जबलपुर की बैलेंसिंग रॉक के पास निर्माण पर सवाल: 20 फीट दूर बन रही बहुमंजिला इमारत, सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोप
मदन महल की पहाड़ियों पर निर्माण
मदन महल की पहाड़ियों पर एक विशाल पत्थर की चट्टान दूसरी चट्टान के ऊपर टिकी है। देखने वालों को लगता है कि वह अभी गिर जाएगी। टनों वजनी यह संरचना लंबे समय से जबलपुर की पहचान है। अब इसके ठीक पीछे करीब 20 फीट की दूरी पर बहुमंजिला इमारत बन रही है।
यहां आने वाले पर्यटकों का कहना है कि ऐसी प्राकृतिक संरचना दोबारा नहीं बनाई जा सकती। वे चट्टान के साथ आसपास के क्षेत्र को भी संरक्षित करने की बात कहते हैं।
कैसे बनी ऐसी चट्टान
जियोलॉजिस्ट के अनुसार ऐसी संरचनाएं प्राचीन ज्वालामुखीय चट्टानों से बनती हैं। लंबे समय तक हवा और पानी से हुए प्राकृतिक कटाव का भी इसमें हाथ होता है। आसपास की नरम चट्टानें घिसकर हट गईं। विशाल चट्टान छोटे आधार पर बैलेंस रह गई।
निर्माण से वास्तव में कितना खतरा है, यह सिर्फ दिखने वाली स्थिति से तय नहीं हो सकता। इसके लिए जियोलॉजिस्ट और स्ट्रक्चरल इंजीनियर की जांच जरूरी है।
भूकंप में भी अपनी जगह टिकी रही
चट्टान साल 1935 के भूकंप से लेकर 1997 के 6.5 तीव्रता वाले भूकंप तक के झटकों में अपनी जगह पर टिकी रही। यही इसकी खास पहचान है।
सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. पीजी नाजपांडे के आरोप इस मामले का केंद्र हैं। यह सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप है, जो अभी साबित नहीं हुआ।
1910 के रिकॉर्ड से 0.8 हेक्टेयर तक
नाजपांडे का दावा है कि साल 1910 के राजस्व रिकॉर्ड में खसरा नंबर 194 की 30 एकड़ जमीन सरकारी दर्ज थी। यह करीब 12 हेक्टेयर के बराबर बैठती है। उनका आरोप है कि समय के साथ कब्जे हुए और प्राइवेट प्रॉपर्टी में दर्ज होती गई।
उनके अनुसार अब चट्टान के आसपास केवल 0.8 हेक्टेयर सरकारी जमीन बची है। नाजपांडे ने प्रशासन से तत्काल दखल की मांग की है। वे निर्माण और जमीन के रिकॉर्ड की जांच चाहते हैं।
इन आरोपों का जवाब राजस्व रिकॉर्ड, प्रॉपर्टी म्युटेशन डॉक्यूमेंट,कंस्ट्रक्शन परमिट और मौके की डिमार्केशन रिपोर्ट से ही मिलेगा। फिलहाल कब्जे और दस्तावेजों में हेरफेर के आरोपों की पुष्टि जरूरी है। नाजपांडे ने इस धरोहर को करीब 2 हजार साल पुरानी बताया है।
बैलेंसिंग रॉक की जिम्मेदारी किसकी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यहां इमारत बनाने की अनुमति किसने दी। दूसरा सवाल यह है कि बैलेंसिंग रॉक की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस विभाग की है। इस बारे में अलग-अलग विभागों के बयान सामने आए हैं।
पर्यटन विभाग ने पुरातत्व विभाग को जिम्मेदार बताया
पर्यटन विभाग के रीजनल मैनेजर नवीन शर्मा ने कहा कि चट्टान की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग की है। उनके मुताबिक, सामाजिक संगठनों की शिकायत काफी हद तक सही है। वे इस मामले को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाएंगे।
शर्मा ने बताया कि यहां जानकारी देने वाला बोर्ड और लाइटिंग की व्यवस्था है। हालांकि, उन्होंने माना कि ये इंतजाम पर्याप्त नहीं हैं। यहां भारतीयों के साथ विदेशी पर्यटक भी आते हैं।
