वरिष्ठ जिला पंजीयक नायडू, उप पंजीयक सिंह और बिल्डर विवेक चुघ को 13 करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी चोरी में झटका

Sanjay Gupta | Oct 25, 2026, 13:32 IST
इंदौर में 13 करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी चोरी का मामला।
INDORE. इंदौर में 13 करोड़ 32 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी चोरी के मामले में जांच फिर आगे बढ़ेगी। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) में यह मामला करीब एक साल से अटका हुआ था। अब इंदौर हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द कराने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इस फैसले से बिल्डर विवेक चुघ और दो पंजीयन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

इनमें वरिष्ठ जिला पंजीयक अमरेश नायडू और उप पंजीयक संजय सिंह शामिल हैं। ईओडब्ल्यू ने जुलाई 2025 में इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। तीनों ने एफआईआर रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिकाएं लगाई थीं। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बलपूर्वक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई थी। अब याचिकाएं खारिज होने के बाद जांच एजेंसी आगे की कार्रवाई कर सकती है।



मामला यह है-

मामला इंदौर की सांवेर तहसील में एबी रोड स्थित डीएलएफ गार्डन सिटी कॉलोनी का है। यहां सितंबर से अक्टूबर 2024 के बीच नौ कमर्शियल प्लॉट खरीदे गए थे। इनकी रजिस्ट्री में पांच करोड़ 38 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी चुकाई गई थी। इसके बाद पंजीयन विभाग और कलेक्टर के पास शिकायत पहुंची। शिकायत में करीब 10 करोड़ रुपए की स्टाम्प ड्यूटी चोरी का आरोप लगाया गया।



अपर कलेक्टर ने मामले की जांच कराई थी। अप्रैल 2025 में जांच रिपोर्ट सामने आई थी। इसमें पता चला कि जमीन की सरकारी गाइडलाइन दर 25 हजार 400 रुपए प्रति वर्गमीटर थी। लेकिन रजिस्ट्री में केवल 14 हाजार 200 रुपए प्रति वर्गमीटर की दर लगाई गई थी।



रिपोर्ट के मुताबिक जमीन नेशनल हाईवे पर स्थित है। इसलिए नियमों के अनुसार इसकी गाइडलाइन दर दोगुनी होनी थी। इस हिसाब से दर 50,800 रुपए प्रति वर्गमीटर बनती है। जांच में सामने आया कि इस दर से 18 करोड़ 71 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी बनती थी। लेकिन रजिस्ट्री के समय केवल 5 करोड़ 38 लाख रुपए जमा किए गए।



इस तरह जांच रिपोर्ट में 13 करोड़ 32 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी चोरी बताई गई। इसी रिपोर्ट के आधार पर ईओडब्ल्यू ने जुलाई 2025 में केस दर्ज किया था।



हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने यह दिए तर्क

इस मामले में अमरेश नायडू, संजय सिंह और विवेक चुघ ने हाईकोर्ट में याचिकाएं लगाईं थी। तीनों ने कहा कि अपर कलेक्टर को इस मामले की जांच करने का अधिकार ही नहीं था।



उन्होंने दलील दी कि रजिस्ट्री के समय स्टाम्प ड्यूटी सही तरीके से चुकाई गई थी। खरीदे गए प्लॉट कॉलोनी के बाहर स्थित हैं। इसलिए इन पर कॉलोनी की गाइडलाइन दर लागू नहीं होती।



याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जांच रिपोर्ट में बताई गई दर भी सही नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने हाईकोर्ट से ईओडब्ल्यू की एफआईआर रद्द करने की मांग की।



हाईकोर्ट ने यह दिया फैसला

इस मामले में हाईकोर्ट के जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई ने 16 पेज का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला सिर्फ कम स्टाम्प ड्यूटी चुकाने का नहीं है। इसमें नक्शे से छेड़छाड़ और रजिस्ट्री में अधूरे दस्तावेज अपलोड करने की बात सामने आई है।



कोर्ट के मुताबिक दस्तावेजों में हेराफेरी कर स्टाम्प ड्यूटी चोरी करने का मामला है। इसमें अधिकारियों की मदद से गड़बड़ी किए जाने की बात भी सामने आई है।



हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर केवल कुछ खास परिस्थितियों में ही रद्द की जा सकती है। इस मामले में लगे आरोपों की पूरी जांच होना जरूरी है। इसलिए पुलिस और जांच एजेंसी को जांच करने से नहीं रोका जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने तीनों की याचिकाएं खारिज कर दीं।



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