पर्यावरण मंजूरी पर नया विवाद : केंद्र बना रहा SAEIA, MP की SEIAA ने उठाए बड़े सवाल

Sanjay Dhiman | May 26, 2026, 11:22 IST
Photograph: (the sootr)
केंद्र सरकार पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया बदलने की तैयारी में है। नए SAEIA गठन पर एमपी की SEIAA ने आपत्ति जताई है। आरोप है कि यह बदलाव 237 विवादित पर्यावरण मंजूरियों में शामिल अधिकारियों को बचाने और अफसरशाही को ज्यादा ताकत देने के लिए लाया जा रहा है।

देश में पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। केंद्र सरकार अब राज्यों में नई स्थायी पर्यावरण संस्था बनाने की तैयारी कर रही है। इसका नाम स्थायी पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SAEIA यानी सैय्या) रखा गया है। यह नई संस्था जल्द पर्यावरण मंजूरी देने के लिए बनाई जा रही है। इस प्रस्ताव पर मध्यप्रदेश की स्टेट एनवायरोमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी यानी SEIAA ने गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। मामला अब प्रशासनिक सुधार से ज्यादा राजनीतिक और कानूनी टकराव में बदलता दिख रहा है।



क्या है केंद्र का नया SAEIA मॉडल?

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नया ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इस प्रस्ताव के तहत हर राज्य में स्थायी पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण(Sustainable Assessment Environment Impact Authority) बनाया जाएगा। इसे SAEIA यानी “सैय्या” नाम दिया गया है।



इस संस्था का नेतृत्व राज्य के पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव करेंगे। इसके साथ स्थायी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति भी बनाई जाएगी। सरकार का दावा है कि इससे पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया तेज होगी और प्रोजेक्ट अटकने की समस्या खत्म होगी।



केंद्र सरकार क्यों ला रही यह बदलाव?

केंद्र सरकार का कहना है कि कई राज्यों में SEIAA और State Level Expert Appraisal Committee(SEAC) का कार्यकाल समय पर खत्म हो जाता है। नई नियुक्तियां देरी से होती हैं। कई बार समितियां महीनों तक काम नहीं करतीं। इसका असर विकास परियोजनाओं पर पड़ता है।



सरकार के अनुसार फाइलें लंबे समय तक लटकती रहती थीं। निवेशकों का भरोसा कमजोर होता था। पर्यावरण मंजूरी मिलने में जरूरत से ज्यादा समय लग जाता था। इसी समस्या को खत्म करने के लिए स्थायी निकाय बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है।



MP की SEIAA ने क्यों उठाई आपत्ति?

मध्यप्रदेश की SEIAA ने केंद्र के इस प्रस्ताव को खतरनाक बताया है। SEIAA चेयरमैन ने केंद्र सरकार को भेजी आपत्ति में कहा कि यह संशोधन दोषी अधिकारियों को बचाने के लिए लाया गया है।



SEIAA का आरोप है कि मध्यप्रदेश में पहले ही 237 पर्यावरण अनुमतियां अवैध तरीके से जारी की गई थीं। इन मामलों में विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे थे। अब नया नियम लाकर उसी तरह के फैसलों को वैध बनाने की कोशिश की जा रही है।



237 पर्यावरण मंजूरियों पर क्या है विवाद?

पिछले साल मध्यप्रदेश में खनन परियोजनाओं से जुड़े 237 मामलों में डीम्ड EC जारी की गई थीं। आरोप है कि ये मंजूरियां SEIAA के एप्रेजल के बिना जारी हुईं।



उस समय पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत मोहन कोठारी थे। बाद में मामला सामने आने पर उन्हें विभाग से हटा दिया गया। इस पूरे विवाद के बाद सरकार और SEIAA के बीच टकराव खुलकर सामने आया।



अब मौजूदा ACS अशोक बर्णवाल और SEIAA चेयरमैन के बीच भी कानूनी वैधता को लेकर मतभेद बने हुए हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। वहां जनहित याचिका पर सुनवाई जारी है।



SEIAA को किस बात का सबसे ज्यादा डर?

SEIAA का कहना है कि नई व्यवस्था अफसरों को ज्यादा ताकत दे सकती है। यदि राज्य की समिति समय पर बैठक नहीं करेगी, तो मामला स्वतः स्थायी समिति के पास चला जाएगा।



आरोप यह भी लगाया गया कि अधिकारी जानबूझकर बैठकें टाल सकते हैं। इससे पूरी प्रक्रिया सीधे स्थायी प्राधिकरण के हाथ में चली जाएगी। SEIAA ने इसे संस्थाओं की स्वायत्तता खत्म करने वाला कदम बताया है।



नई व्यवस्था कैसे करेगी काम?

कार्यकाल खत्म होने पर

यदि SEIAA या SEAC का कार्यकाल खत्म हो जाएगा, तब स्थायी समिति सीधे काम संभालेगी। इससे मंजूरी प्रक्रिया रुकेगी नहीं।



120 दिन से ज्यादा देरी होने पर

यदि SEAC आवेदन मिलने के 120 दिनों तक मूल्यांकन नहीं करेगी, तब मामला स्वतः “परिवेश पोर्टल” से स्थायी समिति के पास ट्रांसफर हो जाएगा।



तकनीकी मूल्यांकन भी होगा

नई SCIEA समिति परियोजनाओं का तकनीकी मूल्यांकन करेगी। इसमें भी पदेन सदस्य शामिल रहेंगे।



राजनीतिक और प्रशासनिक असर भी संभव

यह मामला केवल पर्यावरण मंजूरी तक सीमित नहीं दिख रहा है। मध्यप्रदेश में पहले से चल रही अफसरशाही की खींचतान अब केंद्र बनाम राज्य संस्थाओं की बहस में बदलती दिखाई दे रही है। कई विशेषज्ञ इसे प्रशासनिक केंद्रीकरण का प्रयास भी मान रहे हैं।



वहीं सरकार का तर्क है कि विकास परियोजनाओं को समय पर मंजूरी देना जरूरी है। यदि प्रक्रिया महीनों तक अटकी रहेगी, तो निवेश और रोजगार दोनों प्रभावित होंगे। अब सबकी नजर केंद्र सरकार के अंतिम नोटिफिकेशन पर टिकी हुई है।



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