एमपी में हर महीने गायब हो रहे नाबालिग, मोबाइल फोन और मां-बाप की डांट से छोड़ रहे घर
समझें क्या है पूरा मामला...
- ग्वालियर में बच्चों के घर छोड़ने के मामले बढ़ रहे हैं।
- ज्यादातर बच्चे मोबाइल पर डांट पड़ने से नाराज होते हैं।
- जनवरी 2025 से 19 जून 2026 तक शहर से 571 बच्चे लापता हुए हैं।
- इनमें से 549 बच्चों को पुलिस ने ढूंढ लिया है।
- पुलिस के मुताबिक ज्यादातर मामलों की वजह मोबाइल और सोशल मीडिया से जुड़े विवाद हैं।
मोबाइल बना सबसे बड़ी वजह
ग्वालियर में बच्चों के घर छोड़ने की घटनाएं अब आम होने लगी हैं। ज्यादातर मामलों में वजह बहुत छोटी होती है। मां ने मोबाइल चलाने पर डांटा। पिता ने पढ़ाई पर ध्यान न देने की बात कही। बस इतनी सी बात पर बच्चे गुस्से में घर से निकल जाते हैं।
पुलिस के आंकड़े इस बढ़ती समस्या को साफ दिखाते हैं। डेढ़ साल में औसतन हर महीने 33 बच्चे घर छोड़ रहे हैं। यह आंकड़ा हर परिवार के लिए चिंता की बात है। मोबाइल और सोशल साइट्स बच्चों को परिवार से दूर ले जा रहे हैं।
इस साल अब तक के आंकड़े
जानकारी के अनुसार साल 2026 में अब तक 190 बच्चे लापता हुए हैं। इनमें 140 बच्चियां और 50 बच्चे शामिल हैं। पुलिस अब तक 175 बच्चों को बरामद कर चुकी है। बाकी बच्चों की तलाश अभी जारी है।
लड़कियों के लापता होने का आंकड़ा लड़कों से कहीं ज्यादा है। इसकी वजह सोशल मीडिया पर बढ़ती ऑनलाइन दोस्ती बताई जा रही है। ऑनलाइन दोस्ती बच्चों को परिवार से दूर कर रही है।
मुरैना के ढाबे पर मिला छात्र
उदाहरण से समझें तो गोला का मंदिर क्षेत्र का एक 12 वर्षीय छात्र मोबाइल पर गेम खेल रहा था। मां ने उसे रोका और फोन रख लिया। बच्चा नाराज होकर घर से निकल गया। पुलिस ने उसे मुरैना के पास एक हाईवे ढाबे से बरामद किया।
दोस्त से झगड़े के बाद घर छोड़ा
मुड़िया पहाड़ का 10 वर्षीय बच्चा अपने दोस्त से झगड़ चुका था। शिकायत मिलने पर मां ने उसे डांटा। इससे बच्चा नाराज होकर घर से निकल गया। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के सहारे उसे चेतकपुरी की झुग्गी बस्ती से बरामद किया।
टूटे मोबाइल के डर से 6 साल का बच्चा भागा
पुरानी छावनी के रुद्रपुरा इलाके में एक 6 साल के नाबालिगका मोबाइल टूट गया था। मां की डांट के डर से उसने फोन छिपा दिया था। इसके बाद वह घर से ही निकल गया। पुलिस जवानों ने रातभर 40 किलोमीटर के दायरे में तलाश की। आठ घंटे बाद बच्चा सुरक्षित मिल गया।
पढ़ाई की डांट से अहमदाबाद पहुंचा किशोर
शहर के चार शहर का नाका इलाके का एक किशोर पढ़ाई को लेकर पिता की डांट से नाराज हुआ था। इससे वह घर छोड़कर निकल गया था। परिजन की शिकायत के बाद पुलिस ने उसकी लोकेशन ट्रेस की। बाद में वह अहमदाबाद की एक दुकान पर काम करता मिला।
भोपाल में हर दिन लापता नाबालिग बच्चियां
