धार की ऐतिहासिक मूर्ति सरस्वती की नहीं, मां गायत्री की निकली, 900 साल पुराना भ्रम टूटा!
समझें क्या है पूरा मामला
- भोपाल म्यूजियम की 12वीं सदी की मूर्ति अब मां गायत्री साबित हुई।
- पहले इसे देवी सरस्वती की मूर्ति माना जाता था।
- 3D मैपिंग और डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन से पहचान बदली।
- मूर्ति में वीणा नहीं है, जो सरस्वती की मूर्तियों में जरूरी मानी जाती है।
- यह मूर्ति परमार राजवंश के दौर की मानी जा रही है।
मध्य प्रदेश के भोपाल स्टेट म्यूजियम में एक बड़ा खुलासा हुआ है। यहां रखी 12वीं सदी की एक मूर्ति को लेकर 900 साल पुराना भ्रम अब टूट गया है। पुरातत्वविदों ने डिजिटल तकनीक और प्राचीन ग्रंथों की मदद से यह साबित किया है। जिसे अब तक देवी सरस्वती की मूर्ति समझा जा रहा था, वह असल में ज्ञान और वेदों की देवी मां गायत्री की प्रतिमा है।
यह मूर्ति लाल बलुआ पत्थर से बनी है। इसे धार जिले से खोजा गया था। धार कभी परमार राजवंश की राजधानी हुआ करता था। इसीलिए इस मूर्ति का ऐतिहासिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
लंबे समय तक शोधकर्ता इसे सरस्वती मानकर ही रिसर्च करते रहे। लेकिन राज्य पुरातत्व निदेशालय की नई 3D मैपिंग ने पूरी तस्वीर बदल दी। हाई-रिज़ॉल्यूशन डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन ने सदियों पुराना भ्रम दूर कर दिया।
क्यों बदली पहचान
इस खोज में सबसे बड़ी वजह मूर्ति में वीणा का न होना रही। गुप्त काल (Gupta Empire, 320-550 ईस्वी) के बाद बनी लगभग हर सरस्वती मूर्ति में वीणा जरूर होती है। यह मूर्तिकला की एक तय परंपरा मानी जाती है। लेकिन भोपाल की इस मूर्ति में वीणा कहीं नजर नहीं आती। इसी एक कमी ने एक्सपर्ट्स को नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया।
पुरातत्व निदेशालय से जुड़े आर्कियोलॉजिस्ट रमेश यादव ने इस बारे में विस्तार से बताया। उनके मुताबिक मूर्ति ललितासन मुद्रा में बैठी है। इसकी चार भुजाएं हैं। हाथों में जपमाला, कमल और वेद साफ दिखते हैं। मूर्ति के पास एक हंस भी बना है, जो पवित्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। यादव का कहना है कि यह पूरी बनावट शिल्पशास्त्र में बताए गए मां गायत्री के स्वरूप से पूरी तरह मेल खाती है।
धार और परमार कनेक्शन
इतिहासकार और पुरातत्वविद बी.के. लोखंडे ने भी इस खोज पर अपनी राय रखी। उनके मुताबिक श्रीमद देवी भागवत पुराण और शिल्पशास्त्र के नियमों से यह साफ होता है। यह मूर्ति मां गायत्री की ही है। लोखंडे कहते हैं कि भारत में मां गायत्री की इतनी प्राचीन मूर्तियां बेहद दुर्लभ हैं। इस कलाकृति पर पश्चिमी चालुक्य शैली का असर साफ दिखता है। यह शैली धार के परमार राजाओं के समय खूब प्रचलित थी। परमार राजवंश का दौर 9वीं से 14वीं सदी तक माना जाता है। उस समय मूर्तिकला अपने चरम पर थी।
मूर्ति की खास पहचान
इस मूर्ति की चार भुजाओं में अक्षमाला, कमल का फूल और साक्षात वेद मौजूद हैं। देवी के पास बेहद बारीकी से तराशा गया हंस भी दिखाई देता है। गुप्त साम्राज्य के बाद की सरस्वती मूर्तियों से उलट, इसमें वीणा का कोई नामोनिशान नहीं मिलता। यह मूर्ति 12वीं सदी की मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह धार के राजा भोज के दौर की परमार कला का बेहतरीन नमूना है। राजा भोज का शासनकाल कला और विद्या के लिए खास तौर पर जाना जाता है। इसी वजह से यह मूर्ति ऐतिहासिक रूप से और भी अहम मानी जा रही है।
आगे क्या होगा
मध्य प्रदेश के पुरातत्व कमिश्नर मदन कुमार नगरगोजे ने भी इस खोज पर प्रतिक्रिया दी। उनके मुताबिक इस खुलासे के बाद मूर्ति का महत्व और बढ़ गया है। यह अब एमपी के डिजिटल हेरिटेज मिशन का मुख्य चेहरा बनने जा रही है। नगरगोजे ने बताया कि जल्द ही आम लोग इसका ऑथेंटिकेटेड 3D मॉडल देख सकेंगे। यह मॉडल डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया जाएगा। इससे देश-विदेश के शोधकर्ता और आम जनता दोनों फायदा उठा सकेंगे।
यह खोज सिर्फ एक मूर्ति की पहचान बदलने भर की बात नहीं है। यह मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नए सिरे से सामने लाती है। धार जैसे क्षेत्रों में परमार काल की कला कितनी विकसित थी, यह मूर्ति इसका जीता-जागता सबूत है। आने वाले समय में इस तरह की और भी मूर्तियों की दोबारा पहचान हो सकती है। डिजिटल तकनीक ने पुरातत्व की दुनिया में नई संभावनाएं खोल दी हैं।
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मां गायत्री बीज | मां गायत्री स्रोत Archaeology