प्रकाश प्रदूषण की गिरफ्त में क्लीन सिटी इंदौर, पटना-जयपुर को पछाड़ रातें 42 गुना चमकदार

Aman Vaishnav | Jun 01, 2026, 11:19 IST
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इंदौर की रातें अब प्राकृतिक अंधेरे से 42 गुना ज्यादा चमकीली हो चुकी हैं। LED लाइटें, बढ़ते वाहन और स्ट्रीट लाइटें इसकी बड़ी वजह हैं। यह प्रकाश प्रदूषण इंसानों की नींद, पक्षियों की दिशा और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। भारत में इस पर कोई कानून नहीं है।

स्वच्छता में नंबर एक का तमगा पाने वाला इंदौर शहर अब एक और सूची में जगह बना चुका है। इस सूची में इंदौर का नाम शामिल होना अच्छी खबर नहीं है।



ब्लाइमेट-टेक स्टार्टअप प्राणा एयर की एक रिपोर्ट हैरान कर देने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक इंदौर की रातें प्राकृतिक अंधेरे के मुकाबले 42 गुना ज्यादा चमकीली हो चुकी हैं। इस मामले में पटना 36 गुना और जयपुर 33 गुना के साथ इंदौर से पीछे हैं।



वहीं नई दिल्ली 61 गुना, बेंगलुरु 59 गुना और मुंबई 52 गुना के साथ सबसे ऊपर हैं। इंदौर भले ही इस लिस्ट में नीचे हो लेकिन 42 गुना की संख्या खुद में बहुत बड़ी है।



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क्यों बढ़ रहा है प्रकाश प्रदूषण?

इंदौर में पिछले कुछ सालों में स्ट्रीट लाइटों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय निकायों ने पिछले 10 सालों में देशभर में एक करोड़ 34 लाख से ज्यादा स्ट्रीट लाइटें लगाई हैं।



वहीं उजाला योजना के तहत 36 करोड़ से अधिक LED बल्ब बांटे जा चुके हैं। एलईडी लाइटें परंपरागत सोडियम लाइटों की तुलना में 8 गुना ज्यादा रोशनी देती हैं। इससे रात के समय कृत्रिम रोशनी में जबरदस्त उछाल आया है।



देश में 35 करोड़ से ज्यादा वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। इन वाहनों की हेडलाइटें और शहर की तेज रोशनी मिलकर रात को दिन जैसा बना देती हैं। बिजली खपत भी 2014 से 2024 के बीच दोगुनी होकर 1,623 टेरावॉट-घंटे तक पहुंच गई है।



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नींद और सेहत पर क्या असर?

रात को तेज रोशनी में रहने से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर घटने लगता है। यही हार्मोन नींद के लिए जरूरी होता है। इसके कम होने से नींद टूटती है और शरीर की प्राकृतिक घड़ी बिगड़ जाती है।



विशेषज्ञों के अनुसार लगातार प्रकाश प्रदूषण के संपर्क में रहने से डायबिटीज, डिप्रेशन और हार्ट डिजीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इंदौर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में यह खतरा और भी बड़ा है।



भारत की 50% से ज्यादा आबादी हर रात प्रकाश प्रदूषित आसमान के नीचे सोती है। इंदौर जैसे मध्यम आकार के शहरों में यह संख्या तेजी से बढ़ रही है।



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पक्षी और कीट भी हो रहे शिकार

जानकारी के अनुसार इंदौर और आसपास के इलाकों में कई रात्रिचर कीट लुप्त होने लगे हैं। रात की तेज रोशनी उनकी प्रजनन और भोजन की प्रक्रिया बाधित करती है।



बता दें कि 2024 में नवी मुंबई के नेरुल क्षेत्र में स्थित डीपीएस में चकाचौंध वाले एलईडी लैंप लगे थे। इनकी वजह से हजारों मील दूर से आने वाले प्रवासी पक्षी दिशाभ्रमित हो गए थे।



कई पक्षी इमारतों से टकराकर मर गए थे। प्रकाश प्रदूषण पशु-पक्षियों में प्रवास, प्रजनन, घोंसला बनाने और अंडों से बच्चे निकालने जैसी जैविक प्रक्रियाओं को बदल देता है।



