1500 करोड़ का निवेश और विदेशी मशीनें भी फेल! एमपी के युवा ग्लोबल स्किल पार्क से मोड़ रहे मुंह
5 पॉइंट में समझें पूरा मामला...
- 1500 करोड़ के ग्लोबल स्किल पार्क में सीट अब भी खाली है।
- हाईटेक लैब और इंफ्रास्ट्रक्चर मिलने के बावजूद युवा अब भी ITI को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।
- करोड़ों खर्च पर कोर्स और ट्रेनिंग सिस्टम का असर नहीं दिख रहा है।
- प्लेसमेंट की गारंटी के दावे के बाद भी युवा बेरुखी दिखा रहे हैं।
- कौशल विकास एवं प्रशिक्षण विभाग की प्लानिंग भी फेल हो रही है।
सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट युवाओं को लुभाने में नाकाम
मध्य प्रदेश सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट ग्लोबल स्किल पार्क युवाओं को लुभाने में नाकाम हो रहा है। लगभग 1500 करोड़ रुपए की लागत से बने इस हाईटेक संस्थान में इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के लिए युवा रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
सरकार ने इसे एडवांस प्लान बताया था। दावा था कि यहां इंटरनेशनल लेवल की स्किल ट्रेनिंग मिलेगी। पर करोड़ों का इंफ्रा, हाईटेक लैब और विदेशी मशीनों के बाद भी व्यवस्था ITI जैसी ही है।
न नए कोर्स, न प्लेसमेंट की गारंटी। इसी वजह से सीटें खाली पड़ी हैं। युवाओं का कहना है कि ITI करने में कम खर्च और जल्दी नौकरी मिलती है।
ITI, डिप्लोमा की बाध्यता बनी उलझन
ग्लोबल स्किल पार्क को सरकार ने स्किल डेवलपमेंट का गेमचेंजर बताया था। सिंगापुर के सहयोग से 1500 करोड़ खर्च कर भोपाल में संत शिरोमणि रविदास ग्लोबल स्किल पार्क कैंपस बनाया गया है।
कैंपस में आधुनिक मशीनरी के साथ प्रशिक्षण के इंतजाम है। इसके बाद भी युवा यहां प्रशिक्षण में रुचि नहीं दिखा रहे है। इसकी वजह स्किल पार्क में एडमिशन के लिए आईटीआई और डिप्लोमा की बाध्यता है।
खाली रह गईं थीं सीट
ग्लोबल स्किल पार्क में पहले बैच में ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और AI की हाईटेक लैब शुरू की गई थी। काफी प्रचार प्रसार और सुविधाएं देने के बाद भी प्रशिक्षण के लिए युवा आगे नहीं आए हैं।
इस वजह से पहले बैच में ही 60% सीटें खाली रह गईं थीं। युवाओं का कहना है कि कोर्स करने के लिए पहले साल या दो साल का डिप्लोमा, आईटीआई करना जरूरी है।
इसके अलावा इन कोर्सों में एडमिशन के लिए 10 से 15 हजार रुपए फीस देनी होती है। जबकि इन कोर्स से भी वहीं स्किल डेवलप होती है जो आईटीआई के ट्रेड से मिलती है।
सरकार का एडवांस प्लान फेल
सरकार का दावा था कि इस ड्रीम प्रोजेक्ट से युवा इंटरनेशनल जॉब के लिए तैयार होंगे। जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। एडवांस कोर्स करने के बाद भी न तो युवाओं को इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन मिल रहा है। न ही अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, उद्योगों में जॉब मिल पा रही है।
युवाओं की बेरुखी की वजह
- आईटीआई में तीन से पांच हजार रुपए सालाना फीस है। वहीं ग्लोबल पार्क में एडमिशन पर 10 से 15 हजार खर्च होते हैं।
- आईटीआई में कोर्स करने में एक या दो साल लगते हैं। वहीं स्किल पार्क में एडमिशन के लिए पहले आईटीआई ट्रेड या फिर पॉलिटेक्निक डिप्लोमा की जरूरत होती है।
- ग्लोबल स्किल पार्क में ज्यादा फीस और लंबे प्रशिक्षण के बाद भी जॉब की 100 फीसदी गारंटी नहीं है।
FAQ
- 1500 करोड़ के ग्लोबल स्किल पार्क में युवा एडमिशन क्यों नहीं ले रहे?
ग्लोबल स्किल पार्क में फीस 50 हजार से 1 लाख तक है, जबकि ITI में 3-5 हजार सालाना। कोर्स 2 साल का है और प्लेसमेंट की गारंटी नहीं। ट्रेड भी ITI जैसे वेल्डर, फिटर, इलेक्ट्रीशियन हैं। हाईटेक लैब के बाद भी इंडस्ट्री लिंक नहीं है। इसी वजह से युवा ITI को तरजीह दे रहे। - ग्लोबल स्किल पार्क की व्यवस्था ITI जैसी कैसे है?
सरकार ने इंटरनेशनल लेवल का दावा किया था। पर कोर्स पारंपरिक ITI ट्रेड वाले हैं। फैकल्टी ITI के इंस्ट्रक्टर ही पढ़ा रहे। विदेशी एक्सपर्ट नहीं आए। कंपनियों से टाईअप कागजी है। अप्रेंटिसशिप नहीं मिल रही। प्लेसमेंट सेल निष्क्रिय है। करोड़ों का इंफ्रा है, पर आउटपुट ITI जैसा। - सरकार ने ग्लोबल स्किल पार्क पर कितना खर्च किया और क्या फायदा हुआ?
सिंगापुर के सहयोग से 1500 करोड़ रुपए खर्च कर ग्लोबल स्किल पार्क बनाया गया। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स, AI की लैब लगी हैं। पर पहले बैच में 60% सीटें खाली रहीं। इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन और विदेशी कंपनियों से करार नहीं हुआ। युवाओं को कोर्स का फायदा समझाया नहीं गया। फिलहाल फायदा नहीं दिख रहा।
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