ग्वालियर नगर निगम में फर्जीवाड़ा: दादा को पिता बताकर ली अनुकंपा नियुक्ति
सरकारी नौकरी का आकर्षण इंसान से क्या कुछ नहीं करा देता। ग्वालियर नगर निगम में एक ऐसा ही हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां व्यवस्था की आंखों में धूल झोंककर एक शख्स ने सरकारी कुर्सी हथियाने के लिए अपने खून के रिश्ते को ही फाइलों में बदल डाला।
जो शख्स असल जिंदगी में दादा था, उसे कागजों पर पिता बना दिया गया। साथ ही, नियमों को ताक पर रखकर अनुकंपा नियुक्ति हासिल कर ली गई। यह सनसनीखेज फर्जीवाड़ा किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा है, लेकिन इसके पुख्ता सबूत अब सरकारी फाइलों में दर्ज हो चुके हैं।
नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय, भोपाल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी कर्मचारी देवानंद बरैया पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। इसके सहित तत्कालीन निगमायुक्त, अपर आयुक्त और कार्यालय अधीक्षक पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।
मुर्दा भी करने लगा नौकरी और ऑडिट पर उठी उंगली
जांच के दौरान जो सबसे चौंकाने वाला सच सामने आया, उसने नगर निगम के ऑडिट विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। रिकॉर्ड के मुताबिक, मृत कर्मचारी नारायण सिंह बरैया ने 17 फरवरी 1999 को अपनी 60 वर्ष की आयु पूरी कर ली थी। नियमों के तहत उन्हें उसी वक्त रिटायर हो जाना चाहिए था। इसके बावजूद, उन्हें नियमों के विपरीत जाकर सेवा में बनाए रखा गया था।
31 मार्च 2001 को नारायण सिंह का निधन हो गया था। इसके बाद उनके आश्रितों को जो भुगतान किया गया, उस पर भी ऑडिट विभाग ने गंभीर आपत्ति दर्ज की थी। साफ है कि जिस सर्विस रिकॉर्ड के दम पर बाद में अनुकंपा नियुक्ति का दावा ठोका गया, वह रिकॉर्ड खुद पहले से ही सवालों के घेरे में था।
शादी के कार्ड से खुला राज
मिली जानकारी के अनुसार, आरोपी देवानंद बरैया का सच सालों पहले उसके खुद के विवाह पत्र में छप चुका था। साल 2000 में छपे शादी के कार्ड (Wedding Card) में देवानंद बरैया को स्पष्ट रूप से लालता प्रसाद का सुपुत्र (Son) और नारायण सिंह का सुप्रौत्र यानी पोता (Grandson) बताया गया था।
सिर्फ शादी का कार्ड ही नहीं, बल्कि नारायण सिंह द्वारा की गई एक रजिस्टर्ड वसीयत (Registered Will) में भी देवानंद को उनका पोता ही घोषित किया गया है। यहीं से कानून का सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि जब देवानंद पोता था, तो वह नियमों के मुताबिक अनुकंपा नियुक्ति का पात्र कैसे बन गया?
एक में पिता लालता, तो दूसरी में नारायण सिंह
सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर करने के लिए देवानंद ने अपनी शैक्षणिक योग्यताओं के कागजात तक नहीं बख्शे। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय से मिली कक्षा 5वीं की मूल अंकसूची (Marksheet) में देवानंद के पिता का नाम लालता प्रसाद दर्ज है, जो 1996 की है।
वहीं, जब नगर निगम में नौकरी के लिए दस्तावेज जमा करने की बारी आई, तो वहां एक दूसरी मार्कशीट (1996) पेश की गई। इसमें पिता का नाम बदलकर चुपके से नारायण सिंह कर दिया गया था। जांच टीम को इन दोनों अंकसूचियों में न केवल पिता के नाम का अंतर मिला, बल्कि जन्मतिथि में भी गंभीर विसंगतियां और बदलाव देखने को मिले हैं।
जमीन की रजिस्ट्री और वोटर लिस्ट ने खोली जालसाजी की पोल
फर्जीवाड़े का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। 28 दिसंबर 2012 को हुए एक संपत्ति विक्रय पत्र के मुताबिक, देवानंद उर्फ देव आनंद ने अपनी मां काशी बाई के साथ मिलकर एक जमीन बेची थी। इस कानूनी दस्तावेज में देवानंद ने खुद के पिता का नाम स्व. लालता प्रसाद बरैया दर्ज कराया था। साथ ही, काशी बाई को भी लालता प्रसाद की पत्नी बताया गया था।
वहीं दूसरी ओर, साल 2026 में आकर जब वर्ष 2024 की मतदाता सूची को खंगाला गया, तो एक और बड़ा विरोधाभास सामने आया। इस वोटर लिस्ट में मां काशी बाई के पति का नाम तो लालता प्रसाद लिखा है, लेकिन उसी घर में रहने वाले देवानंद के पिता का नाम नारायण सिंह दर्ज है। एक ही परिवार के दो अलग-अलग सरकारी दस्तावेजों में मौजूद यह अंतर चीख-चीख कर धोखाधड़ी की गवाही दे रहा है।
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