फ्रीबीज की राजनीति: चुनावी कैश बांटकर देश का भविष्य गिरवी रख रही सरकारें
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- राज्य सरकारें चुनाव जीतने के लिए करोड़ों रुपए नकद बांट रही हैं।
- एक राज्य की एक कैश स्कीम का बजट इसरो के बजट से ज्यादा है।
- देश के 1.19 लाख स्कूलों में बिजली नहीं है, 98,000 में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं।
- इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने इस कैश बंटवारे को आर्थिक खतरा बताया है।
- सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि फ्रीबीज से देश का वेलफेयर और अर्थव्यवस्था दोनों खतरे में हैं।
फ्रीबीज की राजनीति और देश का भविष्य
चुनाव अब विचारों पर नहीं लड़े जाते। चुनाव अब ऑफर पर लड़े जाते हैं। कौन ज्यादा कैश देगा, कौन मुफ्त बिजली देगा, कौन ज्यादा रेवड़ी बांटेगा। यह अतिशयोक्ति नहीं है। यह भारत सरकार की अपनी रिपोर्टें कह रही हैं।
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 कहता है कि राज्यों में मुफ्त कैश बांटने पर लाखों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। और नीति आयोग (NITI Aayog) की शिक्षा रिपोर्ट कहती है कि उसी देश के हजारों स्कूलों में बिजली नहीं है, टीचर नहीं है, लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं है। एक तरफ चुनाव जीतने के लिए पैसा है। दूसरी तरफ भविष्य बनाने के लिए नहीं।
NDTV की रिपोर्ट
एमपी में भी यही हाल....
https://thesootr.com/state/madhya-pradesh/mp-government-school-toilet-scam-girls-safety-11850279
राज्य-दर-राज्य रेवड़ी की होड़
पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने चुनाव से पहले महिलाओं को 3 हजार रुपए देने का वादा किया था। बेरोजगार युवाओं को भी 3 हजार रुपए का वादा किया गया। मुफ्त बस यात्रा, गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता और तमाम कैश योजनाओं का ऐलान हुआ था। तृणमूल कांग्रेस भी पीछे नहीं थी। बीजेपी ने बस उसे डबल कर दिया था।
केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ (United Democratic Front) ने महिलाओं को मुफ्त बस, कॉलेज जाने वाली लड़कियों को हर महीने 1 हजार रुपए, 3 हजार रुपए की अलग पेंशन और छोटे कारोबारियों को ब्याज मुक्त लोन का ऐलान किया।
- तमिलनाडु में महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपए, साल में छह मुफ्त गैस सिलेंडर, मुफ्त बस यात्रा और शादी में 8 ग्राम सोने का वादा हुआ था।
- बिहार में चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपए डाले गए।
- असम में 9 हजार रुपए का सबसे बड़ा कैश ट्रांसफर हुआ और सरकार इस पर पीठ थपथपाती रही।
- महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी फ्रीबीज बांटी गईं।
- झारखंड में मैया सम्मान योजना के तहत कैश दिया गया।
शायद इसी वजह से वहां की सरकार वापस सत्ता में आ गई।
लाड़ली बहन योजना का बजट इसरो से ज्यादा!
