रूस से डिग्री लेकर भारत में बेच रहा था पानी मिला कैंसर का इंजेक्शन, MP से निकला डॉक्टर का कनेक्शन
समझें क्या है पूरा मामला...
- दिल्ली पुलिस नेनकली कैंसर दवाओं काबड़ा रैकेट पकड़ा है।
- सात राज्यों में फैला यह कारोबार करीब 9 करोड़ रुपए का है।
- गिरफ्तार डॉक्टरमनीष शर्मा मूल रूप सेमध्य प्रदेश के भिंडका है।
- उसने रूस सेMBBS की पढ़ाई की, फिरमेडिकल परीक्षा मेंफेल हुआ।
- महंगेइंजेक्शन में कैंसर सेलड़ने वाला असली तत्वशून्य मिला।
कैंसर मरीजों की जिंदगी बचाने वाला इंजेक्शन असल में सिर्फ पानी निकला। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस खौफनाक रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इस पूरे खेल का मुख्य चेहरा मध्य प्रदेश के भिंड का एक डॉक्टर है। उसने रूस से मेडिकल की पढ़ाई की थी, लेकिन भारत में प्रैक्टिस की परीक्षा पास नहीं कर सका। इसके बाद वह नकली कैंसर दवाओं के काले कारोबार में उतर गया।
मध्य प्रदेश से शुरू हुआ सफर
गिरफ्तार आरोपी का नाम डॉक्टर मनीष शर्मा है। वह मूल रूप से मध्य प्रदेश के भिंड जिले का रहने वाला है। उसने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई ग्वालियर से पूरी की। इसके बाद वह MBBS करने के लिए रूस चला गया था। रूस से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 2014 में भारत लौट आया। भारत में डॉक्टर बनने के लिए एक जरूरी परीक्षा पास करनी होती है। मनीष ने इसके लिए कोचिंग भी ली, लेकिन वह परीक्षा पास नहीं कर सका।
अस्पताल से ऑनलाइन दवा कारोबार तक
परीक्षा में असफल होने के बाद मनीष ने फरीदाबाद के एक अस्पताल में काम शुरू किया। कुछ समय बाद उसने खुद का अस्पताल खोलने का फैसला किया। उसने फरीदाबाद की जवाहर कॉलोनी में KMC नाम से अस्पताल शुरू किया। साल 2023 में उसकी शादी डॉक्टर पारसी शुक्ला से हुई। इसके बाद दोनों ने हरियाणा के सोहना में इसी नाम से दूसरी ब्रांच भी खोली। अस्पताल में फ्रीलांस डॉक्टरों को काम पर रखा गया था। लेकिन आर्थिक दबाव के चलते करीब एक साल में दोनों अस्पताल बंद हो गए।
अस्पताल बंद होने के बाद मनीष ने रास्ता बदल लिया। उसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर फरीदाबाद में एक पॉलिक्लिनिक शुरू किया। इसी पते पर उसने एक फार्मास्युटिकल फर्म भी रजिस्टर कराई। इसके बाद उसने IndiaMART के जरिए दवाएं बेचना शुरू किया। पुलिस के मुताबिक, उसकी नजर कैंसर की दवाओं में मिलने वाले भारी मुनाफे पर गई। यहीं से नकली और मिलावटी कैंसर दवाओं का कारोबार शुरू हुआ।
इंजेक्शन में निकला सिर्फ पानी
दिल्ली के ब्लैक मार्केट में एवालुमैब इंजेक्शन करीब एक लाख रुपए में बिक रहा था। यह इंजेक्शन कैंसर मरीजों के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। जांच में इस इंजेक्शन की जर्मनी की मर्क लैब से टेस्टिंग कराई गई। रिपोर्ट में सामने आया कि इसमें कैंसर से लड़ने वाला असली तत्व बिल्कुल भी नहीं था। पुलिस के अनुसार राजस्थान सरकार की योजना के तहत मिलने वाली दवाएं भी कालाबाजारी में बेची गईं।
रीपैकिंग का खतरनाक खेल
पुलिस जांच में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। गिरोह असली दवा के खाली डिब्बे और कार्टन जमा करके रखता था। इसके बाद बैच नंबर और एमआरपी जैसी जानकारी केमिकल से मिटाई जाती थी। फिर थर्मोकोल बॉक्स, बबल रोल और टेप से नई पैकिंग तैयार होती थी। इसी नकली पैकिंग में असली जैसी दिखने वाली नकली दवाएं बेची जाती थीं। पुलिस को इस दौरान लेनदेन से जुड़े रजिस्टर और डायरी भी मिली हैं।
