इंदौर हाईकोर्ट ने कहा था सरकारी धन से मुकदमेबाजी करते हैं अधिकारी, निगम इसी के खिलाफ अपील में गया
इंदौर में सरकारी अधिकारियों के काम में लापरवाही के चलते हो रही मुकदमेबाजी पर हुई टिप्पणी अब अधिकारियों को पसंद नहीं आई। इंदौर नगर निगम के अधिकारी अपने खिलाफ हुई टिप्पणी और एक लाख की कॉस्ट से इतने परेशान हुए कि उन्होंने फिर अपने वकीलों को मैदान में उतारते हुए रिट अपील दायर कर दी। इसके पहले इंदौर में महू एसडीएम राकेश परमार पर भी उनकी लापरवाही के चलते 50 हजार रुपए की कॉस्ट लगाई गई थी।
यह है पूरा विवाद
दरअसल बाफना अस्पताल को इंदौर नगर निगम (Indore Municipal Corporation) ने टैक्स डिमांड नोटिस जारी किया लेकिन आदेश में उन धाराओं का भी उल्लेख किया जो पहले ही खत्म की जा चुकी है। अस्पताल संचालक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और निगम अधिकारियों को पक्षकार बनाया। अस्पताल संचालक की ओर से अधिवक्ता जयेश गुरनानी ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट में जब यह केस आया तो निगम अधिकारियों को अपनी गलती बता चली और उन्होंने कोर्ट से कहा कि वह इस आदेश को वापस लेते हैं, चूक हुई है।
इस पर हाईकोर्ट सिंगल बेंच ने यह कहा-
जस्टिस संदीप एन भट्ट की बेंच ने ऐसी स्थिति को निराशाजनक एवं पीड़ादायक बताते हुए चेताया कि भविष्य में इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। ऐसे आदेश के कारण फरियादी को कोर्ट आना पड़ा। कोई अधिकारी कानूनी प्रावधानों की अनदेखी करते हुए गलत आदेश पारित करता है, तो उसके कारण उत्पन्न मुकदमेबाजी तथा न्यायिक समय की बर्बादी को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
वैधानिक संस्थाओं के अधिकारी अक्सर मुकदमों में सार्वजनिक धन के माध्यम से मुकदमेबाजी करते हैं। ऐसी स्थिति में किसी अधिकारी द्वारा गलत आदेश पारित किए जाने के कारण उत्पन्न मुकदमेबाजी का आर्थिक भार अनावश्यक रूप से सार्वजनिक कोष पर नहीं डाला जाना चाहिए।
भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोकने तथा संबंधित अधिकारियों को अपने वैधानिक दायित्वों के प्रति सजग करने के उद्देश्य से न्यायालय ने एक लाख रुपए की कॉस्ट लगाते हैं। इसमें से 75 हजार रुपए मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में और 25 हजार फरियादी को दी जाएगी।
इसी के खिलाफ कर दी अपील
इस मामले में इंदौर नगर निगम ने डबल बेंच मे याचिका दायर कर दी है। इसमें एक लाख की कॉस्ट को चुनौती दी गई है। जानकारी के अनुसार इस मामले में याचिका दायर करने का बड़ा कारण यह है कि इसमें केवल नीचे के एक-दो अधिकारी दायरे में नहीं आ रहे हैं, बल्कि इस डिमांड नोटिस पर उच्च स्तर पर निगमायुक्त तक के हस्ताक्षर हैं।
आदेश के अनुसार कॉस्ट केवल निचले स्तर पर नहीं लगेगी यह निगमायुक्त तक आएगी। ऐसे में नीचे से लेकर उच्च स्तर के अधिकारियों को इससे बचाने के लिए ही निगम ने आननफानन में रिट अपील दायर करते हुए एक बार फिर अपने वकीलों को मैदान में उतार दिया है। उल्लेखनीय है कि फिर इस केस का भुगतान निगम द्वारा वकीलों को किया जाएगा और वह भी आमजन के टैक्स की राशि से ही। जिस पर हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने खासी आपत्ति लेते हुए टिप्पणी की थी।
हर माह दो करोड़ का खर्च है
मध्यप्रदेश शासन में जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर हाईकोर्ट में केस लड़ने के लिए 160 अधिवक्ता नियुक्त है। इन पर हर माह करीब दो करोड़ का वेतन खर्च किया जाता है। इसके साथ ही इंदौर निगम हो या आईडीए या आयोग या फिर अन्य वैधानिक संस्थाएं, इनके खुद के भी वकील नियुक्त है। इन पर भी हर माह लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं।