ईरान-इजरायल युद्ध का असर, एमपी में महंगी हो सकती हैं दवाइयां, BP-शुगर के मरीजों पर सबसे ज्यादा असर
News In Short
- ईरान-इजरायल युद्ध से ग्लोबल सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।
- दवाओं का कच्चा माल एपीआई चीन से 166% तक महंगा हो गया है।
- शंघाई से मुंबई तक शिपिंग में अब 80 से 90 दिन लग रहे हैं।
- अगले 15 से 20 दिनों में दवाइयां 30% तक महंगी हो सकती हैं।
- बीपी, शुगर और अस्थमा के मरीजों पर सबसे ज्यादा बोझ पड़ेगा।
News In detail
युद्ध की आग का आपकी दवा पर असर
मिडिल ईस्ट (अमेरिका, इजराइल-ईरान) में जंग जारी है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने दुनियाभर की सप्लाई चेन हिला दी है। इसका सीधा असर अब भारत की मेडिकल किट पर पड़ता दिखाई दे रहा है।
दवाइयां बनाने में जो कच्चा माल लगता है उसे एपीआई (Active Pharmaceutical Ingredient) कहते हैं। यह ज्यादातर चीन से आता है। युद्ध की वजह से समुद्री रास्ते बदलने पड़ रहे हैं। इससे यह कच्चा माल 166% तक महंगा हो गया है।
कच्चा माल कितना महंगा हुआ?
पैरासिटामोल बनाने में काम आने वाला कच्चा माल पहले 225 रुपए प्रति किलो था। अब यह 575 रुपए प्रति किलो हो गया है। यानी 155% की उछाल। कफ सिरप में इस्तेमाल होने वाला प्रोफलीन ग्लाइकॉल पहले 150 रुपए था और अब 400 रुपए है, जो 166% की बढ़ोतरी है।
पेनकिलर दवाओं में लगने वाला आइट्रप्रेड 600 से बढ़कर 900 रुपए हो गया है। एंटीबायोटिक सिफाक्सिम का कच्चा माल आठ हजार 500 से 11 हजार रुपए पर पहुंच गया है।
इंफेक्शन में काम आने वाले एजोथाइमैसिन में भी 32% की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। ये आंकड़े बेसिक ड्रग डीलर्स एसोसिएशन मध्यप्रदेश के हैं।
शिपिंग लागत क्यों बढ़ी?
पहले शंघाई से मुंबई तक माल आने में 30 से 40 दिन लगते थे। अब सुरक्षित रास्तों की तलाश में जहाज 80 से 90 दिन ले रहे हैं। शिपिंग लागत 15 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 40 रुपए प्रति किलो हो गई है। यानी लागत लगभग ढाई गुना हो गई है।
मध्य प्रदेश में 200 से ज्यादा छोटी-बड़ी फार्मा कंपनियां कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर हैं। जब कच्चा माल ही इतना महंगा हो तो दवा की कीमत (मध्यप्रदेश में दवाई महंगी) भी बढ़नी तय है।
20 दिन में दिखेगा असर
अभी पहला झटका जेनेरिक दवाओं पर लगा है। जो दवाइयां पहले 10 से 20 फीसदी छूट पर मिलती थीं, वे अब एमआरपी (Maximum Retail Price) पर बिक रही हैं। आने वाले दिनों में ब्रांडेड दवाइयां और सर्जिकल सामान भी महंगे हो सकते हैं।
मरीजों की जेब पर कितना बोझ?
रोज दवा लेने वाले मरीजों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। जिन परिवारों में दो बुजुर्ग हैं और हर महीने दवाओं पर तीन हजार रुपए खर्च होते हैं, उनका खर्च बढ़कर तीन हजार 800 से चार रुपए तक पहुंच सकता है। बीपी, शुगर और अस्थमा जैसी बीमारियों के मरीज रोज दवा लेते हैं। उन पर सबसे ज्यादा मार पड़ेगी।
सरकारी अस्पताल भी खतरे में?
कच्चा माल महंगा होने पर टेंडर वाली छोटी फार्मा कंपनियां सप्लाई से हाथ खींच सकती हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में मिलने वाली दवाओं की कमी हो सकती है। गरीब मरीजों के लिए यह और भी मुश्किल स्थिति बन सकती है।
अभी क्या करें मरीज?
विशेषज्ञों का सुझाव है कि जो मरीज लंबे समय से दवाइयां ले रहे हैं, वे डॉक्टर से जेनेरिक विकल्पों के बारे में पूछें। थोड़ा स्टॉक रखना भी समझदारी हो सकती है। लेकिन जमाखोरी से बचें क्योंकि इससे बाजार में दवाओं की कमी हो सकती है।
युद्ध रुका नहीं तो क्या होगा?
अगर ईरान-इजरायल तनाव लंबा खिंचा तो हालात और बिगड़ सकते हैं। सप्लाई चेन में और देरी आएगी। कच्चे माल की किल्लत बढ़ सकती है। ।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर आम नागरिकों के स्वास्थ्य और जेब दोनों से जुड़ी है। भारत में करोड़ों लोग बीपी, शुगर और अस्थमा जैसी पुरानी बीमारियों से पीड़ित हैं। उन्हें हर महीने दवाइयों पर खर्च करना पड़ता है। अगर कीमतें 30% बढ़ गईं तो गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों पर सीधा आर्थिक बोझ पड़ेगा।
FAQ
- दवाइयां कितनी महंगी होंगी और कब से?
दवा बाजार के जानकारों के मुताबिक अगले 15 से 20 दिनों में बाजार में दवाइयों की कीमतें 25 से 30 फीसदी तक बढ़ सकती हैं। अभी जेनेरिक दवाओं पर मिलने वाली 10 से 20 फीसदी छूट बंद हो गई है और वे एमआरपी पर बिक रही हैं। ब्रांडेड दवाइयों और सर्जिकल सामान की कीमतें भी बढ़ने की तैयारी है। इसकी मुख्य वजह यह है कि चीन से आने वाला कच्चा माल यानी एपीआई 166% तक महंगा हो गया है और शिपिंग लागत भी ढाई गुना बढ़ी है। - क्या सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाइयां भी प्रभावित होंगी?
हां, इसका असर सरकारी अस्पतालों पर भी पड़ सकता है। छोटी फार्मा कंपनियां सरकारी टेंडर के तहत सस्ती दवाइयां सप्लाई करती हैं। जब कच्चा माल महंगा हो जाता है तो इन कंपनियों के लिए टेंडर रेट पर सप्लाई करना घाटे का सौदा बन जाता है। ऐसे में वे सप्लाई से हाथ खींच सकती हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों को मिलने वाली मुफ्त दवाइयों की कमी हो सकती है।
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