7 राज्यों में फैला था नेटवर्क
क्राइम ब्रांच ने 20 अगस्त को इस रैकेट का भंडाफोड़ किया। जांच में सामने आया कि यह कारोबार करीब नौ करोड़ रुपए का था। पुलिस ने अब तक कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया है। छापेमारी में 588 भरे हुए एंटी कैंसर वायल बरामद हुए। इसके अलावा छह खाली वायल और सात खाली दवा के बॉक्स भी मिले हैं।
पुलिस को दूसरी दवाओं की 3021 यूनिट और करीब 50 लाख रुपए नकद भी मिले हैं। इनमें डार्जालेक्स, इमफिंजी, एरबिटक्स और कीट्रूडा जैसी महंगी दवाएं शामिल थीं। यह नेटवर्क दिल्ली एनसीआर, मुंबई, हैदराबाद, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक फैला मिला है।
जांच कैसे शुरू हुई
पुलिस को 22 जून को इस रैकेट की गुप्त सूचना मिली थी। इसके बाद पूर्वी दिल्ली, रोहिणी और मुंबई में संदिग्ध ठिकाने चिन्हित किए गए था। वहीं, 11 जुलाई को ड्रग्स विभाग और स्थानीय पुलिस ने सात टीमों के साथ छापेमारी की थी। यह छापेमारी दिल्ली और नवी मुंबई में एक साथ की गई थी। इसके बाद पूछताछ और तलाशी के आधार पर आरोपी पकड़े गए हैं। मामले में 12 जुलाई को क्राइम ब्रांच थाने में एफआईआर दर्ज हुई थी।
तीन तरीकों से जुटाई जाती थीं दवाएं
पुलिस के मुताबिक, दवाएं तीन अलग तरीकों से इस सिंडिकेट तक पहुंचती थीं। पहला तरीका था गैरकानूनी स्रोतों से नकली दवाएं खरीदना। दूसरा तरीका अस्पतालों में रखी असली दवाओं की कथित हेराफेरी करना था। तीसरा तरीका सरकारी गोदामों से सप्लाई की दवाएं बाहर निकालना बताया गया है। इन दवाओं को बिना किसी वैध बिल और ड्रग लाइसेंस के घरों में रखा जाता था। इसके बाद बिचौलियों के जरिए इन्हें आगे बेचा जाता था।
अन्य आरोपियों की भूमिका
गिरफ्तार आरोपियों में लक्ष्मी नगर का अभिषेक वैश्य भी शामिल है। पुलिस के अनुसार वह 2022 से इस दवा कारोबार में सक्रिय था। उसके पास से चार लाख रुपए नकद बरामद हुए हैं। शुभम कुमार चौधरी नाम के आरोपी से 23 लाख रुपए मिले हैं। नोएडा के आनंद कुमार के पास से 337 एंटी कैंसर वायल बरामद हुए। फरीदाबाद के दीपक उर्फ रवि से 108 वायल और साढ़े छह लाख रुपए मिले हैं। गुरुग्राम के मयंक गर्ग के पास से भी 55 वायल जब्त की गईं है।
आगे की जांच जारी
पुलिस अब पूरे सप्लाई और पैसों के नेटवर्क की जांच कर रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह नकली दवाएं कितने समय से बिक रही थीं। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि इसमें और कौन कौन लोग शामिल थे। फिलहाल मनीष शर्मा पर लगे सभी आरोप जांच का हिस्सा हैं। उसकी दोषसिद्धि अदालत की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगी।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर सीधे कैंसर जैसे गंभीर मरीजों की जान और सेहत से जुड़ी है, जो हर नागरिक के जीवन के अधिकार से जुड़ा संवैधानिक मुद्दा है। नकली दवाओं का कारोबार स्वास्थ्य सुरक्षा और उपभोक्ता अधिकारों के खिलाफ गंभीर अपराध है, इसलिए इसे सामने लाना जरूरी है।
खबर में सभी आरोप जांच का हिस्सा बताए गए हैं और आरोपी का दोष अदालत की प्रक्रिया से ही तय होगा, जो निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत का पालन करता है। यह रिपोर्ट पुलिस के आधिकारिक बयान पर आधारित है और किसी की निजता का उल्लंघन नहीं करती। साथ ही यह आम लोगों को महंगी दवाओं की खरीद में सतर्क रहने की जरूरी चेतावनी भी देती है।
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