सीता माता का उदाहरण देकर कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी मां को सौंपी, विदेशी कोर्ट के आदेश को ठुकराया

Neel Tiwari | Apr 20, 2026, 20:15 IST
Photograph: (the sootr)
इंदौर हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें बच्ची की कस्टडी मां को दी। कोर्ट ने सीता माता और लव-कुश के उदाहरण का हवाला देते हुए विदेशी अदालत के आदेश को खारिज किया।

News in Short

  • हाईकोर्ट ने विदेशी अदालत के आदेश को अंतिम नहीं माना
  • ‘Welfare of Child’ को बताया सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत
  • कनाडा कोर्ट ने पिता को दी थी सोल कस्टडी
  • बच्ची 4 साल से भारत में रह रही, मां से गहरा जुड़ाव
  • सीता माता के उदाहरण से मां की भूमिका को बताया सर्वोच्च

Intro

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने एक ऐतिहासिक और भावनात्मक निर्णय देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि बच्चे की खुशी और कल्याण किसी भी विदेशी अदालत के आदेश से ऊपर है। कोर्ट ने सीता माता और लव-कुश के उदाहरण का उल्लेख करते हुए मां के महत्व को रेखांकित किया और बच्ची को मां से अलग करने से इनकार कर दिया। कनाडा की अदालत के आदेश के बावजूद, हाईकोर्ट ने मासूम की कस्टडी मां के पास ही रहने देने का फैसला सुनाया।



News in detail

मां की ममता के आगे नहीं टिक सका विदेशी आदेश

इंदौर हाईकोर्ट में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी की डिविजनल बेंच ने अपने फैसले में साफ किया कि विदेशी अदालतों के आदेश भारत में बाध्यकारी नहीं होते, यदि वे बच्चे के सर्वोत्तम हित के खिलाफ हों। अदालत ने ‘डॉक्ट्रिन ऑफ कॉमिटी’ ( दो कोर्टों के बीच परस्पर सम्मान) को स्वीकार जरूर किया, लेकिन यह भी कहा कि यह सिद्धांत पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब बच्चे का भविष्य दांव पर हो।





सीता माता का उदाहरण बना फैसले का आधार

इस फैसले की सबसे खास बात यह रही कि कोर्ट ने भारतीय पौराणिक संदर्भों का उपयोग किया। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला ने रामायण का उल्लेख करते हुए माता सीता और लव-कुश का उदाहरण दिया। कोर्ट ने कहा कि मां ही बच्चे का पहला आश्रय होती है और उसका स्नेह, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव किसी भी अन्य रिश्ते से ऊपर होता है। “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का उल्लेख करते हुए अदालत ने मां के महत्व को सर्वोच्च बताया।



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अंतरराष्ट्रीय विवाद की पूरी कहानी

यह मामला सौरभ मालपानी और दिव्या मालपानी के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। शादी के बाद दंपती अमेरिका और फिर कनाडा में बस गए थे, जहां उनकी बेटी का जन्म हुआ। वर्ष 2022 में मां अपनी बेटी के साथ भारत आई और वापस कनाडा नहीं लौटी। इसके बाद पिता ने कनाडा की अदालत में याचिका दायर की, जहां मार्च 2024 में उन्हें बच्ची की सोल कस्टडी मिल गई। इसी आदेश को लागू कराने के लिए भारत में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की गई।



हेबियस कॉर्पस याचिका पर कोर्ट का रुख

याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर उठे सवाल पर तो कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की कस्टडी के मामलों में हेबियस कॉर्पस याचिका पूरी तरह से विचारणीय है। साथ सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि बच्चे का हित जुड़ा हो, तो अदालत अपने असाधारण अधिकारों का प्रयोग कर सकती है। इस प्रकार, तकनीकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कोर्ट ने मामले की मेरिट पर सुनवाई की।



बच्ची की इच्छा और जमीनी हकीकत बनी निर्णायक

अदालत ने बच्ची से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की और पाया कि वह अपनी मां के साथ पूरी तरह सहज और भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है। पिछले चार सालों से भारत में रहने के कारण वह यहां के माहौल, स्कूल और सामाजिक जीवन में पूरी तरह ढल चुकी है। कोर्ट ने माना कि इस स्थिति में उसे अचानक कनाडा भेजना उसके मानसिक और सामाजिक विकास के लिए हानिकारक हो सकता है।



शिक्षा और उम्र का संवेदनशील पहलू

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि बच्ची जिस उम्र में है, उस समय उसे मां की देखभाल और स्थिर वातावरण की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। इंदौर के स्कूल में उसकी पढ़ाई सुचारू रूप से चल रही है, ऐसे में उसे uproot करना उसके भविष्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है।



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कानून से ऊपर बच्चे की मुस्कान

अंततः हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि अंतरराष्ट्रीय आदेशों का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन बच्चे का हित सर्वोपरि है। केवल विदेशी अदालत के आदेश के आधार पर बच्ची को मां से अलग करना न्यायसंगत नहीं होगा। इसी के साथ कोर्ट ने पिता की याचिका खारिज कर दी, जिससे मां को बड़ी राहत मिली।



यह फैसला न केवल एक परिवार के लिए बल्कि अंतरराष्ट्रीय कस्टडी विवादों के लिए भी एक महत्वपूर्ण नजीर बनकर उभरा है। जहां कानून से पहले इंसानियत और बच्चे की खुशी को प्राथमिकता दी गई।



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