बिना कोर्ट डिक्री तलाक अमान्य, नोटरी समझौते से शादी खत्म नहीं होती
हिंदू विवाह कानून के तहत शादी सिर्फ एक कागज़ी करार नहीं है। इसे नोटरी के सामने दस्तखत करके खत्म नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने यह बात साफ कही। कोर्ट ने कहा, जब तक सक्षम अदालत तलाक की डिक्री नहीं देती, पहली शादी कानूनी रूप से वैध बनी रहती है। इसी आधार पर कोर्ट ने एक व्यक्ति की रिट अपील खारिज कर दी। यह व्यक्ति खुद को एक मृत महिला कर्मचारी का पति बता रहा था।
हाईकोर्ट ने कहा कि नोटरी से तलाक मान्य नहीं है। सुमन देवी नाम की महिला कर्मचारी का 2022 में निधन हुआ था। राम कृपाल सिंह ने खुद को उनका पति बताकर सेवा लाभों का दावा किया। विभाग ने पहले पति और बच्चों को ही वैध उत्तराधिकारी माना। हाईकोर्ट ने विभाग के फैसले को सही ठहराया।
क्या था पूरा विवाद
सुमन देवी आदिवासी विकास विभाग में चौकीदार के पद पर तैनात थीं। अगस्त 2022 में सेवाकाल के दौरान उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद विभाग के सामने एक नया दावा आया। राम कृपाल सिंह नाम के व्यक्ति ने खुद को सुमन देवी का पति बताया।
उन्होंने पेंशन, जीपीएफ और अन्य सेवा लाभों पर अपना हक जताया। लेकिन विभाग के पास पहले से एक अलग रिकॉर्ड मौजूद था। सर्विस रिकॉर्ड में सुमन देवी के पति के तौर पर कोक सिंह कुशवाह का नाम दर्ज था।
विभाग ने इसी रिकॉर्ड के आधार पर कोक सिंह कुशवाह और उनके बच्चों को वैध उत्तराधिकारी माना। राम कृपाल सिंह इस फैसले से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने पहले सिंगल बेंच का रुख किया। वहां भी उनकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने डबल बेंच में रिट अपील दाखिल की।
हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने इस अपील पर सुनवाई की। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी एक पवित्र संस्था मानी जाती है। इसे किसी नोटरी के सामने दस्तखत करके खत्म नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के लिए सक्षम न्यायालय से डिक्री लेना जरूरी है। जब तक ऐसी डिक्री नहीं मिलती, पहली शादी कानूनी रूप से बनी रहती है। इसका मतलब है कि निजी समझौते या नोटरी दस्तावेज़ से शादी को खत्म मानना गलत है।
इसी सिद्धांत के आधार पर कोर्ट ने राम कृपाल सिंह के दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि उनका सुमन देवी से वैध वैवाहिक संबंध साबित नहीं होता।
2004 का अहम दस्तावेज
मामले में एक पुराना दस्तावेज़ बेहद अहम साबित हुआ। साल 2004 में विभाग ने सुमन देवी से उनकी वैवाहिक स्थिति पर स्पष्टीकरण मांगा था। इसके जवाब में सुमन देवी ने खुद लिखित बयान दिया था।
उन्होंने साफ लिखा था कि उनके पति कोक सिंह कुशवाह हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि राम कृपाल सिंह से उनका कोई वैवाहिक या अन्य संबंध नहीं है। हाईकोर्ट ने इस दस्तावेज़ को अहम सबूत माना।
कोर्ट ने कहा कि जब खुद महिला ने अपने जीवनकाल में यह बात लिखित में दर्ज कराई हो, तो उसके बाद किए गए दावे को कमजोर माना जाएगा। इसी वजह से राम कृपाल सिंह का पक्ष कोर्ट में टिक नहीं पाया।
कोर्ट का अंतिम फैसला
ग्वालियर हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच के पहले के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने राम कृपाल सिंह की रिट अपील को खारिज कर दिया। इसके साथ ही विभाग का फैसला बरकरार रहा। पेंशन, जीपीएफ और अन्य सेवा लाभ कोक सिंह कुशवाह और उनके बच्चों को ही मिलेंगे।
यह फैसला हिंदू विवाह कानून से जुड़े कई भ्रमों को दूर करता है। खासतौर पर उन मामलों में जहां लोग निजी समझौतों को कानूनी तलाक मान लेते हैं। कोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया कि तलाक की प्रक्रिया केवल अदालत के जरिए ही पूरी होती है।
आम लोगों के लिए सीख
यह मामला आम लोगों के लिए भी एक जरूरी सबक है। कई बार लोग नोटरी के सामने कागज़ी समझौता करके यह मान लेते हैं कि उनकी शादी खत्म हो गई। लेकिन कानूनी तौर पर ऐसा नहीं होता।
अगर कोई भी व्यक्ति दूसरी शादी करना चाहता है, तो पहले उसे कोर्ट से विधिवत तलाक लेना जरूरी है। ऐसा न करने पर बाद में सेवा लाभ, संपत्ति या उत्तराधिकार जैसे मामलों में कानूनी दिक्कतें आ सकती हैं। इस फैसले से सरकारी विभागों को भी स्पष्ट दिशा मिलेगी कि सेवा लाभों का निर्धारण करते समय किन दस्तावेज़ों को आधार बनाया जाए।
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