गर्भकाल : शिव की छाया से निकलकर मोहनी बिसात बिछाते सीएम डॉ. मोहन यादव

The Sootr | Sept 08, 2024, 16:00 IST
अजय बोकिल
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने 13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। 13 सितंबर 2024 को सरकार के कार्यकाल के 9 माह पूरे हो जाएंगे। कैसा रहा सरकार का गर्भकाल, 9 महीने में कितने कदम चली सरकार, 'द सूत्र' लेकर आया है पूरा एनालिसिस... पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल का विशेष आलेख...

अजय बोकिल @ भोपाल



मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव के कार्यकाल के आठ माह राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझने के साथ साथ कई दूरगामी फैसलों से भरे हैं। इन आठ महीनों में डाॅ.मोहन यादव ने जहां मोदी की गारंटियों को पूरा करने में पूरी ताकत झोंकी है, वहीं बतौर मुख्यमंत्री अपने पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान की छाया से बाहर निकलकर खुद की अलग छवि गढ़ने का भी भरपूर प्रयास किया है। जहां उन्होंने एक तरफ शिवराज सरकार के कुछ फैसलों को कायम रखा है तो दूसरी तरफ तीन बड़े फैसले पलटने का साहस भी दिखाया है।



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शिवराज ने लोगों से निजी ‍रिश्ता बनाकर अपनी अलग राजनीतिक छवि तैयार की थी। वो लोकप्रिय मुख्‍यमंत्री होने के साथ बच्चों के ‘मामा’ भी थे। इसी के बरक्स मोहन यादव भी स्वयं को ‘भैया’ मुख्‍यमंत्री के रूप में स्थापित करने में लगे हैं। हालांकि यह अभी शुरुआत है और मुख्‍यमंत्री की हैसियत से उन्हें अभी और मंजिलों को पार करना है, लेकिन मोहन यादव ने अपनी कारकिर्दगी के मंगलाचरण में ही कुछ बड़े शाॅट खेल दिए हैं। कोशिश यही है कि वो भी लंबे समय तक राज्य की ड्राइविंग सीट पर बने रहें। उन पर आला कमान का वरदहस्त है ही। संघ भी उनकी कार्यशैली से मुतमइन लगता है।



सीएम यादव शुरुआती दो माह एक्शन, रिएक्शन और क्रिएशन से भरपूर थे। इनमें पलटे गए फैसलों में पहला तो भोपाल में बीआरटीएस खत्म करना, दूसरे अवैध काॅलोनियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए विधेयक लाना तथा तीसरा भोपाल में ही राजधानी परियोजना को पुन: जीवित करना है। यादव सरकार का एक और अहम फैसला सभी जिलों, तहसीलों और थानों की सीमा का पुनर्निधारण का है। जहां तक राजनीतिक मोर्चे की बात है तो सीएम यादव ने लोकसभा चुनाव में भाजपा की क्लीन स्वीप और बाद में अमरवाड़ा विधानसभा उपचुनाव जीतकर साबित कर दिया है कि वो सियासी चुनौतियों से निपटना जानते हैं। यादव को छिंदवाड़ा में वरिष्ठ कांग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का किला ढहाने के लिए याद रखा जाएगा।



यही नहीं उन्होंने छिंदवाड़ा जिले को भी तीन हिस्सों में बांटने की तैयारी कर ली है। पहले पांढुर्ना को अलग किया गया, अब जुन्नारदेव को जिला बनाने की तैयारी है। इसके अलावा कांग्रेस को कमजोर करने की रणनीति को भी उन्होंने सफलता से अंजाम दिया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और ज्य‍ोतिरादित्य सिंधिया के विरोधी रहे चंबल अंचल के नेता रामनिवास रावत को भाजपा में लाकर मंत्री बनाना, अमरवाड़ा से कमलनाथ के खास रहे कमलेश शाह को उपचुनाव जिताना और बीना की कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे को भाजपा में लाना इसी का उदाहरण है।



इसके अलावा नई शिक्षा नीति के अंतर्गत विद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी और रानी दुर्गावती की प्रेरणादायी वीरगाथा के विषय को शामिल करना, हर जिले में एक शासकीय महाविद्यालय का पीएम उत्कृष्टता महाविद्यालय के रूप में उन्नयन भी शामिल है। राज्य में सामाजिक सौहार्द कायम रखने तथा कानून व्यवस्था बिगाड़ने वालों के खिलाफ मोहन यादव का बुलडोजर तैयार रहता है। उन्होंने सभी विभागों और मंत्रियों को संकल्प पत्र-2023 की घोषणाओं और वचनों को पूरा करने और उसे जमीन पर उतारने के लिए मिशन मोड में कार्य करने के निर्देश दिए। साथ ही संकल्प पत्र की घोषणा को पूरा करते हुए मोहन यादव सरकार ने तेंदूपत्ता संग्राहकों का मानदेय 3 हजार रुपए से बढ़ाकर 4 हजार रुपए प्रति मानक बोरा कर प्रदेश के 35 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरी।



मोहन यादव आर्थिक मोर्चे पर भी प्रदेश को आगे ले जाने की दिशा में काम कर रहे हैं। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि राज्य में बेरोजगारी घटाने तथा आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ना होगा। इसके लिए मोहन यादव सरकार कर्ज पर कर्ज लेने से नहीं हिचक रही है। सीएम राज्य में ज्यादा उद्योग लाने के लिए रीजनल इन्वेस्टमेंट मीट्स का आयोजन कर रहे हैं। सरकार के कई बड़े उद्योग समूहों के साथ एमओयू भी हो रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों की सार्थकता तभी है, जब हकीकत में उद्योग लगें और लोगों को रोजगार मिले। इस दिशा में सीएम द्वारा हर जिले में एक इन्वेस्टेमेंट फेसीलिटेशन सेंटर ( निवेश सुविधा केन्द्र) की स्थापना की घोषणा है। सरकार ने औद्योगिक केन्द्रों में जमीन में देने की नीति में भी कुछ व्यावहारिक बदलाव किए हैं। मुख्यमंत्री का ध्यान मुख्‍य रूप से पर्यटन, खाद्य प्र-संस्करण और आईटी के क्षेत्र में संभावनाओं के पूर्ण दोहन पर रहा है।



जहां तक राजनीतिक चुनौती का सवाल है तो मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने विपक्ष फिलहाल कोई बड़ी चुनौती पेश करने की स्थिति में नहीं है। जबकि भाजपा में भी उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को कायदे में रखा है। हालांकि प्रदेश में पूर्व मुख्‍यमंत्री और अब केन्द्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान और उनके समर्थक चुनौती बने हुए हैं। इस बार जन्माष्टमी पर मुख्‍यमंत्री निवास और शिवराज के भोपाल के स्थित आवास पर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन अघोषित प्रतिद्वंद्विता में बदल गया। मोहन यादव ने शिवराज को भी निमंत्रित किया गया था, लेकिन वो नहीं गए। वैसे खुले तौर पर दोनो में कोई अदावत नहीं है, पर इस रिश्ते को अगर भागवत पुराण के रूपक के तौर पर देखें तो बाणासुर को लेकर कृष्ण (मोहन) और शिव में युद्ध हुआ था, जिसमें कृ‍ष्ण की जीत हुई थी। मध्यप्रदेश में भी फिलहाल तो मोहन लीला ही सर्वोपरि है।



लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इस लेख में उनके निजी विचार हैं।



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