आपकी थाली का चावल बढ़ा रहा ग्लोबल वॉर्मिंग, IISER भोपाल रिसर्च का दावा

Kaushiki | Sept 11, 2026, 13:07 IST
IISER Bhopal Rice Study
आईसर भोपाल की नई स्टडी में खुलासा हुआ है। भारत के धान के खेत हर साल 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ते हैं। यह गैस ग्लोबल वॉर्मिंग को बहुत तेजी से बढ़ा रही है। खरीफ सीजन की फसल से सबसे ज्यादा मीथेन गैस निकलती है।

IISER Bhopal Rice Study: क्या आपने कभी इमेजिन किया है कि आपकी प्लेट में सर्व किया जाने वाला स्टीमिंग राइस प्लैनेट अर्थ का टेम्परेचर बढ़ा रहा है? यह बात सुनने में बहुत सरप्राइजिंग लग सकती है। लेकिन IISER भोपाल और IRRI की रीसेंट स्टडी ने यही आई-ओपनिंग फैक्ट रिवील किया है।



इस साइंटिफिक रिसर्च के अकॉर्डिंग, इंडिया के राइस पेडी फील्ड्स न सिर्फ फूड सिक्योरिटी देते हैं। बल्कि ये लार्ज स्केल पर मीथेन गैस एमिट करके ग्लोबल वॉर्मिंग को भी एक्सीलरेट कर रहे हैं। आइए इसे डिटेल में समझें...



IISER Bhopal Rice Study


यूरोप के कॉपरनिकस प्रोग्राम

रिसर्चर्स ने यूरोप के कॉपरनिकस प्रोग्राम के एडवांस्ड सैटेलाइट डेटा का यूज करके 10-मीटर रिजोल्यूशन पर मैपिंग की है। इससे एमिशन्स का एक-एक डेटा सामने आया है।



भारत में लगभग चार करोड़ हेक्टेयर लैंड पर राइस कल्टीवेशन होता है। ये पेडी फील्ड्स दुनिया की वन-फिफ्थ पॉपुलेशन का पेट भरते हैं। लेकिन यही एनवायरमेंट के लिए एक मेजर कंसर्न बन चुके हैं।



वैज्ञानिकों के मुताबिक भारत के धान के खेत हर साल करीब 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ते हैं। यह आंकड़ा पुराने अनुमानों से कहीं ज्यादा निकलकर सामने आया है।



धान के खेतों से मीथेन गैस क्यों निकलती है

धान की खेती हमेशा पानी से लबालब भरे खेतों में की जाती है। पानी भरा रहने के कारण मिट्टी में ऑक्सीजन की बहुत कमी हो जाती है। इस वजह से मिट्टी के अंदर मौजूद सूक्ष्मजीव (micro organisms) सड़ने लगते हैं।



ये बारीक जीवाणु कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस बनाते हैं। यही गैस धीरे-धीरे वातावरण में घुलती जाती है। खेती करने का यह तरीका सदियों पुराना और पारंपरिक है। लेकिन अब इसका सीधा असर हमारे पूरे एनवायरमेंट पर पड़ रहा है।



मीथेन गैस कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में हवा में कम समय तक रहती है। लेकिन यह अपने अंदर सूरज की गर्मी को बहुत ज्यादा रोककर रखती है। इसी कारण से मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है।



खरीफ फसल से सबसे ज्यादा खतरा

शोध में शामिल वैज्ञानिकों ने एक और जरूरी बात बताई है। भारत में मानसून के समय बोई जाने वाली खरीफ फसल सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।



कुल मीथेन गैस का तीन-चौथाई हिस्सा इसी सीजन से निकलता है। मानसून के समय खेतों में पानी लंबे समय तक खड़ा रहता है। इस कारण मीथेन बनने की प्रोसेस बहुत तेज हो जाती है।



वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर मौसम का यह पैटर्न ऐसे ही बिगड़ता रहा तो स्थिति और गंभीर होगी। भविष्य में तापमान बढ़ने से मीथेन के उत्सर्जन में 25% की बढ़ोतरी हो सकती है।



इससे खेती की पैदावार और किसानों की रोजी-रोटी पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसलिए इस समस्या का जल्द समाधान खोजना बहुत जरूरी हो गया है।



पेडी फील्ड्स क्या है

पेडी फील्ड्स (Paddy Fields) का मतलब होता है धान या चावल के खेत और वन-फिफ्थ पॉपुलेशन (One-fifth population) का मतलब होता है दुनिया की 20% आबादी (पांचवां हिस्सा)। इस वाक्य का आसान भाषा में अर्थ है: ये धान (चावल) के खेत दुनिया की 20 प्रतिशत (पांचवें हिस्से) आबादी का पेट भरते हैं।



  • पेडी फील्ड्स (Paddy Fields): धान की खेती वाले पानी से भरे खेत।
  • वन-फिफ्थ (One-fifth / 1/5): गणित के हिसाब से 100 में से 20 हिस्सा या 20%। आज दुनिया की कुल आबादी लगभग 800 करोड़ (8 Billion) से ज्यादा है, तो उसका 20% यानी लगभग 160 करोड़ से ज्यादा लोग अपने भोजन (चावल) के लिए भारत और एशिया के इन धान के खेतों पर निर्भर हैं।

Reference Links:



  • IISER Bhopal Department of Earth and Environmental Sciences Research Paper
  • International Rice Research Institute (IRRI) Collaborative Report, Global warming
  • Environmental Research Letters Journal (Copernicus Program Data)

FAQ

  1. धान के खेतों से कौन सी गैस निकलती है और यह नुकसानदेह क्यों है?
    धान के खेतों से मीथेन गैस निकलती है। पानी भरे खेतों में ऑक्सीजन की कमी से सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाते हैं। यह गैस गर्मी को रोककर ग्लोबल वॉर्मिंग को बहुत तेजी से बढ़ाती है।
  2. आईसर भोपाल की स्टडी के अनुसार भारत के धान के खेत कितनी मीथेन छोड़ते हैं?
    आईसर भोपाल और IRRI की रिसर्च के अनुसार, भारत के धान के खेत हर साल लगभग 97 लाख टन (9.7 मिलियन टन) मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं।
  3. मीथेन उत्सर्जन का सबसे ज्यादा असर किस फसल सीजन में देखा जाता है?
    मानसून के दौरान बोई जाने वाली खरीफ की फसल से सबसे ज्यादा मीथेन गैस निकलती है। कुल राइस-रिलेटेड मीथेन उत्सर्जन का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अकेले खरीफ सीजन से ही आता है।

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