नगरपालिका टैक्स घोटाला: पतंजलि फूड्स टैक्स राहत मामले में हाईकोर्ट ने EOW से मांगा जवाब
News In Short
- अधिकारियों ने नियमों के विरुद्ध भारी टैक्स राहत प्रदान की।
- कमर्शियल संपत्ति को कागजों में आवासीय श्रेणी में बदला गया।
- नगरपालिका को करीब 80 लाख रुपये के राजस्व का चूना लगा।
- हाईकोर्ट ने EOW को तीन सप्ताह में जवाब देने को कहा।
- परिषद की अनुमति के बिना गोपनीय तरीके से फैसला लिया गया।
News In Detail
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में एक बड़ा प्रशासनिक घोटाला सामने आया है। गाडरवारा नगरपालिका और पतंजलि फूड्स लिमिटेड के बीच सांठगांठ के आरोप लगे हैं। जबलपुर हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है।
न्यायालय ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ से अब तक की प्रगति पूछी है। राजस्व की चोरी और पद के दुरुपयोग का यह मामला अब कानूनी पेचीदगियों में फंस गया है।
हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अब कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) को नोटिस भेजा है। पतंजलि फूड्स से जुड़े टैक्स मामले में जवाब मांगा है। जांच एजेंसी को तीन हफ्ते का समय दिया गया है।
न्यायालय ने अब तक की जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा। जनहित याचिका (Public Interest Litigation) के बाद यह आदेश आया है। राजस्व हानि को लेकर कोर्ट काफी गंभीर नजर आया। भ्रष्टाचार के आरोपों पर अब स्टेटस रिपोर्ट अनिवार्य है। अधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए गए हैं।
करोड़ों का कथित टैक्स घोटाला
गाडरवारा नगर पालिका में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। पतंजलि की इकाई पर भारी टैक्स बकाया था। कुल राशि करीब 89 लाख रुपये निर्धारित की गई थी। लेकिन अधिकारियों ने इसे मात्र 9 लाख कर दिया। यह सीधे तौर पर 80 लाख की राजस्व हानि (Revenue Loss) है।
याचिकाकर्ता ने इसे एक बड़ा भ्रष्टाचार बताया है। पद का दुरुपयोग (Misuse of Office) कर राहत दी गई। सरकारी खजाने को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया गया है। इस हेरफेर ने प्रशासनिक सुस्ती की पोल खोल दी है।
श्रेणी बदलकर की गई टैक्स चोरी
घोटाले का तरीका बेहद शातिर और नियोजित था। औद्योगिक इकाई की संपत्ति को कमर्शियल (Commercial) माना गया था। नियमानुसार व्यावसायिक दर पर टैक्स वसूला जाना चाहिए था। लेकिन अधिकारियों ने इसे आवासीय (Residential) श्रेणी में बदल दिया।
आवासीय श्रेणी में टैक्स की दरें बहुत कम होती हैं। इस बदलाव के लिए कोई ठोस आधार नहीं था। दस्तावेजों में हेरफेर कर पतंजलि को लाभ पहुँचाया गया। यह टैक्स चोरी (Tax Evasion) का एक स्पष्ट उदाहरण है। इसकी जांच अब उच्च स्तर पर की जा रही है।
परिषद को रखा गया अंधेरे में
नगरपालिका परिषद की अनुमति इस मामले में अनिवार्य थी। किसी भी बड़े वित्तीय फैसले के लिए सहमति जरूरी है। लेकिन इस राहत की जानकारी पार्षदों को नहीं दी गई। इसे संकल्प पंजी में गुप्त तरीके से दर्ज किया गया।
प्रक्रियात्मक चूक (Procedural Lapse) को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। परिषद की बैठकों में इस पर चर्चा तक नहीं हुई। यह पारदर्शिता के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। बिना आधिकारिक प्रस्ताव के ही टैक्स राशि कम कर दी गई। प्रशासन ने पूरी प्रक्रिया को गोपनीय बनाए रखा।
राजनीतिक और सामाजिक हस्तक्षेप
सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र राजपूत ने यह लड़ाई शुरू की। उन्होंने कलेक्टर और मुख्य सचिव को शिकायत भेजी थी। कार्रवाई न होने पर उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
पूर्व मंत्री उमंग सिंघार ने भी इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जांच की मांग की थी। भ्रष्टाचार (Corruption) के खिलाफ अब जनता एकजुट हो रही है। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से न्याय की उम्मीद जगी है। अब EOW की रिपोर्ट पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होने की संभावना बढ़ गई है।
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