मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को HC से फिर राहत, नामांकन में संपत्ति छुपाने के थे आरोप

Neel Tiwari | Aug 05, 2026, 19:03 IST
मंत्री गोविंद सिंह राजपूत
मध्य प्रदेश के मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को हाई कोर्ट से एक बार फिर राहत मिली है। कोर्ट ने संपत्ति छिपाने के आरोप वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि चुनाव से जुड़े ऐसे विवाद केवल चुनाव याचिका के जरिए ही उठाए जा सकते हैं।

ऐसे समझें पूरा मामला..

  • याचिका में आरोप था कि गोविंद सिंह राजपूत ने चुनावी हलफनामे में कुछ संपत्तियां नहीं बताईं।
  • शिकायत विधानसभा चुनाव 2023 के नतीजे आने के काफी समय बाद की गई।
  • याचिकाकर्ता ने समय रहते चुनाव याचिका दायर नहीं की थी।
  • हाई कोर्ट ने कहा कि चुनाव विवाद का रास्ता केवल चुनाव याचिका है।
  • इसी आधार पर कोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर मंत्री को राहत दे दी।

मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को हाई कोर्ट से एक बार फिर बड़ी राहत मिली है। जबलपुर हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ दायर नई रिट याचिका खारिज कर दी। याचिका में आरोप था कि उन्होंने 2023 विधानसभा चुनाव के दौरान अपने हलफनामे में कुछ संपत्तियों की जानकारी छिपाई थी। अदालत ने साफ कहा कि ऐसे विवाद रिट याचिका से नहीं, बल्कि चुनाव याचिका के जरिए ही तय होते हैं।



कोर्ट ने किस आधार पर याचिका खारिज की

एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329(बी) चुनावी मामलों में स्पष्ट व्यवस्था देता है। चुनाव पूरा होने और परिणाम घोषित होने के बाद उसकी वैधता पर सवाल केवल चुनाव याचिका के माध्यम से उठाया जा सकता है। इसलिए रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।



अदालत ने कहा कि चुनाव कानून का पूरा ढांचा इसी सिद्धांत पर बना है। यदि कोई उम्मीदवार चुनाव परिणाम को चुनौती देना चाहता है तो उसे तय समय सीमा के भीतर चुनाव याचिका दायर करनी होती है।



क्या थे गोविंद सिंह राजपूत पर लगाए गए आरोप

याचिकाकर्ता राजकुमार सिंह ने दावा किया था कि सुरखी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले गोविंद सिंह राजपूत ने फॉर्म-26 में अपनी, अपनी पत्नी और ज्ञानवीर सेवा समिति से जुड़ी कुछ अचल संपत्तियों का पूरा खुलासा नहीं किया। इसी आधार पर उन्होंने जांच और कार्रवाई की मांग की थी।



याचिका में यह भी कहा गया था कि चुनाव अधिकारियों ने उनकी शिकायत पर कार्रवाई नहीं की। इसलिए हाई कोर्ट से अधिकारियों को जांच के निर्देश देने की मांग की गई थी।



कोर्ट ने देरी को भी माना अहम कारण

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि गोविंद सिंह राजपूत ने 30 अक्टूबर 2023 को नामांकन दाखिल किया था। चुनाव परिणाम 17 नवंबर 2023 को घोषित हुआ था। इसके बाद कानून के अनुसार 45 दिन के भीतर चुनाव याचिका दायर की जा सकती थी। लेकिन याचिकाकर्ता ने यह रास्ता नहीं अपनाया। उन्होंने मार्च 2025 में चुनाव अधिकारियों के पास शिकायत दी। अदालत ने कहा कि तय समय बीत जाने के बाद उसी विवाद को रिट याचिका के जरिए दोबारा नहीं उठाया जा सकता।



चुनाव अधिकारियों के अधिकार पर भी कोर्ट ने दी स्पष्ट राय

खंडपीठ ने कहा कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद रिटर्निंग अधिकारी और जिला चुनाव प्रशासन का अधिकार समाप्त हो जाता है। इसके बाद वे उम्मीदवार के हलफनामे की दोबारा जांच या फैसला नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि चुनाव अधिकारियों ने शिकायत पर कार्रवाई से इनकार करके कोई गलती नहीं की। उन्होंने कानून के मुताबिक ही जवाब दिया था।



सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी लिया सहारा

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि एन.पी. पोन्नुस्वामी मामले से लेकर हुकुमदेव नारायण यादव मामले तक सुप्रीम कोर्ट लगातार यही कहता आया है कि चुनाव विवाद का एकमात्र वैधानिक उपाय चुनाव याचिका है। खंडपीठ ने कहा कि इस सिद्धांत से हटकर रिट याचिका स्वीकार करना चुनाव कानून की पूरी व्यवस्था के विपरीत होगा।



झूठे हलफनामे पर कानून क्या कहता है

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी उम्मीदवार ने गलत या अधूरी जानकारी दी हो तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-ए के तहत अलग दंडात्मक व्यवस्था मौजूद है। लेकिन ऐसी कार्रवाई भी तय प्रक्रिया और समय सीमा के भीतर ही हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में शिकायत उस समय सीमा के बाद की गई थी। इसलिए उस आधार पर भी कोई राहत नहीं दी जा सकती।



पहले भी मिल चुकी है ऐसी ही राहत

यह पहला मौका नहीं है जब गोविंद सिंह राजपूत को इस तरह की राहत मिली हो। इससे पहले भी हाई कोर्ट ने इसी तरह के चुनावी विवाद में कहा था कि चुनाव परिणाम से जुड़े आरोपों की सुनवाई केवल चुनाव याचिका के माध्यम से हो सकती है। ताजा फैसले में भी अदालत ने उसी कानूनी सिद्धांत को दोहराया है।



हाई कोर्ट का अंतिम फैसला क्या रहा

खंडपीठ ने कहा कि याचिका में कोई कानूनी आधार नहीं बनता। चुनाव कानून में उपलब्ध वैधानिक उपाय का उपयोग नहीं किया गया। इसलिए रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। इसी के साथ अदालत ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने किसी भी पक्ष पर लागत नहीं लगाई।



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