एमपी के शहरों में संपत्तियां तो बढ़ी, पर घट रहा नगर निगम का खजाना, GIS सर्वे में खुलासा
हमारे शहरों के विकास और बुनियादी सुविधाओं के लिए संपत्तिकर वसूली सबसे जरूरी जरिया है। वहीं प्रदेश के नगरीय निकायों से एक ऐसी खबर आ रही है जो वाकई चिंताजनक है।
नगरीय विकास विभाग ने शहरों की सभी संपत्तियों को टैक्स के दायरे में लाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। इसके लिए विभाग ने प्रदेश के 413 में से 386 निकायों में जीआईएस सर्वे कराया।
इस सर्वे का नतीजा यह रहा कि कागजों पर दर्ज संपत्तियों की संख्या में रिकॉर्ड 67 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि संपत्तियों की संख्या तो बहुत तेजी से बढ़ी, पर उसके अनुपात में टैक्स का कलेक्शन बिल्कुल नहीं बढ़ा।
इस वजह से नगरीय निकायों की आर्थिक स्थिति आज भी बहुत कमजोर बनी हुई है।
सिर्फ 6 से 10 फीसदी संपत्तियों से आ रहा टैक्स
हालात इस कदर खराब हैं कि कई शहरों में तो केवल 6 से 10 प्रतिशत संपत्तियों से ही संपत्तिकर जमा हो पा रहा है। इसका सीधा नतीजा यह हो रहा है कि नगरीय निकाय अपने दम पर खड़े नहीं हो पा रहे हैं।
वे आत्मनिर्भर निकाय बनने की सोच से अभी बहुत दूर हैं। विकास कार्यों के लिए आज भी पूरी तरह से राज्य और केंद्र सरकार के अनुदान पर ही निर्भर हैं।
नगरीय विकास संचालनालय की रिपोर्ट को देखें तो एक और हैरान करने वाली बात सामने आती है। कई निकायों में तो जीआईएस सर्वे हुए एक पूरा साल बीत चुका है।
इसके बावजूद जिम्मेदार अफसर इन नई चिह्नित की गई संपत्तियों से टैक्स वसूलने का काम शुरू तक नहीं कर पाए हैं। इस सुस्ती को देखते हुए विभाग के एसीएस संजय दुबे और आयुक्त संकेत भोंडवे ने हाल ही में राजधानी में एक कार्यशाला बुलाई थी। यहां उन्होंने अफसरों को टैक्स वसूलने के सख्त निर्देश और हिदायत दी है।
कहां कितना टैक्स मिला?
सर्वे के पहले इन 386 निकायों में कुल 16 लाख 14 हजार 198 संपत्तियां सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज थीं। सर्वे के बाद यह आंकड़ा बढ़कर 27लाख छह हजार 476 तक पहुंच गया।
इसका मतलब यह हुआ कि सर्वे में कुल 10 लाख 92 हजार 306 नई संपत्तियां खोजी गईं।
वहीं जब टैक्स वसूलने की बात आई तो चंबल और बुंदेलखंड के निकाय इस रेस में सबसे पीछे नजर आए।