पुलिस अफसरों पर केस रद्द,ग्वालियर हाईकोर्ट बोला आपराधिक कानून बदले का हथियार नहीं

Ratan Kumar Mishra | Aug 04, 2026, 23:42 IST
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ग्वालियर हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक संज्ञान आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि कानून का इस्तेमाल ईमानदारी से ड्यूटी करने वाले अधिकारियों को परेशान करने या बदले की भावना से नहीं किया जा सकता।

ग्वालियर हाईकोर्ट ने चार पुलिस अफसरों के खिलाफ चल रहा केस रद्द कर दिया। विशेष अदालत ने मई 2026 में इन अफसरों के खिलाफ संज्ञान लिया था। मामला एक वित्तीय विवाद में करीब 5.80 लाख रुपए की वसूली से जुड़ा है। पुलिसवालों पर प्रताड़ना और सबूत मिटाने के आरोप लगे थे। हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून बदले का जरिया नहीं बन सकता।



पूरा मामला क्या था

यह मामला थाटीपुर थाने से जुड़ा है। एक वित्तीय विवाद में समझौता होने के बाद विवाद खड़ा हुआ। आरोप है कि पुलिस अफसरों ने करीब 5.80 लाख रुपये की अवैध वसूली की। इसके साथ ही प्रताड़ना और सबूत से छेड़छाड़ के आरोप भी लगे।



मामले में सीसीटीवी फुटेज डिलीट मिलने की बात सामने आई थी। इसे गंभीर मानते हुए विशेष सत्र न्यायालय ने कार्रवाई के निर्देश दिए थे। विशेष न्यायाधीश (एमपी डकैती एवं अपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम), ग्वालियर ने 11 मई 2026 को यह आदेश पारित किया था।



इस आदेश में चार पुलिस अफसरों के खिलाफ संज्ञान लिया गया। इनमें तत्कालीन पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह चंदेल शामिल थे। इसके अलावा थाटीपुर थाने के तत्कालीन प्रभारी सुरेंद्रनाथ सिंह यादव भी नामजद थे। उप निरीक्षक अजय सिंह सिकरवार और आरक्षक संतोष वर्मा पर भी आरोप लगे।



इन अफसरों पर आईपीसी (IPC – Indian Penal Code) की धारा 392, 201 और 120-बी के तहत मामला दर्ज करने का आदेश था। साथ ही एमपीडीवीपीके (MPDVPK – MP Dacoity and Kidnapping Affected Areas Act) एक्ट की धारा 11/13 भी जोड़ी गई थी।



हाईकोर्ट का फैसला

चारों पुलिस अफसरों ने विशेष अदालत के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामला हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ की एकल पीठ में पहुंचा। सुनवाई के बाद अदालत ने विशेष न्यायालय का आदेश रद्द कर दिया।



हाईकोर्ट ने साफ कहा कि आपराधिक कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इसे सरकारी काम करने वाले अफसरों को प्रताड़ित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। साथ ही इसे बदले की भावना का जरिया भी नहीं बनने दिया जा सकता।



अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों की जिम्मेदारी है कि वे ईमानदार अफसरों को गलत मुकदमों से बचाएं। साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि असली शिकायतों की सही जांच हो। कोर्ट ने कहा कि दोनों बातों का ध्यान रखना जरूरी है।



अदालत ने यह भी माना कि विशेष अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश दिया। हाईकोर्ट के मुताबिक, विशेष अदालत ने ऐसा आदेश लिखा जैसे पूरा ट्रायल हो चुका हो। जबकि उस स्तर पर सिर्फ संज्ञान लेने पर विचार होना था।



अधिवक्ता की दलील

याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने पैरवी की। उन्होंने कहा कि सभी अफसर अपनी सरकारी ड्यूटी निभा रहे थे। ऐसे मामलों में केस चलाने से पहले सरकार की मंजूरी जरूरी होती है।



उन्होंने यह भी बताया कि वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट मंगवाना जरूरी था। साथ ही आरोपी अफसरों को अपनी बात रखने का मौका भी मिलना चाहिए था। विशेष अदालत ने इन नियमों का पालन नहीं किया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आदेश को गलत माना और उसे रद्द कर दिया।



आगे क्या होगा

फिलहाल चारों पुलिस अफसरों को बड़ी राहत मिली है। हालांकि मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सबकी नजर रहेगी। यह देखना होगा कि शिकायतकर्ता पक्ष इस फैसले को आगे चुनौती देता है या नहीं।



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