सरकारी नौकरी छोड़ी, बांस के खेत को बनाया टूरिस्ट स्पॉट, कमा रहे इतना...

Sandeep Kumar | Jun 28, 2026, 18:56 IST
बांस के खेत को बनाया टूरिस्ट स्पॉट
मध्यप्रदेश के नीमच के किसान कमलाशंकर ने दिल्ली की सरकारी नौकरी छोड़ बांस की खेती शुरू की। बांस के खेत को टूरिस्ट और शूटिंग स्पॉट बनाया। 50 रु टिकट, 2100 में फोटोशूट। सालाना 7-8 लाख का मुनाफा।

समझें क्या है पूरा मामला

  • किसान ने सरकारी नौकरी छोड़ बांस खेती शुरू की।
  • एक हेक्टेयर खेत को टूरिस्ट स्पॉट बनाया।
  • खेत में घूमने का टिकट 50 रुपए है।
  • प्री वेडिंग शूट के लिए 2100 रुपए लिए जाते हैं।
  • सालाना 7 से 8 लाख रुपए की कमाई हो रही है।

नौकरी छोड़ी, गांव की राह पकड़ी

कोरोना काल में बहुत लोगों ने नौकरी गंवाई। लेकिन कमलाशंकर ने अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ी। वे दिल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में सलाहकार के पद पर काम कर रहे थे।



कुछ नया करने की चाह उन्हें वापस अपने गांव ले आई। नीमच जिले की मनासा तहसील के भाटखेड़ी गाँव में उन्होंने एक हेक्टेयर जमीन पर बांस की खेती शुरू की।



दो फसलों से कमाया पहला मुनाफा

कमलाशंकर ने बांस के पौधों के बीच जानबूझकर जगह छोड़ी। पहले दो साल उन्होंने उस जगह में अश्वगंधा लगाई। फिर शतावरी की खेती की। इस नवाचार से उन्होंने शुरुआत में ही लाखों रुपए का मुनाफा कमाया। यह तरीका कम जमीन से ज्यादा कमाई का साबित हुआ।



खेत को बना दिया टूरिस्ट स्पॉट

जैसे-जैसे बांस बड़े हुए, खेत की रौनक बढ़ती गई। बांस के घने झुरमुट और हरियाली ने इस जगह को बेहद खूबसूरत बना दिया। आसपास के लोग यहां घूमने आने लगे। कमलाशंकर ने मौके को भाँपा और इसे व्यवस्थित कर दिया।



तीन तरह से होती है कमाई

खेत के बाहर बैनर लगा है। आम दर्शकों से 50 रुपए टिकट लिया जाता है। फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए 2100 रुपए शुल्क है। यहां मैटरनिटी शूट, प्री वेडिंग शूट और पारिवारिक फोटो सेशन होते हैं। इस तरह बांस की बिक्री, शतावरी और फोटोशूट तीनों से अलग-अलग कमाई होती है। कुल मिलाकर सालाना 7 से 8 लाख रुपए का मुनाफा होता है।



प्रकृति का भी रखा ख्याल

यह खेत सिर्फ कमाई का जरिया नहीं है। यहाँ करीब 30 से 40 प्रकार की औषधीय प्रजातियों का संरक्षण भी किया जा रहा है।


25 से 30 प्रजातियों के पक्षी यहां देखे जा सकते हैं। 10 से 12 प्रकार की बड़ी तितलियाँ भी यहाँ आती हैं। यह जगह एक छोटे जैव विविधता केंद्र जैसी बन गई है।



टिकट का पैसा जाता है खेत की देखभाल में

टिकट और शूट से जो पैसा मिलता है, कमलाशंकर उसे खेत के रख-रखाव में लगाते हैं। औषधीय पौधे खरीदने और उन्हें संरक्षित करने में भी यही पैसा काम आता है।



तीन बड़े पुरस्कार मिले

कमलाशंकर के काम को सरकार और संस्थाओं ने पहचाना। 2025 में ग्वालियर के राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने उन्हें 'कृषक फैलो सम्मान 2024' दिया। यह सम्मान कृषि वानिकी और पर्यावरण पर्यटन में नवाचार के लिए था। इसी साल इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉइल (IIS – Indian Institute of Soil) और अंतरराष्ट्रीय संस्था सॉलिडरिडाड ने उन्हें 'प्रो. रतनलाल अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन रिजनरेटिव एग्रीकल्चर 2025' से सम्मानित किया।



2026 में मिला तीसरा सम्मान

2026 में उज्जैन में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें 'अनसंग एवरीडे हीरोज़ अवॉर्ड' से नवाजा गया। यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है जो बिना चर्चा के समाज के लिए बड़ा काम करते हैं।



खेती घाटे का सौदा नहीं

कमलाशंकर की यह कहानी उन लाखों युवाओं के लिए एक मिसाल है जो गांव छोड़कर शहर की तरफ भागते हैं। एक सोची-समझी रणनीति से खेती को भी मुनाफे का काम बनाया जा सकता है। बांस की खेती, उसके बीच औषधीय पौधे और फिर उसे टूरिस्ट स्पॉट बनाना यह तीन परतों वाला मॉडल आज मध्यप्रदेश में चर्चा का विषय है।



ये भी पढ़ें...

1187 केंद्रों पर एक साथ हुई वनपाल भर्ती परीक्षा, 75.48% रही उपस्थिति



पत्नी ने डाली पोस्ट और आ गया ट्रांसफर आदेश, DSP संतोष पटेल बने ACP भोपाल



रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह के घर पर चोरी, ट्विशा शर्मा केस पर जेल में है बंद



MP प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा की मेरिट रिवाइज में अब लगी रिट अपील





Tags:
  • मध्यप्रदेश
  • नीमच
  • ग्वालियर
  • राजमाता विजयाराजे सिंधिया
  • कोरोना काल