ग्वालियर के अलावा पुलिस के रिकॉर्ड ने भोपाल शहर में बेटियों की सुरक्षा को लेकर एक नई चिंता खड़ी कर दी है। आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या किसी एक साल की बात नहीं है। यह लगातार तीन साल से बनी हुई है।
पुलिस के अनुसार साल 2023 में 616 नाबालिग बेटियों के लापता होने पर अपहरण के मामले दर्ज हुए थे। साल 2024 में यह संख्या 721 तक पहुंच गई थी। साल 2025 में भी 631 केस दर्ज हुए थे। तीनों साल मिलाकर यह आंकड़ा 1968 तक जा पहुंचा है।
इस साल (2026) के महीनों में ही 316 मामले दर्ज हुए हैं। यह रफ्तार बताती है कि साल के अंत तक यह संख्या फिर 600 के पार जा सकती है। पुलिस के लिए यह आंकड़ा एक बार फिर अलार्म की तरह सामने आया है।
बच्चियों को ढूंढने में पुलिस की भूमिका
पुलिस का दावा है कि हर लापता बच्ची की तलाश के लिए अलग टीम बनाई जाती है। मोबाइल ट्रैकिंग, सीसीटीवी फुटेज और साइबर सेल की मदद ली जाती है। ज्यादातर मामलों में बच्चियां बरामद भी कर ली जाती हैं।
हालांकि पुलिस यह भी मानती है कि कई बार बच्चियां खुद घर छोड़कर जाती हैं। इस वजह से शुरुआती जांच में देरी होती है। परिवार को सही जानकारी मिलने में वक्त लगता है।
किस उम्र की बेटियां सबसे ज्यादा प्रभावित
भोपाल पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार लापता होने वाली बच्चियों की उम्र 17 साल तक होती है। इनमें 12 से 17 साल की किशोरियां सबसे ज्यादा शामिल हैं। हालांकि 6 से 10 साल की छोटी बच्चियों के मामले भी दर्ज हुए हैं।
यह आंकड़ा दिखाता है कि खतरा सिर्फ किशोरावस्था तक सीमित नहीं है। छोटी उम्र की बच्चियां भी इस सूची में शामिल हैं। यही वजह है कि अभिभावकों के लिए सतर्कता उम्र के हर पड़ाव पर जरूरी हो गई है।
सोशल मीडिया बनी बड़ी वजह
जांच में सामने आया है कि ज्यादातर मामलों में बच्चियां जान-पहचान वाले लोगों के साथ गई हैं। कुछ मामलों में सोशल मीडिया के जरिए हुआ संपर्क भी वजह बना है।
पुलिस के अनुसार प्रेम प्रसंग, ऑनलाइन दोस्ती, नौकरी का झांसा और बेहतर जिंदगी का सपना दिखाकर भी बच्चियों को घर से बाहर ले जाया गया। कुछ मामलों में मानव तस्करी, जबरन मजदूरी और शोषण की आशंका भी जताई गई है।
पुलिस और परिवार के लिए क्या जरूरी
महिला डीएसपी शिखा सोनी का कहना है कि बच्चों से संवाद बनाना सबसे जरूरी है। डांट के बजाय बातचीत से समस्या जल्दी सुलझ सकती है। परिवारों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर भी ध्यान देना चाहिए। साथ ही उनकी भावनाओं को समझना भी जरूरी है।
ये खबरें भी पढ़िए...
भोपाल में हर दिन लापता हो रही नाबालिग बच्चियां, बहकावे में घर छोड़ रहीं मासूम
एमपी न्यूज: हर दिन 90 से ज्यादा महिलाएं बन रहीं अपराध का शिकार, एनसीआरबीरिपोर्ट में खुलासा
मध्यप्रदेश न्यूज, भ्रूण हत्या और महिलाओं से अत्याचार में नंबर एक पर एमपी, एनसीआरबी रिपोर्ट में खुलासा
क्राइम न्यूज: लव मैरिज हो या अरेंज, एमपी में हर दिन हो रही एक ट्विशा की मौत, चौंकाएंगे ये आंकड़े