मध्य प्रदेश की लाड़ली बहन योजना को समझिए। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने 2023 में यह योजना शुरू की गई थी। महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपए देने का ऐलान हुआ था। इस योजना ने चुनावी नतीजे बदल दिए और फिर हर राज्य में यही होड़ शुरू हो गई।
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण योजना के तहत ढाई करोड़ महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए देने का वादा हुआ। इसका शुरुआती बजट करीब 46 हजार करोड़ रुपए था। 2026-27 में इसके लिए 26 हजार 500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए।
अब डीआरडीओ (DRDO, Defence Research and Development Organisation) का बजट देखिए, वो है 29 हजार करोड़ रुपए। यानी जो संस्था मिसाइल सिस्टम और सैन्य रिसर्च करती है, उसके और इस स्कीम के बजट में बस थोड़ा ही फर्क है।
एक आईआईएम (IIM, Indian Institute of Management) बनाने में करीब 500 से 550 करोड़ रुपए लगते हैं। अगर महाराष्ट्र की ये योजना सिर्फ एक साल के लिए रोक दी जाए तो उस पैसे से 30 से ज्यादा नए आईआईएम बन सकते हैं। एक रास्ता तुरंत वोट देता है, दूसरा रास्ता 20 साल बाद देश को मजबूत बनाता है। राजनीति ने आसान रास्ता चुना।
इकोनॉमिक सर्वे की चेतावनी
2025-26 का इकोनॉमिक सर्वे, जो मोदी सरकार बजट से पहले संसद में पेश करती है, इस पर बहुत गंभीर चेतावनी देता है। यानी वही सरकार, वही पार्टी अपने ही दस्तावेज में कह रही है कि राज्यों में बिना शर्त कैश ट्रांसफर विस्फोटक तरीके से बढ़े हैं।
2022-23 के बाद इन योजनाओं का खर्च पांच गुना बढ़ चुका है। 2025-26 तक राज्यों का कुल खर्च करीब 1.7 लाख करोड़ रुपए पहुंच चुका है। कुछ राज्यों में यह खर्च जीडीपी (GDP, Gross Domestic Product) के 1.2 फीसदी तक और कई राज्यों में बजट के 8 फीसदी तक पहुंच गया है।
इकोनॉमिक सर्वे साफ कहता है कि इन योजनाओं का सबसे बड़ा संकट फिस्कल सस्टेनेबिलिटी (Fiscal Sustainability), यानी आर्थिक टिकाऊपन, है। राज्यों का फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) 2.6 फीसदी से बढ़कर 3.2 फीसदी तक पहुंच गया है।
रेवेन्यू डेफिसिट भी बढ़ रहा है। मतलब सरकारें अब रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए भी कर्ज ले रही हैं। और वो कर्ज सड़क, रेलवे, अस्पताल या फैक्ट्री बनाने में नहीं, सिर्फ पैसा बांटने में जा रहा है। यानी भविष्य गिरवी रखकर वर्तमान में वोट खरीदे जा रहे हैं।
स्कूलों में अंधेरा, खातों में कैश
नीति आयोग की शिक्षा रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 1 लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। वहीं, 1.19 लाख स्कूलों में बिजली नहीं है। 14 हजार 505 स्कूलों में पीने का पानी नहीं है। करीब 60 हजार स्कूलों में बच्चों के हाथ धोने तक की व्यवस्था नहीं है। 98 हजार से ज्यादा स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं है।
कर्नाटक में 38 हजार शिक्षकों की कमी है। बिहार में 2 हजार से ज्यादा शिक्षकों की कमी है। झारखंड में 1 लाख शिक्षकों की कमी है। मध्य प्रदेश में 52 हजार और पश्चिम बंगाल में 77 हजार शिक्षकों की जरूरत है।
सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में सिर्फ 51.7 फीसदी स्कूलों में साइंस लैब है। लेकिन चुनावी मंचों पर इनमें से कोई मुद्दा नहीं है। कोई नेता नहीं कह रहा कि 5 साल में हर स्कूल में टीचर होगा।
कोई नहीं कह रहा कि हर जिले में इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनेगा। कोई नहीं कह रहा है कि युवाओं को विश्वस्तरीय स्किल देंगे। क्योंकि यह सब लंबे समय का काम है और इसमें तुरंत वोट नहीं मिलता।
भेड़ की खाल से उधेड़ा जा रहा ऊन
फ्रीबीज कोई जादू से नहीं आते। यह जनता की जेब से आते हैं। आरबीआई (RBI, Reserve Bank of India) साफ कहता है कि मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त परिवहन और कर्ज माफी जैसी योजनाएं आर्थिक विकृति पैदा करती हैं। इससे क्रेडिट कल्चर कमजोर होता है, निजी निवेश प्रभावित होता है और लेबर फोर्स की भागीदारी घटती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में खुद इसे रेवड़ी कल्चर कहा था। उन्होंने कहा था कि मुफ्त की राजनीति देश के विकास के लिए खतरनाक है। लेकिन सबसे ज्यादा राज्य सरकारें आज बीजेपी की हैं और सबसे ज्यादा फ्रीबीज भी आज बीजेपी के राज में बंट रही हैं। जब दिल्ली में केजरीवाल फ्रीबीज देते थे तो बीजेपी आलोचना करती थी। आज वो उससे बढ़-चढ़कर वादे कर रही है। यह सिर्फ बीजेपी की बात नहीं है, कांग्रेस, तृणमूल, डीएमके, हर पार्टी इसी खेल में शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट से लेकर आर्थिक रिपोर्टें
