हाईकोर्ट का कुलाधिपति को नोटिस, RDVV मामले में बड़ा आदेश, प्रदेश का पहला मामला!
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला
- मामला रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. आरबी दुबे से जुड़ा है।
- हाईकोर्ट के पुराने आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना याचिका दायर हुई।
- कोर्ट ने राज्यपाल और कुलाधिपति मंगूभाई पटेल समेत तीन अधिकारियों को नोटिस भेजा।
- विवाद इस्तीफा वापस लेने और बकाया वेतन भुगतान से जुड़ा है।
- मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से जुड़े अवमानना मामले में राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति मंगूभाई पटेल समेत तीन अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। मामला सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. आरबी दुबे के वेतन और सेवा विवाद से जुड़ा है।
कुलाधिपति को नोटिस का पहला मामला!
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के एक पुराने मामले में बड़ा कदम उठाया है। अदालत ने विश्वविद्यालय के कुलाधिपति राज्यपाल मंगूभाई पटेल को नोटिस जारी किया है। उनके साथ कुलसचिव डॉ. रविशंकर सोनवाल और उप कुलसचिव स्थापना पवन साहू को भी जवाब देने के निर्देश मिले हैं। यह मामला अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है।
क्या प्रदेश में पहली बार कुलाधिपति को नोटिस मिला
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर यह मामला बेहद अलग माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े किसी विवाद में पहली बार कुलाधिपति को नोटिस जारी हुआ है। हालांकि इस दावे की कोई आधिकारिक सूची उपलब्ध नहीं है। फिर भी यह आदेश कानूनी हलकों में खास महत्व रखता है।
अदालत ने नोटिस क्यों जारी किया
यह मामला अवमानना याचिका क्रमांक 3247 वर्ष 2026 से जुड़ा है। याचिका डॉ. आरबी दुबे ने दायर की है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट के पुराने आदेश का पालन नहीं हुआ। सुनवाई के दौरान जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। अदालत ने जवाब पेश करने के निर्देश भी दिए हैं।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई
डॉ. आरबी दुबे की नियुक्ति 10 मई 2000 को रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में रीडर पद पर हुई थी। बाद में उन्होंने अपना इस्तीफा दिया। उन्होंने अनुरोध किया कि इस्तीफा 29 जुलाई 2006 से प्रभावी माना जाए। इसी समय से पूरा विवाद शुरू हुआ।
इस्तीफा वापस लेने के बाद क्या हुआ
रिकॉर्ड के अनुसार डॉ. दुबे ने प्रभावी तारीख से पहले अपना इस्तीफा वापस ले लिया था। उन्होंने 14 जुलाई 2006 को लिखित आवेदन दिया। इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने 13 जुलाई 2006 का आदेश जारी किया। उस आदेश में इस्तीफा स्वीकार करने की बात कही गई। इसी फैसले को बाद में अदालत में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने पहले क्या कहा था
इस मामले की पहले भी सुनवाई हो चुकी है। जस्टिस मनिंदर एस. भट्टी की पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला दिया था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रभावी तारीख से पहले कर्मचारी अपना इस्तीफा वापस ले सकता है। ऐसे में वापस लिया गया इस्तीफा स्वीकार करना कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
अब वेतन और बकाया भुगतान पर लड़ाई
डॉ. दुबे का कहना है कि अदालत से राहत मिलने के बाद भी उन्हें पूरा लाभ नहीं मिला। उनका दावा है कि वेतन और अन्य बकाया राशि अब भी लंबित है। इसी कारण उन्होंने फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना है कि पुराने आदेश का पूरा पालन होना चाहिए।
कोर्ट के आदेश का पालन क्यों बना बड़ा सवाल
अवमानना याचिका का मुख्य आधार यही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अदालत के आदेश के बाद भी कार्रवाई पूरी नहीं हुई। इसी वजह से हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। अब अदालत यह देखेगी कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ।
अगली सुनवाई में क्या होगा
मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को तय हुई है। इस दिन सभी संबंधित पक्ष अपना जवाब पेश कर सकते हैं। अदालत उनके जवाब के आधार पर आगे का फैसला करेगी। इस सुनवाई पर विश्वविद्यालय और राजभवन दोनों की नजर रहेगी।
इस मामले का व्यापक असर
यह मामला केवल एक कर्मचारी के वेतन तक सीमित नहीं है। यह अदालत के आदेशों के पालन और विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही से भी जुड़ा है। आने वाला फैसला भविष्य के कई मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इसलिए कानूनी विशेषज्ञ भी इस सुनवाई पर नजर बनाए हुए हैं।
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