प्रदूषण के खिलाफ सख्त नियम

कुछ देशों ने प्रकाश प्रदूषण के खिलाफ सख्त नियम बनाए हैं। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइटों को जमीन पर फोकस न करने पर तीन लाख रुपए से ज्यादा जुर्माना लगता है।



फ्रांस में रात 1 बजे के बाद दुकानों और दफ्तरों की बाहरी लाइटें बंद करना जरूरी है। जर्मनी के आवासीय इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज रोशनी पर रोक है।



वहीं प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान 91 गुना ब्राइटनेस दर्ज की गई थी जो देश में सबसे ज्यादा थी।



भारत में कानून की जरूरत

वरिष्ठ पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी पांडे के मुताबिक भारत में वायु, जल या ध्वनि प्रदूषण की तरह प्रकाश प्रदूषण पर कोई विशिष्ट कानून नहीं है। लोग इसे प्रदूषण मानते ही नहीं। जागरूकता बेहद जरूरी है।



इंदौर जैसे शहर जहां स्मार्ट सिटी मिशन के तहत तेजी से बुनियादी ढांचा बदल रहा है वहां यह सवाल और जरूरी हो जाता है। क्या रोशनी की यह दौड़ हमें अंधेरे में धकेल रही है?



पिछले एक दशक में दुनियाभर में रात के समय कृत्रिम रोशनी में करीब 16% की वृद्धि हुई है। इस रफ्तार से अगर नीति नहीं बदली तो आने वाले सालों में इंदौर की रातें और भी ज्यादा खतरनाक होती जाएंगी।



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यह खबर क्यों जरूरी है?

इंदौर देश के सबसे तेजी से बढ़ते शहरों में एक है। यहां स्मार्ट सिटी के नाम पर हो रहे विकास में रोशनी को प्रगति का पैमाना माना जा रहा है, लेकिन इस रोशनी की एक छुपी हुई कीमत है।



प्रकाश प्रदूषण एक ऐसा खतरा है जो न दिखता है और न इसे महसूस किया जाता है, लेकिन यह इंसान की नींद, हार्मोन संतुलन, मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरण को चुपचाप नुकसान पहुंचा रहा है।



भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन जीने का अधिकार शामिल है। इसमें स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी माना गया है। इस नजरिए से प्रकाश प्रदूषण एक संवैधानिक सवाल भी बनता है।



डिजिटल और सामाजिक नैतिकता के पैमाने पर भी यह जरूरी है कि विकास की परिभाषा को सिर्फ चमक-दमक तक सीमित न रखा जाए। इंदौर के नागरिकों को जानने का अधिकार है कि उनके शहर की रातें उनकी सेहत के लिए सुरक्षित हैं या नहीं।



FAQ

  1. प्रकाश प्रदूषण क्या होता है?
    प्रकाश प्रदूषण का मतलब है रात के समय अत्यधिक या अनावश्यक कृत्रिम रोशनी का फैलाव, जो प्राकृतिक अंधेरे को नष्ट करती है।
  2. इंदौर में कितना प्रकाश प्रदूषण है?
    प्राणा एयर की रिपोर्ट के अनुसार इंदौर की रातें प्राकृतिक स्तर से 42 गुना ज्यादा चमकीली हो चुकी हैं। यह LED स्ट्रीट लाइटों, वाहनों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की रोशनी के कारण हुआ है।
  3. क्या प्रकाश प्रदूषण सेहत के लिए सच में खतरनाक है?
    हां, प्रकाश प्रदूषण सीधे तौर पर सेहत को नुकसान पहुंचाता है। रात को तेज रोशनी शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन कम कर देती है, जिससे नींद की समस्या होती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से डायबिटीज, डिप्रेशन और हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानता है।
  4. भारत में प्रकाश प्रदूषण रोकने के लिए क्या कानून है?
    फिलहाल भारत में प्रकाश प्रदूषण रोकने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है। वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण के लिए अलग-अलग कानून बने हैं, लेकिन प्रकाश प्रदूषण इस दायरे से बाहर है। पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी पांडे इस पर जागरूकता और कानून की मांग कर रहे हैं। चेक गणराज्य और फ्रांस जैसे देश पहले ही इस पर सख्त नियम बना चुके हैं।

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