यह बहस 2022 में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची थी। फ्रीबीज को लेकर दाखिल एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना ने कहा था कि देश में वेलफेयर और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। यानी देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी माना कि चुनावी फ्रीबीज अब सिर्फ राजनीति का मुद्दा नहीं रहे। ये आर्थिक और लोकतांत्रिक संकट बनते जा रहे हैं।
इकोनॉमिक सर्वे साफ कहता है कि जब पैसा फ्री स्कीम में जाता है तो स्कूल, अस्पताल, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार के लिए पैसा कम बचता है। यानी चुनाव जीतने के लिए विकास कुर्बान किया जा रहा है।
दुनिया ने दूसरा रास्ता चुना
ब्राजील में बोलसा फमिलिया योजना स्कूल में उपस्थिति और टीकाकरण से जुड़ी है। मेक्सिको में बच्चों की पढ़ाई और हेल्थ चेकअप से कैश ट्रांसफर जुड़ा है। फिलीपींस में परिवारों को धीरे-धीरे योजना से बाहर निकाला जाता है। यानी वहां मदद आत्मनिर्भरता की तरफ ले जाती है। भारत में मदद निर्भरता की तरफ ले जा रही है।
गरीबों की मदद गलत नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जीवन रक्षक सहायता कल्याणकारी राज्य का हिस्सा है। लेकिन बिना शर्त लगातार कैश बांटकर वोट लेना लोकतंत्र को कमजोर करता है। देश में ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 13 फीसदी है। लाखों इंजीनियर और ग्रेजुएट बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद भाग रहे हैं। स्थानीय उद्योग नहीं है, स्थायी रोजगार नहीं है और स्किल और बाजार के बीच तालमेल नहीं है।
लोकतंत्र तब नहीं मरता जब चुनाव बंद हो जाते हैं। लोकतंत्र तब मरता है जब जनता सवाल पूछना बंद कर देती है, जब वोट विचार से नहीं, लाभ से तय होते हैं।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर भारत के लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा सवाल उठाती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लेकिन जब सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से पैसा हटाकर चुनावी कैश बांटती हैं तो संवैधानिक अधिकारों की भावना खोखली होती है। नीति आयोग और इकोनॉमिक सर्वे की रिपोर्टें सरकारी स्रोत हैं, इसलिए इनकी विश्वसनीयता निर्विवाद है। डिजिटल और सामाजिक नैतिकता के लिहाज से यह जरूरी है कि नागरिक यह समझें कि उनके टैक्स का पैसा कहां जा रहा है। एक जागरूक नागरिक ही मजबूत लोकतंत्र की नींव है। यह खबर किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं है बल्कि एक पूरी राजनीतिक संस्कृति पर सवाल उठाती है जो देश को कमजोर कर रही है।
FAQ
- सवाल: फ्रीबीज और कल्याणकारी योजनाओं में क्या फर्क है?
जवाब: कल्याणकारी योजनाएं वो होती हैं जो गरीब को आत्मनिर्भर बनाती हैं, जैसे मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा या स्किल ट्रेनिंग। फ्रीबीज वो होती हैं जो बिना किसी शर्त के सिर्फ चुनाव के करीब कैश या सुविधाएं बांटती हैं। - सवाल: क्या फ्रीबीज से राज्यों की आर्थिक हालत खराब हो रही है?
जवाब: हां, इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के अनुसार 2022-23 के बाद से इन योजनाओं का खर्च पांच गुना बढ़ चुका है और 2025-26 तक राज्यों का कुल खर्च करीब 1.7 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। कुछ राज्यों में बजट का 8 फीसदी हिस्सा सिर्फ कैश बांटने में जा रहा है। राज्यों का फिस्कल डेफिसिट 2.6 फीसदी से बढ़कर 3.2 फीसदी हो गया है। सरकारें अब रोजमर्रा के खर्च के लिए भी कर्ज ले रही हैं। - सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज पर क्या कहा था?
जवाब: 2022 में फ्रीबीज को लेकर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना ने कहा था कि देश में वेलफेयर और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चुनावी फ्रीबीज अब सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और लोकतांत्रिक संकट का मुद्दा बन चुकी हैं।
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