युद्ध का असर या सिस्टम का सुधार? अब ‘फार्मर आईडी’ से मिलेगी खाद, कीमतों पर भी बड़ा फैसला

Ramanand Tiwari | Apr 10, 2026, 23:23 IST
Photograph: (the sootr)
सरकार अब फार्मर आईडी से खाद वितरण का नया सिस्टम लागू करने जा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को उनकी जरूरत के मुताबिक और सही समय पर खाद उपलब्ध हो सके।

भले ही अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर हो गया हो, लेकिन उसका असर भारत तक महसूस होने लगा है। खासकर रासायनिक खाद को लेकर सरकार अब सतर्क हो गई है। किसानों को समय पर और सही मात्रा में खाद मिले, इसके लिए केंद्र सरकार नया सिस्टम ला रही है, जिसमें ‘फार्मर आईडी’ के आधार पर खाद दिया जाएगा।



खाद को लेकर सरकार क्यों बदली रणनीति?

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने कच्चे माल की सप्लाई और कीमतों को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर खाद उत्पादन पर पड़ सकता है। इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है। सरकार का फोकस अब सिर्फ सप्लाई बढ़ाने पर नहीं, बल्कि सही वितरण सुनिश्चित करने पर भी है।



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शिवराज सिंह चौहान का दावा- कीमतें नहीं बढ़ेंगी

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा है कि किसानों पर महंगाई का बोझ नहीं डाला जाएगा। उन्होंने बताया कि भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा माल महंगा हुआ है, लेकिन डीएपी और यूरिया के दाम फिलहाल नहीं बढ़ेंगे। इसके लिए सरकार ने 41 हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त सब्सिडी का इंतजाम किया है।



अब कैसे मिलेगा खाद? समझिए नया सिस्टम

सरकार अब खाद वितरण को पूरी तरह डेटा आधारित बनाने जा रही है। फार्मर आईडी के जरिए हर किसान की पूरी जानकारी रिकॉर्ड में होगी- जमीन, फसल और जरूरत तक। उसी के आधार पर तय होगा कि किस किसान को कितनी खाद मिलेगी।



मुख्य बदलाव

  • हर किसान के लिए यूनिक फार्मर आईडी जमीन और फसल के हिसाब से खाद का आवंटन
  • जरूरत के अनुसार अतिरिक्त उर्वरक की सुविधा
  • पूरे देश में अब तक 9.29 करोड़ आईडी तैयार
  • लक्ष्य: इसे बढ़ाकर 13 करोड़ तक करना

कालाबाजारी पर लगेगी लगाम?

सरकार का मानना है कि सब्सिडी वाला सस्ता खाद अक्सर इंडस्ट्री या ब्लैक मार्केट में चला जाता है। नया सिस्टम इस डायवर्जन को रोकने के लिए तैयार किया गया है, ताकि असली हकदार यानी किसान तक ही खाद पहुंचे।



आगे क्या असर पड़ेगा?

अगर यह सिस्टम सही तरीके से लागू होता है तो खाद की किल्लत और कालाबाजारी दोनों पर काबू पाया जा सकता है। हालांकि जमीन पर इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डेटा कितना सटीक है और सिस्टम कितना पारदर्शी बन पाता है।



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