हिंदी में MBBS फेल होने का दावा कितना सही? आखिर क्यों डर रहे छात्र? असली कहानी क्या है?
लेकिन तीन साल बाद इस प्रयोग को लेकर अलग-अलग दावे सामने आने लगे। कहा गया कि छात्र हिंदी में परीक्षा ही नहीं दे रहे हैं। हिंदी में किताबें छापने पर 10 करोड़ रुपए खर्च होने का दावा भी हुआ। आरोप लगा कि ये किताबें अब धूल खा रही हैं।
द सूत्र ने की दावों की पड़ताल
द सूत्र ने इन्हीं दावों की पड़ताल की। इसके लिए गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के डॉ. लोकेंद्र दवे से बातचीत की गई। डॉ. दवे कॉलेज के रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं। डॉ. दवे ने हिंदी में MBBS फेल होने के दावे पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने छात्रों से परीक्षा की भाषा का विकल्प ही नहीं पूछा। ऐसे में हिंदी में MBBS का प्रयोग फेल कैसे कहा जा सकता है? उनके मुताबिक हिंदी में MBBS को लेकर काफी नकारात्मक बातें फैलाई गई हैं। इससे छात्रों के मन में हिंदी में पढ़ाई को लेकर डर पैदा हुआ है। द सूत्र ने जानने की कोशिश की कि छात्रों को आखिर किस बात का डर है। क्या वाकई छात्र हिंदी में MBBS की पढ़ाई करने से डर रहे हैं? क्या छात्र हिंदी में परीक्षा के जवाब नहीं लिख रहे हैं? इन तमाम दावों में आखिर कितनी सच्चाई है? पढ़िए द सूत्र की यह खास रिपोर्ट।
हिंदी या अंग्रेजी का विकल्प क्यों नहीं दिया गया?
द सूत्र की पड़ताल में परीक्षा की भाषा से जुड़ी जानकारी सामने आई। MBBS में प्रवेश लेने वाले छात्रों से परीक्षा की भाषा नहीं पूछी जा रही है। उनसे हिंदी या अंग्रेजी में परीक्षा देने का कोई फॉर्म भी नहीं भरवाया जाता।
डॉ. लोकेंद्र दवे ने इसकी वजह भी बताई। उनके मुताबिक ऐसा विकल्प देने से हिंदी में परीक्षा देने वाले छात्र डर सकते थे। छात्रों को लग सकता था कि वे दूसरों की तुलना में कमजोर हैं। उन्हें यह भी महसूस हो सकता था कि उनका ज्ञान कम है।
डॉ. दवे हिंदी में MBBS शुरू करने के फैसले को जल्दबाजी वाला नहीं मानते। उनका कहना है कि व्यवस्था में कुछ कमियां हो सकती हैं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि फैसला बिना पर्याप्त तैयारी के लिया गया था। उन्होंने बताया कि हिंदी में मेडिकल पढ़ाई का नियम लागू होने पर कई फोन आए। विश्वविद्यालय से लोग इस नई व्यवस्था की जानकारी मांग रहे थे। वे जानना चाहते थे कि क्या वाकई हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई होगी। छात्रों और उनके परिजनों में इस फैसले को लेकर उत्सुकता थी। लेकिन उनके मन में भविष्य को लेकर एक डर भी था। उन्हें आशंका थी कि हिंदी में पढ़ने से करियर के अवसर सीमित हो सकते हैं। इसी डर के कारण हिंदी में पढ़ाई को लेकर झिझक बढ़ गई।
हिंदी में MBBS को लेकर छात्रों में कैसा डर?
