इंदौर निगम ने मांगी सरकारी जमीन, जिला प्रशासन ने बताया हिसाब 420 करोड़ रुपए लगेंगे
दूसरी ओर जिला प्रशासन ने नए नियमों के आधार पर जमीन की कीमत निकाली। इसके बाद निगम को बताया कि जमीन के लिए 420 करोड़ रुपए चुकाने होंगे। इतनी बड़ी रकम सामने आने से निगम के होश उड़ गए।
निगमायुक्त ने कौन सी जमीन मांगी थी?
निगमायुक्त क्षितिज सिंघल (Municipal Commissioner Kshitij Singhal) ने जिला प्रशासन से जूनी इंदौर के ग्राम रेसीडेंसी में जमीन मांगी थी। इसमें ब्लॉक नंबर 45 की 0.269 हेक्टेयर जमीन शामिल है। इसके अलावा ब्लॉक 47 की 5.152 हेक्टेयर जमीन मांगी गई। ब्लॉक 52 की 0.607 हेक्टेयर और ब्लॉक 62 की 1.942 हेक्टेयर जमीन भी मांगी गई।
इस तरह कुल 7.970 हेक्टेयर जमीन की मांग की गई है। निगम यहां स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स बनाना चाहता है। साथ ही जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल करने की भी योजना है।
नियमों का हवाला देकर मांगे 420 करोड़
जिला प्रशासन ने निगम की मांग पर जमीन की जांच की। इसके बाद नियमों के आधार पर जमीन की कीमत तय की गई। प्रशासन ने निगमायुक्त को पत्र लिखकर इसकी जानकारी दी। इसमें बताया गया कि नजूल नियम 2020 के तहत शुल्क देना होगा। जिस जमीन से नियमित कमाई होती है, उस पर 50 फीसदी राशि ली जाती है। इनमें मार्केट, कॉम्प्लेक्स और बस स्टैंड जैसी योजनाएं शामिल हैं।
साल 2026-27 की गाइडलाइन के अनुसार जमीन की कीमत 840 करोड़ रुपए है। नियम के मुताबिक निगम को इसका 50 फीसदी भुगतान करना होगा। यानी जमीन लेने के लिए 420 करोड़ रुपए चुकाने होंगे। इसके अलावा हर साल 3 लाख 18 हजार रुपए किराया भी देना होगा।
अपनी मंशा बता दीजिए
इस पत्र में ही प्रशासन ने निगमायुक्त को यह जानकारी देने के साथ ही पूछा है कि अब इस संबंध में आप अपना अभिमत जल्द बता दीजिए। ताकि इसमें देरी ना करते हुए मामले को जिला नजूल निर्वर्तन समिति को भेजा जा सके।
क्या हैं मध्यप्रदेश नजूल भूमि निर्वर्तन नियम?
बता दें कि मध्यप्रदेश में सरकारी जमीन के आवंटन और इस्तेमाल के लिए नियम बनाए गए हैं। इन्हें मध्यप्रदेश नजूल भूमि निर्वर्तन निर्देश 2020 कहा जाता है। इन नियमों के तहत सरकारी जमीन किसी व्यक्ति या संस्था को दी जा सकती है। सरकारी विभागों को भी तय शर्तों पर जमीन मिल सकती है। जमीन का पट्टा बढ़ाने और उसे फ्रीहोल्ड करने के प्रावधान भी हैं।
जमीन आवंटन के मामलों की जांच के लिए तीन स्तरों पर समितियां बनाई गई हैं। जिला स्तर की समिति के अध्यक्ष कलेक्टर होते हैं। संभाग स्तर की समिति की जिम्मेदारी कमिश्नर के पास होती है। राज्य स्तर की समिति के अध्यक्ष राजस्व मंत्री होते हैं। ये समितियां जमीन से जुड़े दस्तावेज और आवेदक की पात्रता की जांच करती हैं। इसके बाद नियमों के अनुसार जमीन आवंटन पर फैसला लिया जाता है।
सरकारी जमीन कैसे दी जाती है?
मध्यप्रदेश में सरकारी जमीन आवंटित करने के अलग-अलग तरीके हैं। आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक उपयोग के लिए पट्टा दिया जा सकता है। इसकी अवधि 15 से 99 साल तक हो सकती है। पट्टे की जमीन को फ्रीहोल्ड कराने की व्यवस्था भी है। इसके लिए तय शुल्क चुकाना पड़ता है। सरकार विकास कार्यों के लिए दूसरे विभागों और स्थानीय निकायों को भी जमीन देती है।
किन कामों के लिए मुफ्त मिलती है जमीन?
नियमों के तहत कुछ सार्वजनिक कामों के लिए जमीन मुफ्त दी जा सकती है। इनमें खेल मैदान, सार्वजनिक पार्क और सरकारी अस्पताल शामिल हैं। स्थानीय निकायों को इन कामों के लिए रियायत मिलती है।
मार्केट या व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए जमीन मुफ्त नहीं मिलती। ऐसी जमीन के लिए गाइडलाइन मूल्य की 50 फीसदी राशि चुकानी पड़ती है। जमीन लेते समय यह रकम एकमुश्त जमा करनी होती है। इसके अलावा हर साल भू-भाटक यानी जमीन का किराया भी देना पड़ता है।