जांबाज अफसर विवेक सिंह चौहान की कहानी जिसे सुप्रीम कोर्ट खुद देना चाहती है पुरस्कार
समझें क्या है पूरा मामला
- पूर्व एसआई विवेक सिंह चौहान 23 साल से वीरता पदक का इंतजार कर रहे हैं।
- 2003 में उन्होंने मुठभेड़ में दो डकैत मार गिराए थे।
- केंद्र सरकार ने अब तक पदक देने में देरी की है।
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को कड़ी फटकार लगाई है।
- कोर्ट ने कहा, 15 अगस्त को खुद सम्मान दे देंगे।
कभी-कभी बहादुरी का सम्मान मिलने में भी बरसों लग जाते हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान की कहानी कुछ ऐसी ही है। साल 2003 में उन्होंने जान जोखिम में डालकर दो डकैत मार गिराए थे। आज 23 साल बाद भी वह राष्ट्रपति वीरता पदक यानी President's Gallantry Medal का इंतजार कर रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस देरी पर सख्त नाराजगी जताई है।
जंगल में वो खतरनाक मुठभेड़
यह घटना 24 जून 2003 की है। ग्वालियर जिले के घाटीगांव थाना क्षेत्र में डांडाखिड़क के घने जंगल हैं। तब विवेक सिंह वहां सहायक निरीक्षक यानी एसआई थे। उनकी डकैतों से आमने-सामने मुठभेड़ हुई। साथ में होमगार्ड के जवान भी मौजूद थे। विवेक सिंह ने बिना डरे डकैतों को घेरा और मार गिराया। इस दौरान वह खुद गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी इस बहादुरी को राज्य सरकार ने तुरंत सराहा। राष्ट्रपति वीरता पदक के लिए उनका नाम भेजा गया।
ग्वालियर-चंबल अंचल की चुनौती
2000 के दशक में ग्वालियर-चंबल क्षेत्र अपहरण और फिरौती के मामलों का केंद्र बन चुका था। डकैतों का खौफ इतना बढ़ चुका था कि पुलिस के लिए भी उन्हें पकड़ना मुश्किल हो गया था। ऐसे में चौहान की बहादुरी ने पुलिस का मनोबल बढ़ाया और यह मुठभेड़ अखबारों की सुर्खियां बनी।
फिर शुरू हुआ लंबा इंतजार
मजिस्ट्रियल जांच में विवेक सिंह को क्लीन चिट मिल गई थी। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सालों तक कोई फैसला नहीं लिया। कारण बताया गया कि प्रस्ताव तय समयसीमा में नहीं पहुंचा था। थक हारकर विवेक सिंह ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह एक जांबाज अफसर के लिए भी आसान लड़ाई नहीं थी। जनवरी 2025 में हाईकोर्ट ने उनके हक में फैसला सुनाया।
केंद्र ने दिया छोटा सम्मान
दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट ने केंद्र को एक महीने में पदक देने का आदेश दिया था। लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें सामान्य Gallantry Medal यानी जीएम (GM) दे दिया। हाईकोर्ट ने इसे राष्ट्रपति वीरता पदक से कमतर सम्मान बताया। अदालत ने इसे अपने आदेश की अवहेलना माना। इसके बाद गृह सचिव को प्रथमदृष्टया अवमानना का दोषी भी माना गया। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की केंद्र की अपील
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन सीजेआई यानी मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की बेंच ने केंद्र की अपील खारिज कर दी थी। जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एवी अंजरिया भी इस बेंच में शामिल थे। कोर्ट ने विवेक सिंह के हक में फैसला बरकरार रखा था। इससे उन्हें पदक मिलने का रास्ता साफ हो गया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी थी।
अब सुनवाई में क्या हुआ
सोमवार को जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने यह मामला फिर सुना। सुनवाई गृह सचिव गोविंद मोहन की उस अर्जी पर हुई, जिसमें अतिरिक्त समय मांगा गया था।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। उनका कहना था कि यह आपत्ति किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। उनका तर्क था कि सम्मान अदालत के आदेश से नहीं दिए जाते।
जस्टिस विक्रम नाथ ने इस पर तीखा सवाल पूछा। उन्होंने कहा कि पुनर्विचार याचिका दाखिल होने से आदेश पालन में क्या रुकावट है। उनका कहना था, पहले आदेश मानिए, फिर रिव्यू पर बहस कीजिए। जब केंद्र ने कहा कि रिव्यू मंजूर हुआ तो सम्मान वापस लिया जा सकता है, कोर्ट ने कहा ऐसा बाद में देखा जाएगा।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी
जस्टिस संदीप मेहता ने सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि सरकार या तो साफ बयान दे, या आदेश की अनदेखी करे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि 15 अगस्त को यह सम्मान कोर्ट खुद दे देगा। यह टिप्पणी बताती है कि अदालत अब और देरी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
23 साल का इंतजार, अब सिर्फ एक हफ्ता बाकी
विवेक सिंह की ओर से पेश वकील ने अदालत को भावुक अपील की। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल 23 साल से न्याय का इंतजार कर रहे हैं। अगर इस बार भी देरी हुई तो पदक अगले साल ही मिल पाएगा।
दरअसल यह सम्मान सिर्फ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ही दिया जाता है। Supreme Court ने केंद्र को एक हफ्ते का आखिरी मौका दिया है। मामला अब 29 जुलाई को फिर सुना जाएगा। कोर्ट ने साफ कहा कि इसके बाद कोई मोहलत नहीं मिलेगी।
एक बहादुर अफसर की यह कहानी सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं है। यह धैर्य और इंतजार की भी मिसाल है। अब सबकी नजर 29 जुलाई की सुनवाई पर टिकी है।
कौन हैं विवेक सिंह चौहान? (Who is Vivek Singh)
विवेक सिंह चौहान मध्य प्रदेश पुलिस के पूर्व अधिकारी हैं। साल 2003 में वह ग्वालियर जिले के घाटीगांव थाना क्षेत्र में सहायक निरीक्षक यानी एसआई के पद पर तैनात थे।
24 जून 2003 को डांडाखिड़क के घने जंगल में उनकी डकैतों से आमने-सामने मुठभेड़ हुई। उन्होंने बिना डरे डकैतों को घेरकर मार गिराया। इस मुठभेड़ में वह खुद गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
मजिस्ट्रियल जांच में उन्हें क्लीन चिट मिली। उनकी बहादुरी को देखते हुए राज्य सरकार ने राष्ट्रपति वीरता पदक के लिए उनका नाम केंद्र सरकार को भेजा था।
इसके बाद से वह 23 साल से इस सम्मान का इंतजार कर रहे हैं। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब उनका मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
राष्ट्रपति वीरता पदक क्यों मिलता है?
