झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे

Sanjay Gupta | Sept 28, 2026, 22:45 IST
अक्षय सिंह की नौकरी पर संकट! फर्जी जाति प्रमाणपत्र मामले में बढ़ी मुश्किलें
INDORE: झाबुआ के संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह मरकाम उर्फ गुप्ता की नौकरी खतरे में आ गई है। राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने उन्हें एक के बाद एक तीन नोटिस थमा दिए हैं। मामला फर्जी जाति प्रमाणपत्र से पीएससी पास करने का है। बताया जा रहा है कि मरकाम के जाति (एसटी) प्रमाणपत्र को लेकर हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं।

इंदौर में एसडीएम रह चुके अक्षय सिंह मरकाम उर्फ गुप्ता अभी झाबुआ में संयुक्त कलेक्टर है। वह राज्य प्रशासनिक सेवा (State Administrative Service ) के 2017 बैच के अधिकारी है। लेकिन अब उनकी नौकरी खतरे में आ गई है। मरकाम के जाति (एसटी) प्रमाणपत्र को लेकर हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं। लेकिन पहली बार उनकी जांच शुरू हुई है। राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने उन्हें एक नहीं तीन-तीन नोटिस थमा दिए हैं।



समिति ने इस तरह से दिए नोटिस

उनके प्रमाणपत्र फर्जी होने को लेकर जनवरी 2025 में शिकायत हुई। इसके बाद मामला ठंडा चलता रहा। मनावर विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने इस पर विधानसभा में सवाल लगा दिया। इस पर खुद सीएम डॉ. मोहन यादव ने जवाब दिया हैं। उन्होंने कहा कि छाबनीन समिति जांच कर रही है। इसके बाद जांच में तेजी आई। मरकाम को 16 अप्रैल 2026, फिर 18 अगस्त और इसके बाद 19 सितंबर को नोटिस जारी हुआ।



इन सभी नोटिस में अक्षय सिंह मरकाम (गुप्ता) पिता नागेशवर गुप्ता लिखा गया है। अंतिम नोटिस में उन्हें 29 सितंबर को कमेटी के सामने भोपाल में पेश होने के आदेश हुए हैं। इसमें कहा गया है कि आपके संदेहास्पद जाति प्रमाणपत्र को लेकर लिखित व मौखिक जवाब दीजिए, नहीं तो कमेटी द्वारा इस मामले में एकपक्षीय कार्रवाई की जाएगी।



बचने के लिए मरकाम पहुंचे हाईकोर्ट

उधर इस कार्रवाई से बचने के लिए मरकाम इंदौर हाईकोर्ट पहुंच गए हैं। इसमें उन्होंने छाबनीन कमेटी, कमेटी सचिव और डीसीपी इंदौर जोन 4 को पक्षकार बनाया है। मरकाम का कहना है कि वह कमेटी के सामने 16 अप्रैल के नोटिस पर पेश हो चुके हैं। उन्हें अपना सर्टिफिकेट बता चुके हैं। इस मामले में डीसीपी जोन 4 की रिपोर्ट में सब क्लियर है। लेकिन इसके बाद भी अधिकार से परे जाकर कमेटी उन्हें नोटिस दे रही है।



मरकाम ने कहा कि उनकी भुंजिया जाति, एसटी में आती है और इसका सितंबर 1976 के नोटिफिकेशन में जिक्र है। मेरे पिता नागेशवर गुप्ता का 1981 में उज्जैन से प्रमामपत्र बना। मेरे चाचा भी उज्जैन में इस सर्टिफिकेट पर शासकीय नौकरी में हैं। मेरे द्वारा गजट पत्र में जारी कर सरनेम गुप्ता से मरकाम किया गया, जो अगस्त 2013 में प्रकाशित हुआ। लेकिन इसके बाद भी परेशान किया जा रहा है।



मार्च में विधानसभा में उठा था सवाल

मप्र में आदिवासी यानी एसटी और अनुसूचित जाति (एससी) के फर्जी जाति प्रमाणपत्र से नौकरी लेने के मामले में मार्च में मप्र विधानसभा मनावर विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने सवाल उठाया था। इसमें नामजद अधिकारियों के नाम लेकर इनकी जानकारी भी मांगी है। विधायक का कहना है कि जाति प्रमाणपत्र के 1950 के क्राइटेरिया का पालन किए बिना यह प्रमाणपत्र बने हैं।



इन सभी की छानबीन समिति से जांच की बात उठाई गई है। इसमें विधायक ने इंदौर में एसडीएम रह चुके और अभी झाबुआ में पदस्थ संयुक्त कलेक्टर अक्षय मरकाम के प्रमाणपत्र पर सवाल उठाया है। इसके साथ ही भोपाल सेंट्रल जेल अधीक्षक राकेश कुमार मांगरे, धामनोद धार जिला एसपी कार्यालय में पदस्थ एसडीओपी मोनिका सिंह के प्रमाणपत्र को लेकर भी सवाल लगाया।



