EOW पर हाईकोर्ट का जुर्माना, लगाई फटकार, समय पर जवाब न देना पड़ा महंगा

Neel Tiwari | Jun 18, 2026, 08:15 IST
Photograph: (the sootr)
जबलपुर हाईकोर्ट ने EOW पर समय पर जवाब न देने पर दस हजार रुपए जुर्माना लगाया। वकील ने व्यक्तिगत गलती मानी तो जुर्माना घटकर ₹2,000 हुआ। अब 6 जुलाई 2026 को अगली सुनवाई।

समझें क्या है पूरा मामला

  • हीरो केसवानी एवं अन्य की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।
  • 22 मई को कोर्ट ने EOW को जवाब दाखिल करने का समय दिया था।
  • निर्धारित समय के बावजूद EOW की ओर से जवाब पेश नहीं किया गया।
  • जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिन्द्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने ₹10,000 का जुर्माना लगाया।
  • EOW के अधिवक्ता ने मानी अपनी गलती, जुर्माना घटाकर किया गया 2,000 रूपए ।

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जबलपुर हाईकोर्ट ने समय पर जवाब दाखिल न करने पर EOW पर जुर्माना लगाया। बाद में एजेंसी के अधिवक्ता ने इसे अपनी व्यक्तिगत गलती बताते हुए जिम्मेदारी ली। अब सवाल यह है कि चूक सिर्फ वकील की थी या फिर एजेंसी की सुस्त व्यवस्था भी इसके लिए जिम्मेदार है?



हाईकोर्ट में EOW की कार्यप्रणाली पर उठे नए सवाल

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) पहले से ही अपनी जांचों की गति और मामलों में खात्मा रिपोर्ट पेश किए जाने को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रहा है। अब जबलपुर हाईकोर्ट में सामने आए एक मामले ने एजेंसी की आंतरिक कार्यप्रणाली और कोर्ट मामलों के प्रबंधन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थिति ऐसी बनी कि हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश के बावजूद समय पर जवाब दाखिल नहीं किया गया और मामला सीधे अदालत की नाराजगी का कारण बन गया।



कोर्ट ने कहा- आदेशों के प्रति गंभीर नहीं दिख रहा EOW

हीरो केसवानी एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पाया कि 22 मई 2026 को EOW को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया था। इसके बावजूद अगली सुनवाई पर भी जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया और एक बार फिर समय की मांग की गई। इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्थिति दर्शाती है कि EOW उच्च न्यायालय के आदेशों के प्रति गंभीर नहीं है। अदालत ने इसे हल्के में लेने योग्य नहीं माना और कड़ी नाराजगी व्यक्त की।



पहले लगा ₹10 हजार का जुर्माना, दोषी अधिकारी से वसूली के निर्देश

कोर्ट ने EOW को अंतिम अवसर देते हुए ₹10,000 की लागत लगाने का आदेश दिया। विशेष बात यह रही कि अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह राशि सार्वजनिक खजाने से नहीं बल्कि संबंधित दोषी अधिकारी से वसूल की जाएगी। इस टिप्पणी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने सीधे तौर पर जवाब दाखिल न होने की जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता पर जोर दिया।



अधिवक्ता ने ली जिम्मेदारी, तब मिली आंशिक राहत

सुनवाई के दौरान EOW की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ए. राजेश्वर राव ने कोर्ट को बताया कि वे पिछले आदेश की जानकारी एजेंसी तक नहीं पहुंचा सके थे। उन्होंने यह भी कहा कि लागत की राशि वे स्वयं जमा करेंगे और इसकी जिम्मेदारी एजेंसी पर नहीं डाली जानी चाहिए। अधिवक्ता की इस स्वीकारोक्ति के बाद खंडपीठ ने राहत देते हुए जुर्माने की राशि ₹10,000 से घटाकर ₹2,000 कर दी तथा इसे मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करने के निर्देश दिए।



आखिर गलती किसकी? अब यही सबसे बड़ा सवाल

हालांकि अदालत ने अधिवक्ता के अनुरोध पर जुर्माना कम कर दिया, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि वास्तव में आदेश की सूचना एजेंसी तक नहीं पहुंची तो यह न्यायिक मामलों की निगरानी व्यवस्था की गंभीर कमजोरी है। वहीं यदि एजेंसी ने स्वयं मामले को गंभीरता से नहीं लिया तो यह और भी चिंताजनक स्थिति है। ऐसे समय में जब EOW की कार्यशैली पहले से चर्चा में है, हाईकोर्ट की यह टिप्पणी और जुर्माने की कार्रवाई एजेंसी की जवाबदेही पर नई बहस को जन्म दे रही है।



जुलाई में होगी अगली सुनवाई

खंडपीठ ने EOW को अंतिम अवसर देते हुए मामले को 6 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं। अब देखना होगा कि अगली तारीख पर एजेंसी अपना जवाब प्रस्तुत करती है या नहीं, क्योंकि अदालत पहले ही यह स्पष्ट संकेत दे चुकी है कि आदेशों की अनदेखी को भविष्य में गंभीरता से देखा जाएगा।



FAQ

  1. EOW क्या है और यह क्या काम करती है?
    यानी आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ मध्यप्रदेश पुलिस की एक विशेष एजेंसी है। यह बड़े आर्थिक और वित्तीय अपराधों की जांच करती है। इसमें धोखाधड़ी, बैंक घोटाले और संपत्ति से जुड़े अपराध शामिल होते हैं।
  2. हाईकोर्ट ने EOW पर जुर्माना क्यों लगाया?
    EOW ने 22 मई 2026 को दिए गए हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी समय पर जवाब दाखिल नहीं किया। अगली सुनवाई में फिर से समय मांगा गया। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए ₹10,000 का जुर्माना लगाया।

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