कमलनाथ कॉलेज को एमपी हाईकोर्ट से बड़ा झटका, घोस्ट कॉलेज के आरोपों के बीच याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की कॉलेज की याचिका?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने भोपाल के कमलनाथ कॉलेज और इसका संचालन करने वाली अरेरा एजुकेशन सोसाइटी की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल ने आदेश दिया। यह आदेश 14 अक्टूबर 2026 को जारी हुआ। कोर्ट ने राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद के अधिकार स्पष्ट किए। परिषद शिक्षक शिक्षा संस्थानों की मान्यता की निगरानी करती है। संस्थानों में तय मानकों का पालन भी जांचती है। परिषद को यह अधिकार कानून के तहत मिला है।
कॉलेज ने NCTE के कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी थी। इसके अलावा शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए बीपीएड (B.P.Ed.) पाठ्यक्रम के प्रवेश और काउंसिलिंग पोर्टल से नाम हटाए जाने को भी चुनौती दी थी। कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। हालांकि, इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि कॉलेज की मान्यता रद्द करने का अंतिम फैसला हो चुका है।
निरीक्षण में मिलीं कई कमियां
NCTE के निरीक्षण दल ने 17 और 18 जुलाई 2026 को कॉलेज का निरीक्षण किया था। रिपोर्ट में प्रयोगशालाओं में पर्याप्त उपकरण नहीं होने, जिम और खेल सुविधाओं के संचालित नहीं होने तथा कैंटीन बंद होने जैसी कमियां दर्ज की गईं। इसके अलावा पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं और दिव्यांगजनों के लिए अलग सुविधाओं का अभाव भी बताया गया।
निरीक्षण के दौरान कॉलेज में केवल दो छात्राएं मौजूद होने का उल्लेख भी रिपोर्ट में किया गया। तथ्य-अन्वेषण समिति ने यह भी टिप्पणी की कि एक ही प्रबंध समिति के अधीन संचालित कई संस्थान एक ही भवन में और समान खसरा नंबरों पर संचालित हो रहे थे।
NCTE की ओर से पेश किए गए जवाब में इसे गंभीर मामला बताया गया। प्रतिवादियों ने कॉलेज की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे कथित ‘घोस्ट कॉलेज’ का मामला भी बताया। यह आरोप प्रतिवादियों के पक्ष का हिस्सा था। इसे मान्यता रद्द करने से जुड़ा अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
बिना पर्याप्त सूचना निरीक्षण, रिपोर्ट भी नहीं दी
अरेरा एजुकेशन सोसाइटी और कमलनाथ कॉलेज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज कुमार शर्मा ने दलील दी कि निरीक्षण से पहले पर्याप्त सूचना नहीं दी गई थी। कॉलेज के अनुसार, 17 जुलाई को होने वाले निरीक्षण की जानकारी एक दिन पहले शाम को मोबाइल के जरिए दी गई थी।याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध कराए बिना उसमें दर्ज कमियों के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया।
कॉलेज का दावा था कि उसने एंडोमेंट और रिजर्व फंड के लिए नवीनीकृत फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें प्रस्तुत की थीं। साथ ही 10 अगस्त को विस्तृत जवाब देकर कमियां दूर करने की जानकारी भी दी थी। कॉलेज ने यह भी तर्क दिया कि उसकी संबद्धता जारी रखने की सिफारिश विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद और कार्य परिषद ने की थी। इसके बावजूद काउंसिलिंग पोर्टल से नाम हटने के कारण शैक्षणिक सत्र 2026-27 में प्रवेश प्रभावित हो रहे हैं।
मान्यता और विश्वविद्यालय की संबद्धता अलग-अलग
NCTE की पश्चिमी क्षेत्रीय समिति की ओर से कॉलेज की दलीलों का विरोध किया गया। प्रतिवादियों ने कहा कि विश्वविद्यालय से संबद्धता मिलना और NCTE की मान्यता जारी रहना दो अलग-अलग वैधानिक प्रक्रियाएं हैं।
विश्वविद्यालय की सिफारिश NCTE के नियामक अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकती। NCTE अधिनियम की धारा 12 और 17 के तहत परिषद को शिक्षक शिक्षा संस्थानों के मानकों की निगरानी करने और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई शुरू करने का अधिकार है। प्रतिवादियों के अनुसार, तथ्य-अन्वेषण दल ने केवल भौतिक सत्यापन करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।
मान्यता से संबंधित कार्रवाई शुरू करने का निर्णय सक्षम प्राधिकारी यानी पश्चिमी क्षेत्रीय समिति ने लिया। समिति ने कॉलेज के जवाब पर भी विचार किया था। इसके बाद 25 सितंबर को एक और कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसके जरिए कॉलेज को स्पष्टीकरण और सहायक दस्तावेज देने का अवसर दिया गया।
काउंसिलिंग पोर्टल से नाम हटाने के मामले में कोर्ट ने क्या कहा?
कॉलेज ने काउंसिलिंग पोर्टल से नाम हटाने को भी चुनौती दी थी। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्रीकृत काउंसिलिंग पोर्टल मध्य प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा संचालित किया जाता है। विश्वविद्यालय के पास इस पोर्टल पर किसी कॉलेज का नाम जोड़ने, हटाने या दोबारा शामिल करने का अधिकार नहीं है।
इसलिए विश्वविद्यालय की ओर से संबद्धता जारी रखने की सिफारिश के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि NCTE की मान्यता से जुड़ी कार्रवाई बेअसर हो जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि 9 जुलाई की अकादमिक परिषद और 15 जुलाई की कार्य परिषद की सिफारिशें बाद में हुए निरीक्षण और NCTE की नियामक शक्तियों से ऊपर नहीं हो सकतीं। इस तरह कोर्ट ने पोर्टल संबंधी विवाद में विश्वविद्यालय की भूमिका और NCTE के अधिकार क्षेत्र के बीच अंतर स्पष्ट किया।
नोटिस के खिलाफ कोर्ट का हस्तक्षेप क्यों नहीं?
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का उल्लेख किया। इनमें यूनियन ऑफ इंडिया बनाम कुनिसेट्टी सत्यनारायण और द स्टेट ऑफ झारखंड बनाम रुक्मा केश मिश्रा शामिल हैं। इन फैसलों के सिद्धांतों के अनुसार, सामान्यतः केवल कारण बताओ नोटिस के खिलाफ रिट याचिका दायर करना समय से पहले की गई कार्रवाई माना जाता है।
अदालत ऐसे मामलों में तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब असाधारण परिस्थितियां मौजूद हों। उदाहरण के लिए, नोटिस जारी करने वाले प्राधिकरण के पास कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं हो या कार्रवाई स्पष्ट रूप से अवैध हो।
इस मामले में NCTE की वैधानिक कार्यवाही अभी जारी थी। कॉलेज को अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया गया था। कोर्ट ने माना कि निरीक्षण में सामने आई कमियों और दस्तावेजों से जुड़े विवादों की जांच सक्षम प्राधिकरण को करनी है। हाईकोर्ट इस चरण पर अपीलीय मंच की तरह निरीक्षण रिपोर्ट का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकता।