इंदौर रियल एस्टेट के हाल-बेहाल, खरीदी-बिक्री में हर माह एक हजार करोड़ की कमी
इंदौर रियल एस्टेट को अब बड़े बूस्ट की जरूरत है, नहीं तो इसकी हालत बेहद खराब हो जाएगी। शासन की चौतरफा अटकाने वाली नीतियों ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है। हालत यह है कि जो रियल एस्टेट इंदौर में औसतन हर माह ढाई हजार करोड़ का था, वह घटकर डेढ़ हजार करोड़ के करीब पहुंच चुका है। यानी इसमें एक हजार करोड़ की कमी आ चुकी है।
इससे मिल रहा संकेत, गिर गया रियल एस्टेट
इंदौर जिले में रजिस्ट्रेशन से मई माह में 13 हजार डॉक्यूमेंट रजिस्टर्ड हुए और इससे 163 करोड़ की आय हुई। यानी करीब 1600 करोड़ की संपत्तियां बिकी हैं। वहीं बीते साल मई 2025 में 14 हजार 788 संपत्ती के डॉक्यूमेंट रजिस्टर्ड हुए और 198 करोड़ की आय हुई, यानी करीब दो हजार करोड़ की संपत्तियां बिकी थी। अप्रैल 2026 में भी 160 करोड़ की आय हुई यानी 1600 करोड़ के करीब की संपत्तियां बिकी थीं।
हर माह तीन हजार करोड़ की संपत्तियां बिकना जरूरी
मध्य प्रदेश शासन के पंजीयन विभाग से इंदौर जिले को इस बार 3 हजार 550 करोड़ के राजस्व का लक्ष्य मिला है। यानी इसके लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 में इंदौर में करीब 36 हजार करोड़ की संपत्तियों का कारोबार होना चाहिए। यानी हर माह औसतन तीन हजार करोड़ के कारोबार की जरूरत है।
इस हिसाब से अभी लक्ष्य का मात्र 60 फीसदी ही पूरा हो रहा है। बीते वित्तीय वर्ष भी तीन हजार करोड़ से अधिक का लक्ष्य था लेकिन केवल 2 हजार 750 करोड़ का राजस्व मिला था।
रियल एस्टेट गिरने की वजह सरकार
- रियल एस्टेट (Real sector market) गिरने की सबसे बड़ी वजह और कोई नहीं बल्कि खुद सरकार है। कारण यह है कि मास्टर प्लान को लेकर भारी असमंजस है। साल 2021 में खत्म हुआ मास्टर प्लान अभी तक नहीं आया। इंदौर मेट्रोपोलिटन सिटी में क्या होगा, किसी को नहीं पता। इंदौर में अधिक ग्रोथ की संभावनाओं वाले 79 गांवों में नक्शों पर रोक है, धारा 16 में भी एक साल से मंजूरियां बंद हैं।
- इकोनॉमिक कॉरिडोर के चलते 17 गांवों में नक्शे रुक गए हैं। वहीं नेशनल हाईवे के विभिन्न प्रोजेक्ट, रेल लाइन प्रोजेक्ट, आईडीए के अहिल्या पथ जैसे प्रोजेक्ट के चलते कई गांवों में कॉलोनी विकास के काम पर रोक है। इंदौर के चारों ओर लगे हुए गांवों में कोई न कोई व्यवधान लगा हुआ है।
- वहीं मप्र शासन की ओर से सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले और धंधा देने वाले सेक्टर को लेकर कोई बड़े प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। उधर शासकीय जटिल प्रक्रियाएं जैसे टीएंडसीपी, निगम और प्रशासन की तरफ से खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं।
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