आर्केलॉजिकल डिपार्टमेंट के सीनियर गाइड राजकुमार ने कहा कि उनके विभाग के पास संग्रहालय की जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक, बैलेंसिंग रॉक की देखरेख जिला प्रशासन करता है।
नगर निगम को निर्माण की जानकारी नहीं
नगर निगम के भवन अधिकारी शैलेंद्र सिंह कौरव ने कहा कि उन्हें यहां हो रहे निर्माण की जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि शिकायत मिलने पर जांच कराई जाएगी। अगर निर्माण बिना अनुमति या नियमों के खिलाफ मिला, तो कार्रवाई होगी।
इस तरह पर्यटन विभाग ने पुरातत्व विभाग को जिम्मेदार बताया। पुरातत्व विभाग ने जिम्मेदारी जिला प्रशासन की बताई। वहीं, नगर निगम ने निर्माण की जानकारी नहीं होने की बात कही। ऐसे में अब तक यह साफ नहीं है कि चट्टान की सुरक्षा और निर्माण की जांच की जिम्मेदारी किस विभाग की है।
मशीनों की धमक और पानी से खतरे की आशंका
आर्कियोलॉजिकल एक्सपर्ट मनोहर सिंह उईके ने कंपन की आशंका जताई। उनके मुताबिक आसपास मशीनों के इस्तेमाल से पैदा होने वाला कंपन चट्टान को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि अतिक्रमण बढ़ने से प्राकृतिक सुंदरता भी खत्म होगी।
उईके के अनुसार, पानी की निकासी की व्यवस्था न हो, तो पानी जमा हो सकता है। लंबे समय तक जमाव और बहाव चट्टान के आसपास की जमीन पर असर डाल सकते हैं। ये आशंकाएं हैं, नतीजे नहीं। निर्माण की स्थिति, मशीनों के इस्तेमाल और जल निकासी का तकनीकी आकलन जरूरी है।
जांच से साफ होगी जमीन और निर्माण की सच्चाई
प्रशासन को जमीन के रिकॉर्ड और निर्माण की अनुमति की जांच करनी चाहिए। इससे पता चलेगा कि इमारत बनाने की अनुमति सही तरीके से मिली है या नहीं। साथ ही, एक्सपर्ट से चट्टान की सुरक्षा की जांच भी करानी चाहिए।
जबलपुर की इस प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए सिर्फ लाइटिंग और बोर्ड लगाना काफी नहीं है। सबसे पहले तीन सवालों के जवाब मिलने चाहिए। जमीन किसकी है? निर्माण की अनुमति किसने दी? और चट्टान की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस विभाग की है?
FAQs
- क्या मदन महल की पहाड़ियों पर स्थित गोलाकार चट्टान सुरक्षित है?
मदन महल की गोलाकार चट्टान पिछले कई भूकंपों के दौरान अपनी जगह पर टिकी रही है, लेकिन निर्माण कार्य के कारण संभावित खतरे की आशंका है, जिसे जियोलॉजिस्ट और स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स की जांच से स्पष्ट किया जा सकता है। - किसके द्वारा मदन महल क्षेत्र में निर्माण की अनुमति दी गई है?
इस समय यह स्पष्ट नहीं है कि निर्माण की अनुमति किस विभाग ने दी है, चूंकि पर्यटन विभाग ने पुरातत्व विभाग को जिम्मेदार बताया है, जबकि नगर निगम ने निर्माण की जानकारी न होने की बात कही है। - डॉ. पीजी नाजपांडे के आरोप क्या हैं और उनका महत्व क्या है?
डॉ. पीजी नाजपांडे ने सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप लगाया है, यह कहते हुए कि साल 1910 के रिकॉर्ड के अनुसार 0.8 हेक्टेयर सरकारी जमीन बची है। उनका आरोप मामले की प्रशासनिक जांच और निर्माण की अनुमति की जांच की जरूरत को दर्शाता है।