दादा आदिवासी, पिता ओबीसी, पोता सामान्य वर्ग, शासन की गलती से 30 हजार लोग परेशान
गुना जिले के खैरुवा समाज की जाति पहचान बीते 25 साल में तीन बार बदली है। साल 2000 से पहले समाज को आदिवासी यानी एसटी (ST – Scheduled Tribe) का दर्जा मिला था। इसके बाद समाज को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी (OBC – Other Backward Class) की सूची में डाल दिया गया। साल 2018 में समाज को ओबीसी की सूची से भी हटा दिया गया। अब डिजिटल पोर्टल पर नाम न होने से नई पीढ़ी सीधे सामान्य वर्ग में दर्ज हो रही है।
एक परिवार,एक खून, तीन जातियां
गुना जिले के करीब 18 गांवों में खैरुवा समाज के हजारों परिवार रहते हैं। इनकी जातीय पहचान अफसरों के फैसलों के कारण उलझती चली गई। आज हालात यह हैं कि एक ही परिवार में तीन पीढ़ियां तीन अलग वर्गों में दर्ज हैं। बुजुर्ग दादा कागजों में आदिवासी हैं। उनके बेटे ओबीसी का प्रमाण पत्र लिए घूम रहे हैं। और साल 2018 के बाद जन्मी नई पीढ़ी को सामान्य वर्ग में डाल दिया गया है। खून एक है, परिवार एक है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में जातियां तीन हो चुकी हैं। इस उलझन से समाज के करीब 25 से 30 हजार लोगों का भविष्य दांव पर है।
कैसे बदली पहचान
समाज के बुजुर्गों के पास साल 1979 के भूमि पट्टे और पुराने दस्तावेज हैं। इनमें उन्हें गोंड आदिवासी के रूप में दर्ज किया गया था। इसी आधार पर उन्हें एसटी प्रमाण पत्र मिले थे। साल 2000 के बाद प्रशासनिक फेरबदल में समाज को अचानक ओबीसी सूची में डाल दिया गया। फिर 9 अगस्त 2018 के बाद पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने एक अधिसूचना जारी की। इस अधिसूचना से खैरुवा जाति को ओबीसी सूची के क्रमांक 58 से भी हटा दिया गया।
गुना के कई गांवों की कहानी
भैंरो घाटी और बन्ना खेड़ा जैसे गांवों में यह विरोधाभास साफ दिखता है। भैंरो घाटी में मोनू और बद्रीलाल के पास गोंड आदिवासी का प्रमाण पत्र है। लेकिन उनके बेटों भूरा और गिरराज को ओबीसी का स्थाई प्रमाण पत्र मिला। अब उनके बेटों की अगली पीढ़ी सामान्य वर्ग में जा चुकी है। बन्ना खेड़ा में बुजुर्ग अमरसिंह का रिकॉर्ड भी गोंड आदिवासी का है। उनके बेटे धर्मेंद्र सिंह के पास ओबीसी सर्टिफिकेट है। धर्मेंद्र के 2018 के बाद जन्मे बच्चों को अब सामान्य वर्ग माना जा रहा है।
पोर्टल से गायब नाम
प्रदेश में जब डिजिटल जाति प्रमाण पत्र की ऑनलाइन व्यवस्था लागू हुई, तब एक बड़ी चूक हुई। पोर्टल के जाति चयन वाले ड्रॉप-डाउन मेन्यू से खैरुवा नाम ही गायब कर दिया गया। पोर्टल पर नाम न होने से नई पीढ़ी के बच्चों के सर्टिफिकेट अब नहीं बन रहे। ऐसे में वे अपने आप सामान्य वर्ग में दर्ज हो जा रहे हैं। इससे शिक्षा और नौकरी में मिलने वाले आरक्षण के लाभ से भी वे वंचित हो रहे हैं।
खैर की लकड़ी के नाम पर जाति
समाज के बुजुर्गों के अनुसार उनके पूर्वज साल 1960 के आसपास इस इलाके में आकर बसे थे। वे छतरपुर, सागर, रायसेन और झांसी क्षेत्र से गुना और आरोन तहसील में आए थे। ये लोग परंपरागत रूप से खैर के पेड़ की लकड़ी से कत्था बनाने का काम करते थे। इसी वजह से इनका नाम खैरुआ या खैरुवा पड़ गया।
समाज का दावा है कि खैरुवा और खैरवार एक ही मूल समुदाय की दो शाखाएं हैं। मध्यप्रदेश के ही विदिशा जिले के सिरोंज क्षेत्र में खैरवार समुदाय को पूरी तरह एसटी का दर्जा और लाभ मिल रहा है। समाज का सवाल है कि गुना के खैरुवा समाज के साथ यह भेदभाव क्यों हो रहा है।
प्रशासन का जवाब
इस समस्या के समाधान के लिए जिला स्तर पर एक कमेटी बनाई गई है। इस कमेटी की अध्यक्षता अपर कलेक्टर करेंगे। प्रभावित परिवारों से अपील की गई है कि वे अपने दस्तावेजों के साथ प्रतिनिधिमंडल भेजें। कमेटी हर मामले की अलग से जांच करेगी।
ADM की कमेटी कर रही जांच
गुना जिला कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल ने बताया कि इन मामलों के लिए जिला स्तर पर अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है। जिन लोगों को इस तरह की समस्या आ रही है, वे अपना एक प्रतिनिधिमंडल सभी दस्तावेजों के साथ भेज दें। इस कमेटी में उनके मामले की जांच हो जाएगी। अगर जिला स्तर पर इस समस्या का निराकरण संभव होगा तो कर दिया जाएगा। नहीं तो मामला प्रदेश स्तर पर भेज देंगे।
FAQ
- खैरुवा समाज की जाति समस्या क्या है?
गुना जिले में एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां तीन अलग जातियों में दर्ज हैं। दादा आदिवासी, पिता ओबीसी और पोता सामान्य वर्ग में है। यह गड़बड़ी सरकारी नीतियों में बदलाव से हुई है। - पोर्टल पर खैरुवा नाम क्यों गायब है?
डिजिटल जाति प्रमाण पत्र पोर्टल के ड्रॉप-डाउन मेन्यू में खैरुवा जाति का विकल्प नहीं जोड़ा गया। इस वजह से नई पीढ़ी के सर्टिफिकेट नहीं बन पा रहे हैं। वे अपने आप सामान्य वर्ग में दर्ज हो रहे हैं। - इस समस्या के समाधान के लिए प्रशासन के क्या किया है?
गुना जिला प्रशासन ने अपर कलेक्टर की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है। प्रभावित परिवार अपने दस्तावेजों के साथ आवेदन दे सकते हैं। जरूरत पड़ने पर मामला प्रदेश स्तर पर भी भेजा जाएगा।
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