जल जीवन मिशन झाबुआ में फेल, 430 करोड़ खर्च फिर भी जनता प्यासी, जिम्मेदार कौन?

Aman Vaishnav | Jun 05, 2026, 12:06 IST
jal jeevan mission jhabua scam ground reality
मध्यप्रदेश के झाबुआ में जल जीवन मिशन पर 430 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। 519 गांवों में काम पूरा दिखाया गया, लेकिन जमीन पर महिलाएं आज भी सिर पर मटका लेकर किलोमीटर चल रही हैं।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • झाबुआ में जल जीवन मिशन पर 430 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।
  • 713 में से 519 गांवों में काम पूरा बताकर पंचायतों को सौंप दिया गया है।
  • जमीन पर महिलाएं सूखी नदी के गड्ढों से पानी निकाल रही हैं।
  • करोड़ों की टंकियां खाली हैं, वाटर सिस्टम मशीन पर धूल जमी है।
  • अधिकारी जिम्मेदारी पंचायतों पर डाल रहे हैं, पानी किसी को नहीं मिल रहा है।
jal-jeevan-mission-jhabua-scam ground reality

430 करोड़ का दावा, प्यास वही पुरानी

मध्यप्रदेश सरकार के सरकारी रिकॉर्ड कहते हैं कि झाबुआ जिले के 713 गांवों में से 519 में जल जीवन मिशन का काम पूरा हो चुका है।



कागजों पर 430 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। पंचायतों को हैंडओवर भी हो चुका है। सब कुछ ठीक दिखता है, लेकिन जमीन पर तस्वीर एकदम उलटी देखने मिल रही है।



झाबुआ के खेड़ा गांव में 10 से 12 महिलाएं रोज सुबह सिर पर मटके रखकर निकलती हैं। गांव से करीब एक किलोमीटर दूर पत्थरों और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों से होकर जाती हैं।



तपती गर्मी में भामची नदी के सूखे पाट में खोदे गए गड्ढों से पानी निकालती हैं। यही है 430 करोड़ रुपए की जल योजना की जमीनी हकीकत।



jal-jeevan-mission-jhabua-scam ground reality

नल लगे हैं, पानी गायब है

पारा पंचायत के बखतपुरा वार्ड में पाइपलाइन बिछ चुकी है। घरों के बाहर नल भी लगे हैं। सरकारी फाइल में यह काम पूरा और पंचायत को सौंपा हुआ दर्ज है। लेकिन इन नलों से पानी की एक बूंद नहीं आती।



ग्रामीणों के घरों के बाहर बड़े-बड़े ड्रम रखे हैं। उनमें टैंकर से खरीदा हुआ पानी भरा जाता है। यानी जिस योजना पर करोड़ों खर्च हुए, उसके बावजूद लोग हर महीने अपनी जेब से पैसे देकर पानी खरीद रहे हैं।



सबसे शर्मनाक बात यह है कि कई जगह उन्हीं सरकारी नलों से लोगों ने अपनी बकरियां बांध रखी हैं। नल का यही उपयोग बचा है।



स्थानीय निवासी सतीश ने बताया कि उन्होंने सात बार अलग-अलग अधिकारियों को पत्र लिखे। हर बार आश्वासन मिला, नतीजा शून्य रहा।



ऊपर से पंचायत जल कर यानी वाटर टैक्स जमा करने का दबाव बना रही है। पानी मिले न मिले, टैक्स देना जरूरी है।



jal-jeevan-mission-jhabua-scam-ground-reality

करोड़ों की टंकी, धूल खाती मशीन

धांधलपुरा गांव में एक करोड़ रुपए से ज्यादा की लागत से 50 हजार लीटर की पानी की टंकी बनाई गई। साथ में वाटर डिसइन्फेक्शन सिस्टम भी लगाया गया। लेकिन मौके पर पहुंचने पर पता चला कि टंकी में पानी बेहद कम है। वह सिस्टम जिस पर लाखों खर्च हुए, वह कभी चला ही नहीं।



मशीन पर धूल की मोटी परत जमी है। तार खुले पड़े हैं। कारण पूछा तो जवाब मिला कि बिजली कनेक्शन ही नहीं दिया गया।



