केवल फतवे के आधार पर तलाक नहीं दे सकता मुस्लिम पति - हाईकोर्ट का अहम फैसला
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला..
- भोपाल की एक मसाजिद कमेटी ने पति के मामले में फतवा जारी किया था।
- पति चाहता था कि उसी फतवे के आधार पर तलाक मान लिया जाए।
- पत्नी ने कहा कि फतवा कानूनी तलाक नहीं होता।
- मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंचा।
- हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक का फैसला कानून करेगा, केवल फतवा नहीं।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने मुस्लिम निकाह (विवाह) और तलाक से जुड़े एक अहम मामले में बड़ी बात कही है। अदालत ने साफ किया कि केवल किसी फतवे के आधार पर पति-पत्नी का तलाक घोषित नहीं किया जा सकता। धार्मिक राय और कानूनी फैसला दोनों अलग हैं। इसलिए अदालत सिर्फ फतवे के भरोसे विवाह खत्म नहीं मान सकती।
फतवा क्या था और विवाद कैसे शुरू हुआ?
यह मामला भोपाल की दारुल-दफ़ा मसाजिद कमेटी से जुड़े एक फतवे का था। पति ने दावा किया कि इस फतवे के आधार पर उसका निकाह खत्म माना जाए। उसने अदालत से तलाक की घोषणा करने की मांग की। पत्नी ने इस मांग का विरोध किया और कहा कि फतवा केवल धार्मिक सलाह है। उससे शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं होती।
जस्टिस विवेक जैन ने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने पूरे फतवे का अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि उसमें कहीं भी निकाह खत्म होने की घोषणा नहीं है। फतवे में केवल इस्लामी ग्रंथों का उल्लेख किया गया है। उसमें पत्नी की कथित क्रूरता जैसी स्थिति पर धार्मिक मार्गदर्शन दिया गया है। इसलिए उसे कानूनी तलाक नहीं माना जा सकता।
कोई मदरसा या धार्मिक संस्था नहीं दिला सकता तलाक
हाईकोर्ट ने इस सवाल का भी साफ जवाब दिया। अदालत ने कहा कि कोई मदरसा, सेमिनरी या मसाजिद कमेटी किसी मुस्लिम पुरुष को कानूनी तलाक नहीं दे सकती। ऐसी संस्थाएं धार्मिक राय दे सकती हैं। लेकिन निकाह(विवाह) खत्म करने का अधिकार कानून के तहत सक्षम अदालत के पास रहता है।
पत्नी की ओर से अदालत में यह दी दलील
पत्नी ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। उसका कहना था कि मसाजिद कमेटी के पास तलाक देने का अधिकार नहीं है। उसने यह भी कहा कि फतवा केवल धार्मिक मार्गदर्शन देता है। उसका कानूनी असर नहीं होता। इसलिए पति का दावा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
पति की कानूनी गलतफहमी भी अदालत ने बताई
हाईकोर्ट ने कहा कि पति ने यह मुकदमा एक गलत समझ के कारण दायर किया। उसे लगा कि वह नियमित तलाक याचिका दाखिल नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पुरुष भी फैमिली कोर्ट में सामान्य तरीके से तलाक की याचिका दायर कर सकते हैं। कानून उन्हें ऐसा करने से नहीं रोकता।
Dissolution of Muslim Marriages Act पर क्या कहा?
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 का मतलब यह नहीं है कि पति अदालत नहीं जा सकता। यह कानून पति के अधिकार को खत्म नहीं करता। यदि पति तलाक चाहता है, तो वह कानून के अनुसार फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
आखिर कोर्ट ने याचिका पर क्या फैसला दिया?
हाईकोर्ट ने माना कि पति का दावा कानूनी आधार पर टिक नहीं सकता। इसलिए अदालत ने Order VII Rule 11 CPC के तहत वाद को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि पति चाहे तो नियमों के अनुसार नई तलाक याचिका दाखिल कर सकता है। उस पर कानून के मुताबिक सुनवाई होगी।
इस फैसले का बड़ा संदेश क्या है?
यह फैसला साफ करता है कि धार्मिक राय और कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग हैं। फतवा किसी व्यक्ति को धार्मिक सलाह दे सकता है। लेकिन उससे विवाह अपने आप खत्म नहीं होता। तलाक का अंतिम फैसला कानून और अदालत की प्रक्रिया से ही होगा। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में कानूनी स्थिति और स्पष्ट होगी।
यह खबरें भी पढ़ें...
पुलिस अफसरों पर केस रद्द,ग्वालियर हाईकोर्ट बोला आपराधिक कानून बदले का हथियार नहीं
12 साल बाद जागे शिक्षक को ग्वालियर हाईकोर्ट ने दिया बड़ा झटका, नई याचिका खारिज
ग्वालियर हाईकोर्ट: आईटी ऑपरेटर्स को विभागीय परीक्षा से बाहर करने वाला नियम निरस्त
ग्वालियर हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन से कहा, तीन माह के अंदर वसूल करें राशि