प्रभार के सहारे चल रहा था डीआरटी जबलपुर, कई मामले लंबित, जज ही नहीं तो इंसाफ कैसे?

Neel Tiwari | May 09, 2026, 16:58 IST
drt jabalpur
जबलपुर स्थित ऋण वसूली अधिकरण (DRT) में स्थायी पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति न होने से 14 हजार 539 मामले लंबित हैं। जबलपुर DRT का कार्यप्रवाह प्रभावित हो रहा है और न्याय की उम्मीद लेकर आने वाले लोग खाली हाथ लौट रहे हैं।

News In Short

  • जबलपुर DRT में जनवरी 2026 तक 14 हजार 539 मामले लंबित।
  • लंबे समय से स्थायी Presiding Officer की नियुक्ति नहीं।
  • पहले DRT इलाहाबाद के पास था अतिरिक्त प्रभार।
  • इलाहाबाद के अधिकारी के इस्तीफे के बाद लखनऊ को मिला प्रभार।
  • अब लखनऊ DRT का पद भी खाली, सुनवाई व्यवस्था लगभग ठप।

News in Detail

जबलपुर स्थित ऋण वसूली अधिकरण (DRT) गंभीर प्रशासनिक संकट से गुजर रहा है। इसी साल जनवरी के आंकड़ों के अनुसार 14 हजार 539 से ज्यादा मामले लंबित हैं। लेकिन स्थायी पीठासीन अधिकारी नहीं है।



पहले इलाहाबाद DRT के पास प्रभार था, अब लखनऊ DRT को जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन वहां का पद भी खाली हो गया है। हजारों लोग अब सुनवाई और इंसाफ के इंतजार में हैं।



बिना स्थायी जज के चल रहा जबलपुर DRT

जबलपुर स्थित ऋण वसूली अधिकरण (DRT) इस समय भारी प्रशासनिक अव्यवस्था का सामना कर रहा है। हजारों करोड़ रुपये के बैंकिंग और वित्तीय विवादों की सुनवाई करने वाला यह महत्वपूर्ण संस्थान लंबे समय से स्थायी पीठासीन अधिकारी के बिना चल रहा है।



हालत यह है कि न्याय की उम्मीद लेकर आने वाले हजारों लोग अब सिर्फ तारीखों और इंतजार के सहारे रह गए हैं। जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार यहां कुल 14,539 मामले लंबित हैं, जो लगातार बढ़ते जा रहे हैं।



पहले इलाहाबाद के भरोसे चला

स्थिति की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि जबलपुर DRT का काम लंबे समय तक अतिरिक्त प्रभार के भरोसे चलता रहा। पहले यहां का प्रभार DRT इलाहाबाद के पीठासीन अधिकारी को सौंपा गया था। लेकिन उनके इस्तीफे के बाद व्यवस्था और ज्यादा कमजोर हो गई। इसके बाद जिम्मेदारी DRT लखनऊ को दी गई, ताकि जबलपुर में मामलों की सुनवाई किसी तरह जारी रह सके।



अब नया संकट यह खड़ा हो गया है कि लखनऊ DRT का पद भी रिक्त हो चुका है। यानी जिस अधिकारी के भरोसे जबलपुर की व्यवस्था चल रही थी, वहां भी स्थायी अधिकारी नहीं बचा। इसका सीधा असर हजारों लंबित मामलों पर पड़ रहा है और सुनवाई लगभग ठप जैसी स्थिति में पहुंच गई है।



हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

पीठासीन अधिकारी की अनुपलब्धता से परेशान होकर एक याचिकाकर्ता चंद्रकांता शर्मा को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ का दरवाजा खटखटाना पड़ा। उन्होंने अपनी लंबित याचिका SA No. 806/2023 के शीघ्र निराकरण की मांग की।



मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने केंद्र सरकार से उम्मीद जताई कि जल्द ही जबलपुर DRT में स्थायी पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति की जाएगी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जैसे ही नियुक्ति या नया प्रभार दिया जाए, उसके छह महीने के भीतर याचिकाकर्ता के मामले का निराकरण किया जाए।





हजारों मामलों पर पड़ा सीधा असर

DRT में लंबित मामलों में बैंक रिकवरी, संपत्ति कुर्की, वित्तीय विवाद और SARFAESI Act से जुड़े महत्वपूर्ण मामले शामिल हैं। ऐसे मामलों में देरी का असर सिर्फ बैंकों या कंपनियों पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों, व्यापारियों और गारंटरों पर भी पड़ता है। इन मामलों के लंबित रहते हुए सरकार को भी करोड़ों के राजस्व का घाटा हो रहा है।



स्थायी अधिकारी नहीं होने से नियमित सुनवाई प्रभावित हो रही है। कई मामलों में महीनों तक तारीख नहीं मिल पा रही। अधिवक्ता आयुष्मान दुबे ने भी कोर्ट में स्वीकार किया कि पीठासीन अधिकारी के अभाव में कार्यवाही प्रभावित हो रही है और मामलों का निराकरण समय पर नहीं हो पा रहा।



हर दिन बढ़ रहा लंबित मामलों का बोझ

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द नियुक्ति नहीं हुई तो लंबित मामलों का आंकड़ा और तेजी से बढ़ेगा। पहले ही 14 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं और नई फाइलें लगातार आ रही हैं। ऐसे में केवल “प्रभार व्यवस्था” के भरोसे इतने बड़े वित्तीय न्यायिक ढांचे को संभालना मुश्किल माना जा रहा है।



फिलहाल डीआरटी जबलपुर से जुड़े हजारों पक्षकारों की नजर अब केंद्र सरकार पर टिकी हुई है। लोगों को उम्मीद है कि जल्द स्थायी पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति होगी और लंबे समय से रुकी न्यायिक प्रक्रिया फिर पटरी पर लौट सकेगी।



क्या है डीआरटी?

ऋण वसूली अधिकरण (डीआरटी) 1993 में स्थापित एक विशेष न्यायालय है। इसका उद्देश्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों के ऋणों की वसूली में तेजी लाना है। यह न्यायालय ऋणों के विवादों को शीघ्र निपटाने के लिए कार्य करता है।



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