कैलारस शक्कर कारखाना हमेशा के लिए बंद, 23 हजार किसानों का सपना टूटा
समझें क्या है पूरा मामला...
- कैलारस शक्कर कारखाने की जमीन सरकार ने एमएसएमई विभाग को सौंप दी है।
- कारखाने का पंजीयन नंबर भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया है।
- सीएम मोहन यादव 6 बार कारखाना चालू करने की घोषणा कर चुके हैं।
- पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान भी 2 बार यह वादा कर चुके थे।
- किसानों ने अपनी जमीन और जेवर बेचकर इस कारखाने के शेयर खरीदे थे।
मुरैना जिले के कैलारस स्थित शक्कर कारखाने की बेशकीमती जमीन को सरकार ने लघु एवं सूक्ष्म उद्योग विभाग यानी एमएसएमई (Micro, Small and Medium Enterprises) को सौंप दिया है।
इसके साथ ही कारखाने का पंजीयन नंबर भी खत्म कर दिया गया है। यह फैसला उस समय आया है जब प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद इस कारखाने को दोबारा शुरू करने का भरोसा कई बार दे चुके थे।
मुख्यमंत्री और मंत्री कर चुके थे वादे
बता दें कि मुख्यमंत्री मोहन यादव अब तक 6 बार कैलारस शक्कर कारखाना चालू करने की घोषणा कर चुके हैं। इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मंच से 2 बार यही आश्वासन दे चुके थे।
कृषि एवं किसान विकास मंत्री ऐदल सिंह कंषाना ने भी किसानों को गन्ना उत्पादन बढ़ाने के लिए एक करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी। इतने वादों के बावजूद सरकार ने चुपचाप कारखाने की जमीन दूसरे विभाग को सौंप दी।
विधायक ने किया था विरोध प्रदर्शन
इस फैसले से दो दिन पहले जौरा विधायक पंकज उपाध्याय ने कैलारस में धरना दिया था। उन्होंने कारखाना परिसर में आंदोलन भी किया था। किसान मोर्चा के पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार यह फैसला ले ही नहीं सकती थी।
विधायक के मुताबिक जिस जमीन पर कारखाना बना है, वह सहकारिता विभाग की है। किसान नेताओं का आरोप है कि जमीन को एमएसएमई विभाग को सौंपकर उसे खुर्दबुर्द करने की योजना बनाई गई है।
क्या हो सकता है जमीन का इस्तेमाल
किसान नेताओं के मुताबिक अब एमएसएमई विभाग इस जमीन पर प्लॉट काटेगा। यहां छोटे उद्योग खोलने की बात कही जा रही है। लेकिन नेताओं का कहना है कि उद्योगों की आड़ में मैरिज गार्डन जैसी गतिविधियां भी चल सकती हैं। उनका आरोप है कि ये प्लॉट राजनैतिक रसूख वाले लोगों को मिलेंगे। इससे गरीब किसानों को कोई फायदा नहीं होगा।
किसानों के पैसों से बना था कारखाना
बता दें कि कैलारस शक्कर कारखाने की आधारशिला साल 1965 में रखी गई थी। इसकी विधिवत शुरुआत साल 1971-72 में हुई थी। तब पहली बार गन्ने से शक्कर बनाई गई थी।
इस कारखाने के लिए 23 हजार किसानों ने शेयर खरीदे थे। कई किसानों ने शेयर खरीदने के लिए अपनी जमीनें तक बेच दी थीं। कुछ किसानों ने अपनी पत्नियों के जेवर भी बेच दिए थे। तब जाकर यह कारखाना शुरू हो पाया था।
चार जिलों के किसान आते थे यहां
कारखाना शुरू होने के बाद इसका फायदा सिर्फ मुरैना तक सीमित नहीं रहा। भिंड जिले के किसान भी यहां गन्ना बेचने आते थे। ग्वालियर के घाटीगांव और श्योपुर जिले के किसान भी यहां पहुंचते थे।
यह इलाका पहले डकैत प्रभावित माना जाता था। किसानों को रास्ते में लुटने का डर भी रहता था। इसके बावजूद किसान अपनी गन्ने की फसल लेकर कारखाने पहुंचते थे।
मशीन खराब होने से रुका उत्पादन