राष्ट्रपति वीरता पदक पुलिस, CRPF, BSF और दूसरे सुरक्षा बलों के जवानों को दिया जाता है। यह सम्मान उन जवानों को मिलता है, जो ड्यूटी के दौरान असाधारण बहादुरी दिखाते हैं।
जैसे आतंकियों से मुठभेड़, नक्सल विरोधी अभियान, खतरनाक अपराधियों को पकड़ने या लोगों की जान बचाने के दौरान कोई जवान अपनी जान की परवाह किए बिना साहस दिखाए, तो उसे राष्ट्रपति वीरता पदक दिया जा सकता है।
- ये शांतिकाल या counter-terrorism, law & order ऑपरेशन्स में दिखाई गई वीरता के लिए होता है।
- राष्ट्रपति जी खुद राष्ट्रपति भवन में समारोह करके ये पदक देते हैं।
- कई बार इसे President's Medal for Gallantry भी कहते हैं।
- ये वीर चक्र जैसा है, लेकिन ज्यादातर पुलिस और सिविल फोर्स के लिए होता है।
मुख्य बातें: मान लीजिए कोई इंस्पेक्टर या कांस्टेबल आतंकी हमले में डटकर मुकाबला करे, अपने साथियों की जान बचाए या किसी बेहद खतरनाक मिशन को सफल बना दे, तो उसे राष्ट्रपति वीरता पदक दिया जा सकता है। कुछ जवानों को उनकी बहादुरी के लिए यह सम्मान एक से ज्यादा बार भी मिल चुका है। सीधी भाषा में कहें तो देश की सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए जान जोखिम में डालकर बहादुरी दिखाने वालों को राष्ट्रपति यह सम्मान देते हैं।
राष्ट्रपति वीरता पदक पाने वाले जवानों को सिर्फ सम्मान ही नहीं, कई व्यावहारिक फायदे भी मिल सकते हैं। हालांकि ये लाभ बल, राज्य और सेवा नियमों के हिसाब से अलग-अलग होते हैं।
आमतौर पर उन्हें:
- विशेष पदक और प्रमाणपत्र मिलता है
- सरकार की ओर से नकद पुरस्कार या भत्ता मिल सकता है
- पदोन्नति और सेवा रिकॉर्ड में फायदा मिल सकता है
- विभाग में विशेष सम्मान और प्राथमिकता मिलती है
- कुछ राज्यों में जमीन, आवास, यात्रा या दूसरी सुविधाएं भी दी जाती हैं
- सेवानिवृत्ति के बाद भी समारोहों और सरकारी कार्यक्रमों में सम्मान मिलता है
सीधी भाषा में कहें तो यह पदक जवान की बहादुरी की आधिकारिक पहचान होता है। इससे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और कई मामलों में आर्थिक व सेवा संबंधी लाभ भी मिलते हैं। ध्यान रहे, हर पदक के साथ एक जैसी सुविधा तय नहीं होती। एसीपी विवेक सिंह चौहान
FAQ
- राष्ट्रपति वीरता पदक क्यों मिलता है?
राष्ट्रपति वीरता पदक पुलिस, CRPF, BSF और दूसरे सुरक्षा बलों के जवानों को दिया जाता है। यह सम्मान उन जवानों को मिलता है, जो ड्यूटी के दौरान असाधारण बहादुरी दिखाते हैं। - सवाल: विवेक सिंह चौहान को वीरता पदक क्यों मिलना है?
जवाब: 2003 में विवेक सिंह ने ग्वालियर के जंगलों में मुठभेड़ के दौरान दो डकैत मार गिराए थे। इस दौरान वह खुद गंभीर घायल हो गए थे। उनकी बहादुरी को देखते हुए राज्य सरकार ने राष्ट्रपति वीरता पदक के लिए उनका नाम भेजा था। - सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने विवेक सिंह चौहान के मामले में केंद्र सरकार से क्या कहा?
जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार इस मामले में देरी कर रही है और कोर्ट सरकार के रवैये से खुश नहीं है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर देरी जारी रही तो 15 अगस्त को यह सम्मान अदालत खुद देगी।
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