द सूत्र से बातचीत में डॉ. दवे ने हिंदी की किताबों की उपयोगिता बताई। उनके मुताबिक प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए हिंदी की किताबें आज भी मददगार हैं। हिंदी माध्यम के छात्र इन किताबों से पढ़ाई कर रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम के छात्र भी इन किताबों की मदद ले रहे हैं।
डॉ. दवे ने बताया कि छात्र परीक्षा में हिंदी में भी जवाब लिख रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सभी छात्र अपने पूरे जवाब अंग्रेजी में लिखते हैं। हिंदी में लिखे गए जवाबों को भी मान्यता दी जा रही है। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि उत्तरपुस्तिका में Liver को 'लीवर' लिखने पर भी अंक मिलते हैं। यानी अंग्रेजी के मेडिकल शब्दों को हिंदी में लिखने पर भी अंक दिए जा रहे हैं। डॉ. दवे के मुताबिक हिंदी में MBBS शुरू करने का मुख्य उद्देश्य संवाद आसान बनाना था। खासकर हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों को विषय समझने में मदद मिल सके। इसी सोच के साथ हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई शुरू की गई थी।
हिंदी में मेडिकल किताबों की कमी क्यों?
डॉ. दवे ने मेडिकल किताबों के हिंदी अनुवाद को लेकर भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी की किताबों का हिंदी में अनुवाद किया गया है। लेकिन हिंदी मेडिकल किताबों के प्रकाशकों की संख्या सीमित है। हिंदी में मेडिकल की कुछ चुनिंदा किताबें ही उपलब्ध हैं। वहीं अंग्रेजी में मेडिकल विषयों की किताबें और अध्ययन सामग्री ज्यादा उपलब्ध है।
डॉ. दवे के मुताबिक अच्छा छात्र कभी सिर्फ एक किताब पर निर्भर नहीं रहता। वह अलग-अलग किताबों से विषय को समझने की कोशिश करता है। अंग्रेजी में बेहतर और ज्यादा अध्ययन सामग्री उपलब्ध होना भी एक बड़ी वजह है। इसी कारण छात्रों की रुचि अंग्रेजी की किताबों में बनी हुई है। उन्होंने कहा कि हिंदी में पढ़ाई के लिए परिवार का सहयोग भी जरूरी है। सबसे पहले अभिभावकों को अपने बच्चों का समर्थन करना होगा। लेकिन कई परिवारों के मन में हिंदी को लेकर आशंका बनी रहती है। उन्हें डर होता है कि हिंदी में पढ़ने से उनका बच्चा पिछड़ सकता है। उन्हें यह भी चिंता रहती है कि बच्चा अच्छा डॉक्टर नहीं बन पाएगा।
हिंदी में हो रहे वायवा, प्रैक्टिकल में भी फायदा
डॉ. दवे के मुताबिक हिंदी में मेडिकल पढ़ाई का फायदा प्रैक्टिकल में दिख रहा है। पहले छात्रों से प्रैक्टिकल के दौरान अंग्रेजी में सवाल-जवाब किए जाते थे। अब छात्र हिंदी में भी सवालों के जवाब दे रहे हैं। इससे छात्रों को अपनी बात समझाने में आसानी हो रही है। खासकर हिंदी माध्यम से पढ़कर आने वाले छात्रों को इसका फायदा मिल रहा है। डॉ. दवे ने नर्सिंग की पढ़ाई में हिंदी किताबों की उपयोगिता भी बताई। उनके मुताबिक हिंदी में अनुवादित किताबें नर्सिंग छात्रों के लिए भी काफी मददगार हैं।
रतलाम, इंदौर और भोपाल में अलग-अलग रुझान
हिंदी में एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई को लेकर छात्रों का रुझान एक जैसा नहीं है। अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में हिंदी किताबों को लेकर अलग स्थिति सामने आई है। रतलाम में छात्रों द्वारा 80 प्रतिशत हिंदी किताबें लेने का दावा किया गया है। इससे वहां हिंदी किताबों के प्रति छात्रों की रुचि दिखाई देती है।
वहीं इंदौर में छात्रों ने हिंदी किताबों में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। भोपाल में हिंदी किताबों को लेकर मिला-जुला रुझान सामने आया है। भोपाल में प्रथम वर्ष के छात्र हिंदी में अनुवादित किताबों से पढ़ाई कर रहे हैं। लेकिन आगे की कक्षाओं में पहुंचने पर उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगता है। इसके बाद छात्र अंग्रेजी की किताबों के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इस तरह तीनों शहरों में हिंदी मेडिकल किताबों को लेकर अलग-अलग स्थिति सामने आई है। कहीं छात्र हिंदी किताबें अपना रहे हैं तो कहीं अंग्रेजी को प्राथमिकता मिल रही है।