एनीमिया किट रेट का खेल: गुजरात में 2, MP में 10 वहीं राजस्थान में 20 रुपए में हो रही जांच

Aman Vaishnav | Aug 23, 2026, 09:45 IST
एनीमिया किट रेट का खेल
केंद्र सरकार के एनीमिया मुक्त भारत अभियान के बजट से राज्यों में हीमोग्लोबिन जांच उपकरण खरीदे जा रहे हैं। एक ही कंपनी के हीमोग्लोबिन टेस्ट उपकरण की कीमत अलग-अलग राज्यों के सरकारी अस्पतालों में 10 गुना तक अलग-अलग पाई गई है।

क्या है पूरा मामला...

हीमोग्लोबिन जांच किट की सरकारी खरीदी में राज्यों के बीच 10 गुना तक कीमत का अंतर मिला है। एक ही कंपनी आदित्य क्लीनिकल सिस्टम्स के सिस्टम पर यह फर्क है।



जानकारी के अनुसार गुजरात में यह जांच 2 रुपए में हो रही है, मध्य प्रदेश में 10.52 रुपए में। बिहार में दाम 13 रुपए और राजस्थान में 20 रुपए तक है। मध्य प्रदेश ने अब यह टेंडर रद्द कर दिया है।



जांच के लिए मीटर और क्यूवेट का इस्तेमाल

सरकारी अस्पतालों में हीमोग्लोबिन जांच के लिए मीटर और क्यूवेट इस्तेमाल होते हैं। यह जांच बताती है कि खून में हीमोग्लोबिन कितना है। एनीमिया यानी खून की कमी पकड़ने के लिए यह जांच जरूरी है। इसी जांच किट की खरीदी को लेकर अब सवाल खड़ा हुआ है।



सरकारी दस्तावेजों से पता चला है। एक ही कंपनी के रेट राज्यों में बहुत अलग हैं। गुजरात में यही जांच सिर्फ 2 रुपए में हो रही है। मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में दाम कहीं ज्यादा है। मामला अब कोर्ट तक पहुंच चुका है।



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दाम में कितना अंतर

बता दें कि आदित्य क्लीनिकल सिस्टम्स नाम की कंपनी यह सिस्टम पूरे देश में सप्लाई करती है। दस्तावेजों के अनुसार वडोदरा में एक टेस्ट पर करीब 2 रुपए लगते हैं। मध्य प्रदेश में यही टेस्ट 10.52 रुपए में हो रहा है। बिहार में यह दाम 13 रुपए है। राजस्थान में यह 20 रुपए तक पहुंच जाता है।



यानी सबसे महंगे और सबसे सस्ते रेट में करीब 10 गुना का फर्क है। सरकारी खरीदी में इतना बड़ा अंतर आमतौर पर नहीं दिखता। यही वजह है कि यह मामला सुर्खियों में आया है।



यह खरीदी केंद्र सरकार के एनीमिया मुक्त भारत अभियान के बजट से जुड़ी है। इस अभियान का मकसद एनीमिया की जांच आसान बनाना है। सरकारी अस्पतालों और आंगनवाड़ी केंद्रों तक यह सुविधा पहुंचानी होती है। ऐसे में खरीदी में पारदर्शिता बहुत मायने रखती है।



मप्र में टेंडर रद्द

मध्यप्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेस कॉरपोरेशन लिमिटेड ने टेंडर रद्द कर दिया है। कॉर्पोरेशन के एमडी (MD – Managing Director) मयंक अग्रवाल ने वजह बताई। उनके अनुसार डीलर के रेट अप्रूव नहीं हो पाए थे। इसी वजह से टेंडर रद्द करना पड़ा।



टेंडर रद्द होने से पहले एक डीलर की बोली सबसे कम थी। डीलर का नाम कंठाली ट्रेडर्स है। टेंडर की भाषा में इसे एल1 (L1 – Lowest Bidder) कहा जाता है। इस टेंडर की अनुमानित राशि 90.01 करोड़ रुपए थी। यह एक बड़ी सरकारी खरीदी मानी जा रही थी।



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किस पर कितना खर्च

इस टेंडर में 27 हजार 52 मीटर खरीदे जाने थे। इन मीटर पर करीब 5.67 करोड़ रुपए खर्च होने थे। सबसे बड़ा हिस्सा क्यूवेट पर खर्च होना था। क्यूवेट पर अकेले 88.80 करोड़ रुपए खर्च का प्रस्ताव था।



यानी कुल बजट का ज्यादातर हिस्सा क्यूवेट पर जाना था। मीटर एक बार खरीदा जाता है लेकिन क्यूवेट हर टेस्ट में इस्तेमाल होता है। इसी वजह से क्यूवेट का दाम पूरी योजना की लागत तय करता है। यही कारण है कि क्यूवेट के रेट पर सबसे ज्यादा सवाल उठे हैं।



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बोली में बड़ा फर्क

टेंडर प्रक्रिया में अलग-अलग बोलीदाताओं ने अलग-अलग दाम दिए थे। एक बोलीदाता ने मीटर की कीमत सिर्फ 1 रुपए रखी थी। उसी बोलीदाता ने क्यूवेट का दाम 11.70 रुपए रखा था।



वहीं कंठाली ट्रेडर्स ने मीटर की कीमत 1,997 रुपए बताई। इसी कंपनी ने क्यूवेट का दाम 9.89 रुपए रखा था।



मीटर की कीमत में यह अंतर हजारों गुना का है। एक तरफ मीटर सिर्फ 1 रुपए में मिल रहा था। दूसरी तरफ वही मीटर करीब 2000 रुपए में ऑफर हुआ। इतने बड़े अंतर ने अधिकारियों का ध्यान खींचा है।



सवाल यह है कि एक जैसे सामान में इतना फर्क कैसे है। सरकारी खरीदी में हर पैसा टैक्सपेयर का होता है। इसलिए गड़बड़ी की आशंका को गंभीरता से देखा जा रहा है। यही वजह है कि मामला अब कोर्ट में विचाराधीन है।



कंपनी का पक्ष

कंपनी के सीईओ आदित्य ठक्कर ने भी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि उनकी कंपनी पूरे भारत में सप्लाई करती है। अलग-अलग राज्यों में रेट अलग क्यों हैं, इसका जवाब उनके पास नहीं है।



सीईओ ने कहा कि मामला कोर्ट में है। इसलिए वे विस्तार से जवाब नहीं दे सकते। बिहार और मध्य प्रदेश के रेट में अंतर क्यों है, यह कोर्ट पूछेगा। तभी वे इसका जवाब देंगे।



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