इंदौर एसडीएम राकेश परमार पर 50 हजार की कॉस्ट, हाईकोर्ट बोला ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई की मिसाल जरूरी
यह राशि मध्य प्रदेश स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (MP State Legal Services Authority) में जमा होगी। इसकी रसीद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में पेश करनी होगी। तय समय में रकम जमा नहीं करने पर कोर्ट अगली सुनवाई में आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा। यह मामला इंदौर जिले में राजस्व अधिकारियों के कामकाज पर भी सवाल खड़े करता है।
महू एसडीएम इसलिए उलझे
फरियादी लीलाबाई और विद्या समेत राधा और महेश ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। उनके साथ कुछ अन्य लोग भी याचिका में शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक महू के बारडिया में उनकी एक हेक्टेयर जमीन है। यह जमीन सर्वे नंबर 3/4 पर दर्ज है।
तहसीलदार ने 23 अप्रैल को इस जमीन से कब्जा हटाने का आदेश दिया था। जमीन का कब्जा डाट कंस्ट्रक्शन के संदीप सिंह सरजू को सौंपने के निर्देश दिए थे। इसके खिलाफ पीड़ितों ने एसडीएम राकेश परमार के यहां अपील की। उन्होंने धारा 52 के तहत तहसीलदार के आदेश पर रोक मांगी।
एसडीएम कोर्ट ने 28 मई की अगली सुनवाई तक रोक लगा दी थी। इसके बाद 09 जून को एसडीएम ने अचानक यह रोक हटा दी थी। खास बात यह है कि रोक हटाने के लिए कोई आवेदन नहीं दिया गया था। डाट कंस्ट्रक्शन या किसी अन्य पक्ष ने भी ऐसी मांग नहीं की थी। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में इस आदेश को गैरकानूनी बताया है।
इस पर हाईकोर्ट ने दो बार दिया मौका
इस मामले में हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप भट्ट ने सुनवाई की। उन्होंने 24 जून को एसडीएम के 09 जून वाले आदेश पर रोक लगा दी। साथ ही एसडीएम राकेश परमार से शपथपत्र पर जवाब मांगा। कोर्ट ने पूछा कि आखिर किस नियम के तहत उन्होंने स्टे हटाया था।
हाईकोर्ट ने एसडीएम को 25 सितंबर तक जवाब देने का समय दिया था। तय तारीख पर जवाब नहीं आया और अतिरिक्त समय मांगा गया। इसके बाद 09 अक्टूबर को फिर सुनवाई हुई थी। इस बार भी एसडीएम ने जवाब पेश नहीं किया था।
इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने एसडीएम राकेश परमार को 16 अक्टूबर को खुद पेश होने का आदेश दिया था। साथ ही शपथपत्र देकर बताने को कहा कि धारा 52 के तहत लगी रोक किस कानूनी आधार पर हटाई गई थी।
हाईकोर्ट में बोले एसडीएम मैं आ रहा था कोर्ट
एसडीएम राकेश परमार 16 अक्टूबर को हाईकोर्ट में पेश हुए थे। उन्होंने शपथपत्र देकर अपना पक्ष रखा था। परमार ने बताया कि जमीन के मामले में लगी रोक 28 मई तक थी। उनके मुताबिक यह रोक 09 जून को खत्म हो गई थी।
एसडीएम ने सफाई दी कि हाईकोर्ट ने 24 जून को रोक लगाई थी। इसकी जानकारी मिलने के बाद 27 जुलाई को सभी कार्रवाई रोक दी गई थी।
एसडीएम ने 09 अक्टूबर को कोर्ट में पेश नहीं होने की वजह भी बताई थी। उन्होंने कहा कि वह उस दिन इंदौर आए थे। जब तक हाईकोर्ट पहुंचे तब तक मामले की सुनवाई खत्म हो चुकी थी।
पहले भी आदेश नहीं मानते रहे हैं अधिकारी- हाईकोर्ट
इस पर हाईकोर्ट जस्टिस ने तीन पेज का विस्तृत आदेश दिया और कहा कि- शपथ-पत्र को पढ़ने से पता चलता है कि SDO ने किस कानूनी प्रावधान के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया, इसके बारे में कोई स्पष्ट बयान या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। जबकि धारा 52 के तहत कार्यवाही का जिक्र खुद ही किया है। यह बात मानी गई है कि 9 अक्टूबर को भी संबंधित SDO कोर्ट की कार्यवाही में शामिल नहीं हुए। इसके लिए यह सफाई दी गई है कि वे इंदौर की यात्रा कर रहे थे और जब तक वे कोर्ट पहुंचे, तब तक मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी थी। संबंधित अधिकारी, जो SDO के रूप में एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) अधिकारी की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, उनका आचरण ऐसा रहा है कि उन्होंने पहले भी कोर्ट में पेश न होकर हमारे आदेशों की पूरी तरह अनदेखी की है।
इस मामले में हाईकोर्ट के जस्टिस ने तीन पेज का विस्तृत आदेश जारी किया है। कोर्ट ने कहा कि एसडीएम के शपथपत्र में कई बातें साफ नहीं हैं। एसडीएम ने यह नहीं बताया कि उन्होंने किस कानून के तहत स्टे हटाया है। उन्होंने खुद धारा 52 के तहत हुई कार्रवाई का जिक्र किया है।
हाईकोर्ट ने एसडीएम के कोर्ट में पेश नहीं होने पर भी सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि एसडीएम 09 अक्टूबर की सुनवाई में भी मौजूद नहीं थे। उन्होंने सफाई दी कि वह उस दिन इंदौर आ रहे थे। उनके पहुंचने से पहले ही मामले की सुनवाई खत्म हो गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि एसडीएम एक अर्ध-न्यायिक अधिकारी की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। ऐसे अधिकारी से कोर्ट के आदेशों का पालन करने की उम्मीद की जाती है। इसके बावजूद एसडीएम पहले भी कोर्ट में पेश नहीं हुए थे। कोर्ट ने उनके इस रवैये को अपने आदेशों की पूरी तरह अनदेखी माना है।
शपथपत्र में भी नहीं बताए नियम
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि एसडीएम ने शपथपत्र में भी सही जवाब नहीं दिया है। उन्होंने यह बताना जरूरी नहीं समझा कि किस नियम के तहत आदेश जारी किया था। एसडीएम ने कोर्ट के पिछले आदेश का भी पालन नहीं किया था। पिछली सुनवाई में भी वह पेश नहीं हुए और बहाने बनाते रहे।
हाईकोर्ट ने कहा कि एसडीएम का यह रवैया लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी दिखाता है। इससे साफ होता है कि संबंधित अधिकारी न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान नहीं कर रहे हैं।
50 हजार की कॉस्ट लगाते हैं- हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत के आदेशों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों को सबक मिलना जरूरी है। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई से दूसरों को भी संदेश मिलेगा। इसी वजह से कोर्ट ने एसडीएम राकेश परमार पर 50 हजार रुपए की कॉस्ट लगाई है।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यह रकम सात दिन के भीतर जमा करनी होगी। राशि मध्य प्रदेश स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (MP State Legal Services Authority) में जमा करानी होगी। इसकी रसीद भी हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में पेश करनी होगी।