सीएम ने ये दिया था इन पर जवाब

विधायक अलावा के सवाल पर सीएम डॉ. मोहन यादव ने जवाब देते हुए कहा था कि सभी के प्रमाणपत्रों की जांच संबंधित विभाग की छानबीन समिति द्वारा अलग-अलग की जाती है। इसमें एसटी विभाग, एससी कल्याण विभाग, ओबीसी व अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की अलग-अलग छानबीन समिति है। वहीं तीनों अधिकारियों मरकाम, मांगरे और सिंह के फर्जी प्रमाणपत्र पर सीएम ने जवाब दिया कि इनकी जानकारी एकत्र की जा रही है।



एसडीएम मरकाम का केस बार-बार उठा

एसडीएम संयुक्त कलेक्टर मरकाम का केस काफी चर्चित रहा है। यह लगातार उठता रहा है। विधायक अलावा पहले भी इन्हें लेकर जानकारी मांग चुके हैं। आरोप है कि इनके पिता स्वर्गीय नागेशवर गुप्ता इंदौर को भुंजिया जनजाति का मानते हुए प्रमाणपत्र जारी किया गया।



यह राज्य सेवा परीक्षा 2015 की चयनसूची में 15वें नंबर पर आकर डिप्टी कलेक्टर बने थे। एसटी कैटेगरी में चयनित हुए। इन्हें लेकर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी द्वारा भी शिकायतें हुई है कि वह सामान्य वर्ग से हैं।



मरकाम उपनाम लगाया जो एसटी में आता है। उन्होंने दो अगस्त 2013 में नाम परिवर्तन की अधिसूचना जारी करवाई और अक्षय गुप्ता से अक्षय मरकाम बने। वह 2014 में डीएसपी पद पर चयनित हुए थे और फिर 2015 में डिप्टी कलेक्टर बने।



साल 1950 का क्राइटेरिया यह है

मध्यप्रदेश में जाति प्रमाणपत्र के लिए 1950 का क्राइटेरिया यह है कि आवेदक या उसके पूर्वजों (पिता/दादा) को 1950 या उससे पहले से ही मप्र. का स्थायी निवासी होना चाहिए। यदि 1950 के दस्तावेज़ नहीं हैं, तो राजस्व अधिकारी मौके पर जाकर या जांच के आधार पर जाति की पुष्टि कर सकते हैं।



यदि परिवार के किसी सदस्य (पिता, भाई, बहन, दादा) को पहले से ही 1996 के बाद अनुविभागीय अधिकारी (SDO) द्वारा जारी स्थायी जाति प्रमाणपत्र मिला है, तो उसे भी मान्य किया जाता है।



ओबीसी के लिए (OBC) के लिए यह निवास अवधि आमतौर पर 1984 या उससे पहले से मध्यप्रदेश में निवास होना चाहिए। कौन सी जाति एसटी, एससी, ओबीसी में है यह अधिसूचित है। संबंधित जिले में एरिया का एसडीओ के पास इसके आवेदन होते हैं। वह सभी दस्तावेज देखने के बाद इन्हें जारी करता है। कोई भी प्रमाणपत्र एसडीओ द्वारा जारी हुआ या नहीं यह वहां रखे रिकार्ड से चेक किया जा सकता है।



वही मरकाम का कहना है कि मेरे सभी दस्तावेज सही है कई बार इसकी जांच हो चुकी है। खुद कमेटी की पूर्व की प्रोसेडिंग में सब बातें साफ हो चुकी है और सही पाया गया था। मैं कमेटी के सामने अपना पक्ष रख चुका हूं।



  1. अक्षय सिंह मरकाम के जाति प्रमाणपत्र पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
    अक्षय सिंह मरकाम के जाति प्रमाणपत्र पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि उनकी जाति प्रमाणपत्र को फर्जी बताने संबंधी शिकायतें मिली हैं। राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने उनसे तीन नोटिस जारी किए हैं और इसकी जांच चल रही है।
  2. मरकाम ने हाइकोर्ट का रुख क्यों किया है?
    मरकाम ने अपने खिलाफ जारी नोटिसों से बचने के लिए इंदौर हाईकोर्ट का रुख किया है, जिसमें उन्होंने छाबनीन कमेटी, कमेटी सचिव और डीसीपी को पक्षकार बनाया है।
  3. जाति प्रमाणपत्र के लिए 1950 का क्राइटेरिया क्या है?
    मध्यप्रदेश में जाति प्रमाणपत्र के लिए 1950 का क्राइटेरिया है कि आवेदक या उसके पूर्वजों को 1950 या उससे पहले से मध्यप्रदेश का स्थायी निवासी होना चाहिए। यदि ऐसे दस्तावेज नहीं हैं, तो राजस्व अधिकारी मौके पर जाकर जाति की पुष्टि कर सकते हैं।
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