यानी मशीन लगाई, उद्घाटन शायद हुआ, तस्वीरें भी खिंचीं, लेकिन बिजली देना किसी को याद नहीं रहा। अब यह सिस्टम सिर्फ दिखावे का ढांचा बनकर रह गया है।



jal-jeevan-mission-jhabua-scam-ground reality

महिलाओं के पैरों ने जवाब दिया, सरकार चुप है

खेड़ा गांव की एक बुजुर्ग महिला ने जो बात कही, वह इस पूरी योजना की विफलता का सबसे दर्दनाक बयान है। उन्होंने कहा कि वर्षों से पानी ढोते-ढोते अब पैरों ने जवाब देना शुरू कर दिया है।



ग्रामीणों के अनुसार 2022 में पाइपलाइन बिछाई गई थी। चार साल बाद भी न नल लगे, न पानी आया।



पानी भरने में रोज दो से तीन घंटे लगते हैं। घर में मेहमान आ जाएं या कोई खास मौका हो तो यह सफर दो बार तय करना पड़ता है।



किसी के सिर पर एक मटका होता है, कोई दो-दो बर्तन उठाकर चलती है। यह वह तस्वीर है जो 430 करोड़ के बाद भी नहीं बदली।



अफसर बोले, हमने काम दे दिया

जब लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग यानी पीएचई के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर जितेंद्र मावी से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि विभाग योजना पूरी करके पंचायत को सौंप देता है। इसके बाद रखरखाव की जिम्मेदारी पंचायत की है। यानी विभाग ने हाथ झाड़ लिए।



पीएचई मंत्री संपतिया उइके ने कहा कि भीषण गर्मी और भूजल स्तर में गिरावट के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर काम हो रहा है।



सवाल यह है कि अगर भूजल की समस्या पहले से पता थी, तो योजना बनाते वक्त इसका हल क्यों नहीं निकाला गया? और अगर पंचायत जिम्मेदार है, तो



430 करोड़ रुपए आखिर किस काम आए?

जवाब मांगता है झाबुआ



खेड़ा में 75 लाख, पारा पंचायत में 50 लाख, धांधलपुरा में एक करोड़ से ज्यादा, यह सब खर्च हो चुका है। सरकारी फाइलों में सब कुछ पूरा है।



जब तक महिलाएं सूखी नदी के गड्ढों से पानी निकाल रही हैं, जब तक नलों से बकरियां बंधी हैं, जब तक करोड़ों की मशीन पर धूल जम रही है, तब तक यह सवाल जिंदा रहेगा कि 430 करोड़ गए कहां?



FAQ

  1. झाबुआ में जल जीवन मिशन पर कितना पैसा खर्च हुआ और नतीजा क्या रहा?
    झाबुआ जिले में जल जीवन मिशन के तहत अब तक 430 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। 713 गांवों में से 519 में काम पूरा बताकर पंचायतों को सौंप दिया गया। लेकिन जमीनी पड़ताल में सामने आया कि कई गांवों में नल से पानी नहीं आता, महिलाएं आज भी दूर से पानी ढो रही हैं और करोड़ों की टंकियां लगभग खाली हैं।
  2. जल जीवन मिशन में पानी न मिलने की जिम्मेदारी किसकी है?
    पीएचई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि काम पूरा करके पंचायत को सौंपने के बाद रखरखाव की जिम्मेदारी पंचायत की है। मंत्री ने गर्मी और भूजल स्तर की गिरावट को कारण बताया। लेकिन विशेषज्ञों का सवाल है कि इन चुनौतियों को ध्यान में रखकर योजना क्यों नहीं बनाई गई और करोड़ों की मशीन को बिजली कनेक्शन क्यों नहीं दिया गया।

ये खबरें भी पढ़िए...

एमपी न्यूज: आदिवासी योजनाओं में गड़बड़ी, छात्रों की शिक्षा और गरीबों के हक से खिलवाड़



मध्यप्रदेश न्यूज: रसूखदारों ने बदला जंगल का भूगोल, बांधवगढ़ में खतरे में बाघों की जिंदगी



भ्रष्टाचार की जांच में सुस्त लोकायुक्त और EOW, खात्मा रिपोर्ट पेश करने में दिखाई फुर्ती



स्पेशल ट्रेन के नाम पर रेलवे का खेल, बिना सुविधा दिए वसूल रहा 25% ज्यादा किराया



Tags:
  • एमपी न्यूज
  • मध्यप्रदेश न्यूज
  • मध्यप्रदेश सरकार
  • जल जीवन मिशन
  • झाबुआ
  • लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग