के सीईओ व डीन डॉ. लोकेंद्र रैकवाल, डॉ. अभिषेक राठौर व डॉ. एडी भटनागर की संयुक्त जांच समिति बनाई गई। इसकी 25 अगस्त 2023 की जांच रिपोर्ट में भी उपचार में देरी होना पाया गया। पुलिस में शिकायत की गई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
जिला कोर्ट ने दिए थे केस दर्ज करने के आदेश
इसके बाद मंगवानी ने जिला कोर्ट में परिवाद दायर किया। इसमें विजयनगर थाने से रिपोर्ट बुलाई गई। जून 2025 में डॉ. पीयूष कानपुरी और मेदांता अस्पताल के प्रबंधन की लापरवाही की बात कही गई।
इसके बाद एक दिसंबर 2025 को जिला कोर्ट की न्यायिक मजिस्ट्रेट निर्मला वास्कले ने डॉ. नरेश त्रेहान के साथ ही उपचार करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या की धारा 304 व 34 के तहत केस दर्ज करने के आदेश दे दिए।
डॉ. त्रेहान ने जिला कोर्ट में रखे यह तर्क
मेदांता ग्रुप के एमडी डॉ. त्रेहान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा और अधिवक्ता मनु माहेश्वरी ने पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। इसमें तर्क दिए गए कि डॉ. त्रेहान कंपनी के एमडी हैं, जो देशभर में कई अस्पतालों का संचालन कर रही है। उनका दैनिक कार्यों से कोई वास्ता नहीं होता है।
उन्होंने खुद महिला का उपचार नहीं किया और जो उपचार हुआ वह भी सही था। जब यह घटना हुई, तब वह देश में भी नहीं थे और न ही किसी जांच रिपोर्ट में उनका नाम आया है, बल्कि उन्हें प्रताड़ित करने और धन वसूली के लिए उनका नाम जोड़ा गया है।
साथ ही कहा गया कि वह कार्डियोथोरेसिक और कार्डियोवस्कुलर सर्जन के तौर पर 48 हजार से ज्यादा सर्जरी कर चुके हैं। साथ ही, वर्ष 1991 में पद्मश्री तथा वर्ष 2001 में पद्म भूषण सहित कई अवार्ड्स से सम्मानित हैं।
जिला कोर्ट का नया आदेश
सभी तर्क सुनने के बाद तेरहवें अपर सत्र न्यायाधीश अयाज मोहम्मद ने न्यायाधीश निर्मला वास्कले के एक दिसंबर 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। आदेश में कहा गया कि यह सिविल केस हो सकता है, आपराधिक नहीं। इसकी पुलिस जांच की जरूरत नहीं है।
साथ ही उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का पिछला आदेश वैध और तर्कसंगत नहीं है। इससे देश की चिकित्सा ख्याति प्रभावित होगी। कोर्ट द्वारा ऐसी धारा में केस दर्ज करने का आदेश देना, जिसमें आजीवन कारावास का दंड है, उचित नहीं है।
पहले कोर्ट में कैसे हुआ था एफआईआर का आदेश?
जिला कोर्ट में परिवादी मंगवानी की ओर से लगी याचिका पर पूर्व में जो एफआईआर का आदेश हुआ था, उसमें भी कई अहम बातें थीं। तब केस में मंगवानी की ओर से अधिवक्ता चंचल गुप्ता ने मजबूत तर्क रखे थे। इसमें कहा गया था कि परिवादी ने डॉक्टर से आकस्मिक निधन पर पोस्टमार्टम कराने की बात कही थी, लेकिन डॉक्टर ने लंबी कानूनी प्रक्रिया का हवाला देकर इसे टाल दिया।
इसमें डॉ. कानपुरी बीएचएमएस (होम्योपैथी डॉक्टर) थे, जिसके चलते वह मरीज की स्थिति में हृदय रोग के लक्षण नहीं समझ पाए। अस्पताल प्रबंधन ने स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं बुलाए, जिसके कारण उपचार में अनावश्यक विलंब हुआ।
न्यायिक मजिस्ट्रेट निर्मला वास्कले ने इन तर्कों को सही माना। इसके बाद, परिवाद मंजूर करते हुए उन्होंने एक दिसंबर 2025 तक आरोपियों के खिलाफ संबंधित टीआई को एफआईआर दर्ज कर जांच की अंतिम रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया।
डॉ. त्रेहान के हस्ताक्षर से हुई नियुक्ति
इस मामले में अधिवक्ता गुप्ता ने बताया कि पूर्व आदेश में डॉ. त्रेहान को इसलिए आरोपी बनाया गया था क्योंकि एमडी होने के नाते उनकी जिम्मेदारी बनती है। सबसे पहले, उपचार में लापरवाही करने वाले डॉ. कानपुरी (जो होम्योपैथी डॉक्टर हैं) की नियुक्ति उन्हीं के हस्ताक्षर से हुई थी।
ऐसे में वह इस लापरवाही से हुई मौत के लिए जिम्मेदार बनते हैं। डॉ. त्रेहान के हस्ताक्षर से 19 फरवरी 2018 को डॉ. पीयूष कानपुरी की नियुक्ति हुई थी। अस्पताल प्रबंधन द्वारा अपने डॉक्टर्स की उचित ट्रेनिंग नहीं की गई और न ही जिम्मेदार भर्तियां की गईं, जिसके कारण यह मौत हुई है।
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