यह सजा नहीं आत्मसंतुष्टि है...याचिका बहाल करने एमपी हाईकोर्ट ने दिया अनोखा आदेश
समझें क्या है पूरा मामला...
- पैरवी के अभाव में खारिज याचिका को बहाल करने की अनुमति दी है।
- हाईकोर्ट ने दिव्यांग बच्चों के साथ एक घंटा बिताने की अनोखी शर्त रखी है।
- 2,500 रुपए की खाद्य सामग्री लेकर शासकीय दृष्टिबाधित विद्यालय जाने का सुझाव।
- कोर्ट ने कहा- यह सजा नहीं, समाज सेवा और सोशल ऑडिट की शुरुआत है।
- महिला एवं बाल विकास और सामाजिक न्याय विभाग को आदेश की प्रति भेजने के निर्देश।
पैरवी नहीं होने से खारिज हुई थी याचिका
जबलपुर हाईकोर्ट में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा ने भारत संघ एवं अन्य द्वारा दायर एमसीसी पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
यह आवेदन उस याचिका को दोबारा बहाल कराने के लिए दायर किया गया था, जिसे पहले पैरवी नहीं होने के कारण खारिज कर दिया गया था। आवेदकों ने कोर्ट को बताया कि यह चूक जानबूझकर नहीं बल्कि परिस्थितियों के कारण हुई थी।
वकील की गलती का खामियाजा पक्षकार क्यों भुगते
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और पूर्व के फैसलों का हवाला देिया। कोर्ट ने कहा कि किसी अधिवक्ता की गलती का नुकसान मुकदमे के पक्षकार को नहीं उठाना चाहिए।
कोर्ट ने माना कि आवेदकों द्वारा बताए गए कारण वास्तविक हैं। इसी आधार पर याचिका को बहाल करने का निर्णय लिया गया।
केस बहाली की शर्त बनी समाज सेवा
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि आवेदक शासकीय दृष्टिबाधित उच्च विद्यालय, अंधमूक बाईपास, जबलपुर जाएं। वहां करीब दो हजार 500 रुपए की खाद्य सामग्री लेकर दिव्यांग बच्चों एवं वहां रह रहे लोगों के साथ कम से कम एक घंटा बिताएं।
कोर्ट ने कहा कि इससे न केवल बच्चों के चेहरे पर मुस्कान आएगी, बल्कि समाज को यह संदेश भी मिलेगा कि दिव्यांग और बेसहारा लोग समाज का अभिन्न हिस्सा हैं।
जस्टिस बोले- यह सजा नहीं, आत्मसंतुष्टि का अवसर
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश दंडात्मक नहीं है बल्कि समाज सेवा की भावना को बढ़ावा देने के लिए दिया गया है। आवेदकों के अधिवक्ता ने भी कोर्ट के सुझाव को स्वीकार किया। साथ ही 15 दिनों के भीतर विद्यालय जाकर सेवा कार्य करने तथा अपने अनुभव की रिपोर्ट और हलफनामा प्रस्तुत करने का भरोसा दिया।
सोशल ऑडिट को बताया समय की जरूरत
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक टेस्ट केस है। इससे समाज में सोशल ऑडिट की अवधारणा को बढ़ावा मिल सकता है। कोर्ट ने कहा कि वकील, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य सक्षम नागरिक समय-समय पर अनाथालय, वृद्धाश्रम, वन स्टॉप सेंटर और ऐसे संस्थानों का दौरा करें, ताकि वहां रहने वाले लोगों की वास्तविक स्थिति सामने आए और उनकी मदद हो सके।
सरकार को भी दिए महत्वपूर्ण सुझाव
हाईकोर्ट ने कहा कि सामाजिक संस्थानों में रहने वाले बच्चों, महिलाओं और अन्य जरूरतमंदों के साथ कभी-कभी दुर्व्यवहार की शिकायतें भी सामने आती हैं।
कोर्ट ने कहा कि यदि समाज नियमित रूप से इन संस्थानों तक पहुंचेगा तो वहां का प्रबंधन भी अधिक जवाबदेह रहेगा। इसी उद्देश्य से कोर्ट ने आदेश की प्रति मुख्य सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक न्याय विभाग तथा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की किशोर न्याय समिति को भी भेजने के निर्देश दिए।
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