गैस सिलेंडर से छुट्टी! जबलपुर के इस गांव में ऐसे बनता है खाना

Sandeep Kumar | Mar 16, 2026, 16:28 IST
biogas plant
Jabalpur. एलपीजी संकट के बीच जबलपुर का बंदरकोला गांव एक मिसाल बनकर सामने आया है। यहां करीब 75% घरों में बायोगैस प्लांट लगे हैं। 300 घरों में बायोगैस प्लांट से 24 घंटे गैस मिल रही है।

News in Short

  • एलपीजी संकट से देशभर में उपभोक्ता परेशान हैं।
  • जबलपुर का बंदरकोला गांव इस संकट से दूर है।
  • गांव के लगभग 75 प्रतिशत घर बायो गैस पर निर्भर हैं।
  • गांव में करीब 300 घरों में गोबर गैस प्लांट लगे हैं।
  • बढ़ती सिलेंडर कीमतों के बीच यह मॉडल चर्चा में है।

News in Detail

एलपीजी की कमी से आम उपभोक्ता परेशान है। कई लोग सिलेंडर के लिए कतार में खड़े हैं। कई लोग सिलेंडर पाने सड़कों पर भटक रहे हैं। जबलपुर का एक गांव इस संकट से दूर है। गांव के लगभग 75 प्रतिशत घर एलपीजी पर निर्भर नहीं। यहां चूल्हे गोबर गैस से जलते हैं। बरगी क्षेत्र का बंदरकोला गांव चर्चा में है।



गांव के लोग सिलेंडर संकट से प्रभावित नहीं हैं। यह गांव अब दूसरों के लिए उदाहरण बन रहा है। घरों में चौबीस घंटे बायो गैस मिलती है। गांव की आबादी करीब ढाई हजार है। गांव में चार सौ से अधिक घर हैं। करीब तीन सौ घरों में गोबर गैस प्लांट लगे हैं। गांव की महिलाएं एलपीजी चिंता से काफी हद तक मुक्त हैं।



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बायो गैस से गांव में जलते हैं चूल्हे

एलपीजी संकट के बीच यह गांव अब रोल मॉडल बन रहा है। गांव की महिलाएं कहती हैं कि उन्हें संकट की जानकारी है। महिलाएं खुद को इस समस्या से दूर मानती हैं। गांव में बायो गैस से चूल्हे जलते हैं।



गांव की निवासी नीता पटेल बताती हैं कि गांव में एलपीजी जैसी समस्या नहीं दिखती। अधिकतर घरों में बायो गैस प्लांट लगे हैं। जरूरत के समय गैस आसानी से मिल जाती है। घरों में रोज आराम से खाना बनता है।



नीता पटेल बायो गैस को सस्ता और आसान बताती हैं। लोग घरों में बायो गैस प्लांट लगा सकते हैं। इससे पशुओं का गोबर उपयोग में आता है। घरों को गैस भी मिलती है। एक साथ दो फायदे मिलते हैं।



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गांव की बदली तस्वीर

गांव में गाय अधिक हैं। गोबर की पर्याप्त उपलब्धता रहती है। तेरह साल पहले स्थिति अलग थी। उस समय किसी घर में बायो गैस प्लांट नहीं था। शुरुआत वर्ष 2013 में हुई। पहल पूर्व सरपंच अजय पटेल ने की। उन्होंने अपने घर में पहला प्लांट लगाया। घर में गाय होने से गोबर आसानी से मिला। प्लांट नियमित रूप से चलता रहा। धीरे धीरे यह प्रयोग गांव में चर्चा बना। ग्रामीणों ने इस मॉडल को अपनाना शुरू किया। समय के साथ कई घरों में प्लांट लग गए।



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सिलेंडर की कीमत भी लगातार बढ़ रही

इस गैस के लिए बड़े संयंत्र की जरूरत नहीं। प्लांट घर में ही लगाया जाता है। गैस पाइपलाइन से सीधे किचन पहुंचती है। चूल्हा इसी गैस से जलता है। अजय पटेल बताते हैं कि प्लांट से बड़ी सुविधा मिली।



प्लांट लगने के बाद सिलेंडर नहीं खरीदना पड़ा। कुछ घरों में अब गाय नहीं बची हैं। गोबर की कमी से कई प्लांट बंद हुए। कई परिवारों ने एलपीजी उपयोग शुरू किया। अब एलपीजी की कमी बढ़ती दिख रही है। सिलेंडर की कीमत भी लगातार बढ़ रही है। कई परिवारों ने पुराने प्लांट फिर चालू किए। बायो गैस का उपयोग फिर बढ़ रहा है।



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