गोविन्द सिंह राजपूत को हाईकोर्ट से राहत, रिट खारिज, नामांकन में संपत्ति छुपाने के लगे थे आरोप
समझें क्या है पूरा मामला...
- सुरखी सीट से हारे उम्मीदवार नीरज शर्मा ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
- आरोप था कि गोविंद सिंह राजपूत ने नामांकन में पूरी संपत्ति की जानकारी नहीं दी।
- याचिका में चुनाव आयोग को कार्रवाई के निर्देश देने की मांग की गई थी।
- हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवाद रिट से नहीं, चुनाव याचिका से तय होते हैं।
- इसी तरह के आरोपों वाली एक दूसरी याचिका अभी भी हाई कोर्ट में लंबित है।
गोविंद सिंह राजपूत को हाई कोर्ट से राहत
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भाजपा विधायक गोविंद सिंह राजपूत को बड़ी कानूनी राहत दी है। कोर्ट ने उनके खिलाफ झूठी जानकारी देकर नामांकन दाखिल करने के आरोप वाली रिट याचिका खारिज कर दी।
खंडपीठ ने साफ कहा कि चुनाव या नामांकन से जुड़े विवादों के लिए कानून में अलग व्यवस्था है। ऐसे मामलों में सीधे रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने बताया चुनाव विवाद का सही कानूनी रास्ता
बता दें कि यह फैसला एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329(b) चुनावी मामलों में अदालत के हस्तक्षेप की सीमा तय करता है।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 भी चुनाव विवादों के निपटारे का स्पष्ट तरीका बताता है। इसलिए चुनाव परिणाम या नामांकन को चुनौती केवल चुनाव याचिका से ही दी जा सकती है।
क्या था नीरज शर्मा का आरोप
यह मामला सागर जिले की सुरखी विधानसभा सीट से जुड़ा है। राहतगढ़ निवासी नीरज शर्मा ने वर्ष 2023 का विधानसभा चुनाव इसी सीट से लड़ा था।
चुनाव में भाजपा उम्मीदवार गोविंद सिंह राजपूत विजयी हुए थे। हार के बाद नीरज शर्मा ने आरोप लगाया कि विधायक ने नामांकन पत्र और शपथ पत्र में अपनी संपत्तियों की पूरी जानकारी नहीं दी। उनका कहना था कि महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए।
चुनाव आयोग को दिया था आवेदन
याचिकाकर्ता ने चुनाव परिणाम आने के बाद भारत निर्वाचन आयोग को शिकायत भेजी थी। शिकायत में विधायक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई।
बाद में इसी शिकायत पर निर्णय कराने के लिए हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की गई। याचिका में चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश देने की मांग भी की गई थी।
कोर्ट में क्या दलील दी गई
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हर्ष जैन ने पक्ष रखा। उनका कहना था कि नीरज शर्मा चुनाव में बहुत कम अंतर से हारे थे। यदि पूरी जानकारी सामने होती तो चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकता था। इसलिए मामले में कार्रवाई जरूरी है।
राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी उपस्थित हुए। चुनाव आयोग की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ शर्मा ने पक्ष रखा।
विधायक गोविंद सिंह राजपूत की ओर से अधिवक्ता विवेक रंजन पांडे ने दलीलें दीं। सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पहले याचिका के सुनवाई योग्य होने पर विचार किया।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की रिट
खंडपीठ ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम चुनाव विवादों के लिए पूरा कानूनी ढांचा देता है। अधिनियम की धारा 80 साफ कहती है कि चुनाव को केवल चुनाव याचिका से ही चुनौती दी जा सकती है।
धारा 80-A हाई कोर्ट को ऐसी याचिकाओं की विशेष अधिकारिता देती है। वहीं धारा 81 चुनाव याचिका दायर करने की समय सीमा भी तय करती है।
कोर्ट ने कहा कि जब प्रभावी वैधानिक उपाय पहले से मौजूद है, तब रिट याचिका का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि निर्वाचन आयोग को शिकायत पर निर्णय देने का निर्देश भी इस रिट में नहीं दिया जा सकता। इसी आधार पर याचिका को गलत कानूनी धारणा पर आधारित मानते हुए खारिज कर दिया गया।
इस फैसले का बड़ा संदेश
हाई कोर्ट का यह फैसला चुनाव कानून के लिहाज से अहम माना जा रहा है। अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े विवादों के लिए अलग कानूनी व्यवस्था बनी हुई है।
यदि कोई उम्मीदवार नामांकन, चुनाव परिणाम या शपथ पत्र को चुनौती देना चाहता है, तो उसे चुनाव याचिका का रास्ता अपनाना होगा। रिट याचिका ऐसे मामलों का विकल्प नहीं बन सकती।
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