साल 2008 में कारखाने की एक मशीन में खराबी आ गई थी। इससे कारखाने का उत्पादन पूरी तरह रुक गया था। बाद में मशीन को सुधारने की कोशिश की गई थी।
कुछ दिन चलने के बाद वह फिर से खराब हो गई। इसके बाद मशीन को दोबारा ठीक नहीं किया जा सका। आखिरकार साल 2011 में कारखाना स्थायी रूप से बंद हो गया।
मुरैना में चार कारखानों की जरूरत
ऑल इंडिया शुगर फेडरेशन ने अपनी एक रिपोर्ट में बड़ा दावा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक मुरैना जिले में कैलारस जैसे 4 कारखानों की जरूरत है। इसकी वजह यहां पानी की पर्याप्त उपलब्धता बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार जिले में नहरें भी पहले से बनी हुई हैं। बिजली की सुविधा भी पर्याप्त मौजूद है। यहां की मिट्टी गन्ना उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त मानी गई है। इसके बावजूद कारखाने को दोबारा शुरू नहीं किया जा रहा है।
260 बीघा जमीन का हो सकता है बंटवारा
कारखाना चालू संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने जमीन का पूरा हिसाब बताया है। कारखाने की 100 बीघा जमीन लीलहर का पुरा गांव में है। यह जमीन राजस्व विभाग को सौंपी जा चुकी है।
कारखाना परिसर की 50 बीघा से ज्यादा जमीन एमएसएमई विभाग को दी गई है। इसके अलावा 60 बीघा जमीन भी राजस्व विभाग को सौंपी गई है। अब दोनों विभाग इस जमीन पर प्लॉटिंग कर सकते हैं।
पांच साल से चल रहा है संघर्ष
पिछले पांच साल से किसान और कारखाने के शेयर होल्डर लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इस लड़ाई में जौरा के कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय भी उनके साथ रहे हैं। दो दिन पहले भी कारखाना परिसर में टेंट लगाकर विरोध प्रदर्शन किया गया था। किसानों की मांग है कि कारखाने को दोबारा चालू किया जाए।
किसान नेता का आरोप
मध्यप्रदेश किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक तिवारी ने इस पूरे मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि कारखाना बंद करने के पीछे कुछ राजनैतिक लोगों का हाथ है। उनके मुताबिक ये लोग जमीन को खुर्दबुर्द करना चाहते हैं। तिवारी ने कहा कि यह जमीन सहकारिता विभाग की है। उनका आरोप है कि इसे नियम विरुद्ध तरीके से एमएसएमई और राजस्व विभाग को सौंप दिया गया।
FAQ
- कैलारस शक्कर कारखाने की जमीन किसे सौंपी गई है?
कैलारस शक्कर कारखाने की जमीन लघु एवं सूक्ष्म उद्योग विभाग यानी एमएसएमई को सौंपी गई है। इसके साथ ही कारखाने का पंजीयन नंबर भी खत्म कर दिया गया है। - कैलारस शक्कर कारखाना कब और कैसे बंद हुआ था?
साल 2008 में कारखाने की मशीन खराब होने से उत्पादन रुक गया था। मरम्मत के बाद भी मशीन ठीक से नहीं चली। आखिरकार साल 2011 में कारखाना स्थायी रूप से बंद हो गया। - कारखाना चालू करने को लेकर किन नेताओं ने घोषणाएं की थीं?
मुख्यमंत्री मोहन यादव 6 बार और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 2 बार इसे चालू करने की घोषणा कर चुके हैं। कृषि मंत्री ऐंदल सिंह कंसाना ने भी किसानों को एक करोड़ रुपए देने की बात कही थी।
ये खबरें भी पढ़िए...
एमपी के पीथमपुर में चीनी कंपनी करेगी करोड़ों का निवेश, रोजगार के खुलेंगे रास्ते
एमपी पुलिस की सुस्ती पर सीएम मोहन सख्त, 11 हजार से ज्यादा लोगों ने की शिकायत
एमपी में 213 शिक्षकों का अटैचमेंट खत्म, स्कूल छोड़कर दफ्तरों में कर रहे थे काम
भोपाल नगरीय प्रशासन में अफसरों से ज्यादा कंसल्टेंट, हर महीने खर्च हो रहे करोड़ों