प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण पर HC सख्त, केंद्र से MP सरकार तक पर लटकी अवमानना की तलवार

Neel Tiwari | Oct 30, 2026, 17:52 IST
मध्य प्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू नहीं होने पर हाई कोर्ट सख्त, 8 पक्षों को चार हफ्ते की मोहलत।
High Court takes a strict stance on EWS reservation in private medical colleges; threat of contempt proceedings looms over entities ranging from the Centre to the Madhya Pradesh government.
मध्य प्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू नहीं होने पर हाई कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार समेत सभी 8 पक्षों को चार हफ्ते का समय दिया है। साथ ही साफ चेतावनी दी है कि यदि आदेश का पालन नहीं हुआ, तो अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

इस पूरे मामले की शुरुआत अथर्व चतुर्वेदी की लड़ाई से हुई थी। अथर्व ने EWS आरक्षण का हक पाने के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से लेकर दिल्ली हाई कोर्ट तक खुद अपना पक्ष रखा। अब उनकी यह लड़ाई सिर्फ एक छात्र की नहीं, बल्कि उन सभी छात्रों के हक की लड़ाई बन गई है, जिन्हें निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण का फायदा नहीं मिल पा रहा है।



हैरानी की बात यह है कि चार साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। इसी मामले में शुक्रवार को जस्टिस विवेक अग्रवाल की स्पेशल डिवीजन बेंच ने केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार समेत संबंधित विभागों को साफ चेतावनी दी कि अब कोर्ट के आदेश का पालन तय समय में करना होगा।



बता दें कि अथर्व चतुर्वेदी ने मेडिकल कॉलेज में एडमिशन पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई खुद लड़ी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें मेडिकल कॉलेज में एडमिशन भी मिल गया। लेकिन अब यह लड़ाई सिर्फ अथर्व तक सीमित नहीं रही है। अब यह उन सभी EWS छात्रों के हक की लड़ाई बन गई है, जो निजी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन लेना चाहते हैं।



HC के पुराने आदेश का पालन नहीं, अब अवमानना की चेतावनी

हाई कोर्ट ने 17 दिसंबर 2024 को आदेश दिया था कि निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने के लिए सीटें बढ़ाई जाएं। कोर्ट ने इसके लिए ज्यादा से ज्यादा एक साल का समय दिया था। साथ ही कहा था कि कॉलेजों में मौजूद सुविधाओं और व्यवस्थाओं को ध्यान में रखकर सीटें बढ़ाई जाएं, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को भी आरक्षण का फायदा मिल सके।



लेकिन तय समय बीतने के बाद भी यह काम पूरा नहीं हुआ। इसी बात पर हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कहा कि अगले चार सप्ताह में पुराने आदेश का पालन किया जाए। ऐसा नहीं होने पर मामले में शामिल सभी 8 प्रतिवादियों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई की जाएगी।



इन आठ प्रतिवादियों को अवमानना की चेतावनी

केंद्र सरकार ने कहा, EWS आरक्षण देने पर कोई आपत्ति नहीं

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से वकील शर्मा और वरिष्ठ वकील अनूप नायर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े। केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने के लिए नियम और प्रक्रिया तय करना केंद्र और राज्य सरकार के अधिकार में है। इस मामले में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव की ओर से हलफनामा दाखिल करने की बात भी कही गई।



केंद्र सरकार ने यह भी साफ किया कि अगर मध्य प्रदेश सरकार निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने के लिए कोई नीति बनाती है, तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, इसके लिए तय नियमों का पालन करना होगा। साथ ही कॉलेजों में सीटें बढ़ाने के लिए संबंधित आयोग से मंजूरी भी लेनी होगी।



जज ने पूछा, SC-ST-OBC को आरक्षण तो EWS को क्यों नहीं?

सुनवाई के दौरान जस्टिस विवेक अग्रवाल ने एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जब निजी मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन के लिए काउंसलिंग राज्य या केंद्र सरकार के जरिए होती है, तो क्या वहां SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों को आरक्षण मिलता है? यदि इन वर्गों के छात्रों को आरक्षण का फायदा मिल रहा है, तो EWS वर्ग के छात्रों को इससे बाहर क्यों रखा गया है?



कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मामले में 10 दिन के अंदर हलफनामा दाखिल कर जवाब देने को कहा है। कोर्ट यह जानना चाहता है कि निजी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण की क्या व्यवस्था है और EWS वर्ग के छात्रों को इसका लाभ क्यों नहीं मिल रहा है।



सरकार के आदेश का हवाला देकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकते

सुनवाई के दौरान निजी मेडिकल कॉलेजों की ओर से कहा गया कि EWS आरक्षण लागू करने के लिए राज्य सरकार की नीति और निर्देश जरूरी हैं। इस पर जस्टिस विवेक अग्रवाल ने साफ कहा कि हाई कोर्ट इस मामले में पहले ही आदेश दे चुका है। ऐसे में कोई भी पक्ष यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह अपने स्तर पर कुछ नहीं कर सकता।



कोर्ट ने कहा कि यदि किसी को हाई कोर्ट के आदेश से परेशानी थी, तो उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा किए बिना आदेश का पालन करने से बचना सही नहीं है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि आदेश लागू नहीं करने के लिए इस तरह के बहाने स्वीकार नहीं किए जाएंगे।



एक छात्र का मामला नहीं, अब व्यापक जनहित का सवाल

सुनवाई के दौरान जब कोर्ट को बताया गया कि अथर्व चतुर्वेदी को पहले ही आरक्षण का लाभ मिल चुका है, तो जस्टिस विवेक अग्रवाल ने साफ कहा कि अब यह मामला सिर्फ अथर्व तक सीमित नहीं है। कोर्ट इसे बड़े जनहित के मुद्दे के तौर पर देख रहा है।



यानी अब बात सिर्फ अथर्व चतुर्वेदी को आरक्षण मिलने की नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के उन सभी EWS छात्रों की है, जो निजी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण के हकदार हैं। कोर्ट चाहता है कि ऐसे सभी छात्रों को बराबर मौका मिले। साथ ही यह भी तय हो कि निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने की जिम्मेदारी किसकी है और अब तक इस पर काम क्यों नहीं हुआ।



17 दिसंबर 2024 के आदेश में क्या कहा गया था?

इस पूरे मामले की शुरुआत हाई कोर्ट के 17 दिसंबर 2024 के आदेश से हुई थी। कोर्ट ने अपने आदेश के पैराग्राफ 29 में कहा था कि मध्य प्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने के लिए सीटें बढ़ाई जाएं। इसके लिए कॉलेजों में मौजूद सुविधाओं और व्यवस्थाओं को ध्यान में रखा जाए।



कोर्ट ने यह निर्देश केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की 29 जनवरी 2019 की अधिसूचना के खंड (C) के आधार पर दिया था। कोर्ट का मानना था कि EWS छात्रों को आरक्षण का फायदा देने के लिए मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।



इसके लिए पहले ज्यादा से ज्यादा दो साल का समय दिया गया था, लेकिन चार साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी यह काम पूरा नहीं हुआ। इसी वजह से हाई कोर्ट ने दिसंबर 2024 में आदेश दिया था कि अगले एक साल के अंदर सीटें बढ़ाने की प्रक्रिया पूरी की जाए। इसका मकसद था कि संविधान के अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत EWS वर्ग को मिलने वाले आरक्षण का लाभ निजी मेडिकल कॉलेजों के छात्रों तक भी पहुंच सके।



इन आठ प्रतिवादियों पर होगी अवमानना की कार्रवाई

हाई कोर्ट ने अपने आदेश के पालन की जिम्मेदारी केवल किसी एक विभाग पर नहीं छोड़ी है। इस मामले में कुल आठ प्रतिवादी हैं। कोर्ट की चेतावनी इन सभी पर लागू होती है।



  • मध्य प्रदेश शासन: सचिव, वल्लभ भवन, भोपाल।
  • चिकित्सा शिक्षा विभाग: सचिव, वल्लभ भवन, भोपाल।
  • तकनीकी शिक्षा, कौशल एवं प्रशिक्षण विभाग: सचिव, वल्लभ भवन, भोपाल।
  • आयुक्त/संचालक: तकनीकी शिक्षा, कौशल एवं प्रशिक्षण विभाग।
  • आयुक्त: लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग, सतपुड़ा भवन, भोपाल।
  • नेशनल मेडिकल कमीशन: सचिव, नई दिल्ली।
  • सुख सागर मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल: रजिस्ट्रार/डीन, चरगवां, जबलपुर।
  • भारत सरकार: सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, नई दिल्ली।

चार सप्ताह में क्या करेंगे केंद्र और राज्य सरकार?

इस सुनवाई में सबसे अहम बात यह रही कि अब केंद्र और राज्य सरकार को सिर्फ कोर्ट में जवाब नहीं देना है, बल्कि हाई कोर्ट के पुराने आदेश पर अमल भी करना है।



सुनवाई के दौरान शिक्षा विभाग को भी इस मामले में प्रतिवादी बनाने की मांग की गई थी। लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि यह केंद्र और राज्य सरकार से जुड़ा मामला है। दोनों सरकारें आपस में मिलकर इस पर काम करें।



केंद्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि उसे निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू करने पर कोई आपत्ति नहीं है। वहीं, निजी मेडिकल कॉलेजों का कहना है कि इसके लिए राज्य सरकार की नीति बनना और सीटें बढ़ाने की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।



ऐसे में अब मध्य प्रदेश सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। हाई कोर्ट ने चार सप्ताह का समय देकर साफ कर दिया है कि अब और देरी नहीं चलेगी। यदि इस दौरान पुराने आदेश का पालन नहीं हुआ, तो सभी आठ प्रतिवादियों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

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