संविदा स्वास्थ्यकर्मियों के नियमितीकरण को सरकार की हाईकोर्ट में चुनौती, जबलपुर-ग्वालियर और इंदौर मामलों की एक साथ होगी सुनवाई
सरकार ने पुराने आदेश को दी चुनौती
मध्य प्रदेश सरकार ने आयुष विभाग के संविदा स्वास्थ्यकर्मियों को उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण का लाभ देने के खिलाफ हाई कोर्ट में रिट अपील दायर की है। सरकार ने जबलपुर मुख्य पीठ में दायर अपील में एकल पीठ के 12 सितंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी है। इसी फैसले के आधार पर कई कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण, वरिष्ठता और दूसरे लाभ देने के निर्देश दिए गए थे।
एक फैसले से बढ़ते गए मामले
मामला राजेंद्र सिंह परिहार और विजय सिंह अहिरवार समेत कर्मचारियों से जुड़ा है। इन्हें वर्ष 2003 में संविदा आधार पर आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक कम्पाउंडर के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में राज्य सरकार की नीति के तहत 30 जून 2009 से नियमित किया गया। कर्मचारियों ने मांग की कि उन्हें नियमितीकरण का लाभ उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से दिया जाए।
हाई कोर्ट ने समान कर्मचारियों का हवाला दिया था
12 सितंबर 2024 को जस्टिस संजय द्विवेदी की एकल पीठ ने कर्मचारियों की याचिका स्वीकार की थी। कोर्ट ने कहा था कि समान स्थिति वाले कर्मचारियों को पहले ही पहली नियुक्ति से नियमितीकरण का लाभ दिया जा चुका है। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को इससे अलग नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्य को 30 दिन में नियमितीकरण आदेश जारी करने, उचित वरिष्ठता देने और दूसरे आनुषंगिक लाभ देने के निर्देश दिए थे।
सरकार का तर्क, पुराने आदेश में कानूनी गलती
सरकार का कहना है कि कुछ कर्मचारियों को पहली नियुक्ति से नियमितीकरण का लाभ पहले दिए जाने का आधार अलग था। सरकार के अनुसार 2 मई 2006 के निर्देशों के तहत धार, खरगोन और झाबुआ में बैकलॉग पदों के खिलाफ नियुक्त कर्मचारियों को यह लाभ दिया गया था। सरकार का दावा है कि बाद में कुछ अन्य कर्मचारियों को भी इसी तरह का लाभ गलती से मिला।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
सरकार ने अपनी अपील में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया है। इसमें कहा गया है कि कोर्ट ऐसा परमादेश जारी नहीं कर सकता, जो कानून या वैधानिक नियमों के विपरीत हो। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि पहले का कोई आदेश यदि बाध्यकारी कानून या प्राधिकार पर विचार किए बिना पारित हुआ है, तो उसे per incuriam माना जा सकता है।
इंदौर और ग्वालियर के मामले भी जबलपुर आए
इस विवाद से जुड़े इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ के मामलों को भी जबलपुर मुख्य पीठ में एक साथ सुनने के लिए ट्रांसफर किया गया है। इंदौर से 18 रिट अपील और 3 रिट याचिकाएं सूचीबद्ध हैं। ग्वालियर से 6 रिट याचिकाएं इस विवाद से जुड़ी हैं। इनमें कम्पाउंडर, दवासाज और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के मामले शामिल हैं।
सरकार चाहती है सभी मामलों की एक साथ सुनवाई
सरकार की ओर से दायर आवेदन में कहा गया है कि सभी समान मामलों की सुनवाई एक ही जगह होनी चाहिए। इसका उद्देश्य अलग-अलग खंडपीठों से अलग या विरोधाभासी आदेश आने की स्थिति से बचना है। मुख्य अपील WA 2535/2026 के साथ दूसरे लंबित मामलों को भी जोड़ने का आग्रह किया गया है।
मंगलवार की सुनवाई में कर्मचारियों ने क्या कहा
6 अक्टूबर को जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच में मामले की सुनवाई हुई। सरकार की ओर से अन्य बेंचों में लंबित दो और याचिकाओं को भी इस मामले के साथ लगाने का अनुरोध किया गया।
कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि सरकार की अपील सारहीन है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि इसी तरह के मामले में सरकार सुप्रीम कोर्ट तक जा चुकी है, फिर भी कर्मचारियों को लाभ से वंचित करने के लिए दोबारा अपील की गई है।
अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को
कोर्ट ने फिलहाल दूसरे मामलों को लिस्ट करने के लिए समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी। यदि सभी संबंधित प्रकरण एक साथ सुने जाते हैं, तो इसका असर मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में नियुक्त सैकड़ों संविदा स्वास्थ्यकर्मियों के नियमितीकरण और उनकी वरिष्ठता से जुड़े दावों पर पड़ सकता है।
FAQ:
- मध्य प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट में क्या चुनौती दी है?
मध्य प्रदेश सरकार ने आयुष विभाग के संविदा कर्मचारियों को उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण के लाभ देने के खिलाफ हाई कोर्ट में रिट अपील दायर की है। - कौन से मामलों की संयुक्त सुनवाई हाई कोर्ट में हो रही है?
हाई कोर्ट में जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर के संविदा स्वास्थ्य कर्मियों के मामलों की संयुक्त सुनवाई की जा रही है। - सरकार का नियमितीकरण को लेकर क्या तर्क है?
सरकार का तर्क है कि कुछ कर्मचारियों को पहली नियुक्ति से नियमितीकरण का लाभ अलग आधार पर दिया गया था, और यह कि पहले का आदेश कानूनी गलती के कारण बाध्यकारी नहीं हो सकता।