कटनी कोर्ट की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट नाराज , बिना जांच पटवारी पर FIR, ऐसे आदेश न्याय नहीं, लापरवाही
News in Short
- JMFC कोर्ट ने बिना पर्याप्त जांच FIR दर्ज करने का दिया आदेश
- 2018 की घटना में 2021 में नियुक्त पटवारी को बना दिया आरोपी
- हाईकोर्ट ने कहा “जुडिशियल माइंड का नहीं हुआ उपयोग”
- आदेश को बताया “मैकेनिकल” और लापरवाहीपूर्ण
- पटवारी के खिलाफ FIR और कार्यवाही निरस्त
Intro
बेगुनाहों को इंसाफ दिलाने का जिम्मा जिस कोर्ट पर हो अगर वही बेगुनाहों को सजा दिलाने लगे तो इससे ज्यादा हैरानी की बात क्या होगी। एक ऐसे ही मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कटनी की निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने पाया कि बिना तथ्यों की जांच किए एक महिला पटवारी के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दे दिया गया। हाईकोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए कड़ी टिप्पणियां की है।
News in detail
पुलिस की झूठी कार्यवाही जैसे मामले तो कोर्ट में सामने आते ही रहते हैं। लेकिन बेगुनाहों को परेशान करने में कोर्ट भी पीछे नहीं है। अब इसे मामलों का बोझ कहें या अनदेखी, लेकिन कटनी कोर्ट ने नौकरी ज्वाइन करने के 3 साल पहले ही एक पटवारी को आरोपी बनाकर उसके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के आदेश दे दिए। जबलपुर हाईकोर्ट ने इस हैरान करने वाले मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
कोर्ट ने कटनी जिले की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) कोर्ट की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि बिना तथ्यों की जांच और बिना प्रथम दृष्टया साक्ष्य देखे किसी के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देना न्यायिक जिम्मेदारी के विपरीत है। कोर्ट ने इसे “जुडिशियल माइंड” के अभाव का उदाहरण बताया।
नौकरी ज्वाइन करने के 3 साल पहले ही बना दिया आरोपी
मामला स्लीमनाबाद क्षेत्र के ग्राम भेड़ा टेक की भूमि के सीमांकन से जुड़ा है, जहां वर्ष 2018 में एक विवादित सीमांकन रिपोर्ट तैयार की गई थी। आरोप है कि इस रिपोर्ट में मृत व्यक्ति को जीवित दिखाकर कार्रवाई की गई। इसी मामले में JMFC कोर्ट ने धारा 156(3) CrPC के तहत FIR दर्ज करने का आदेश दिया, जिसमें एक महिला पटवारी को भी आरोपी बना दिया गया, जबकि उसकी नियुक्ति वर्ष 2021 में हुई थी। यानी घटना के समय वह सरकारी सेवा में थी ही नहीं।
बिना भूमिका, बिना साक्ष्य दिया FIR के आदेश
हाईकोर्ट की सुनवाई में यह सामने आया कि महिला पटवारी के हस्ताक्षर किसी भी विवादित दस्तावेज में नहीं हैं। न ही उसकी किसी प्रकार की संलिप्तता के प्रमाण हैं। इसके बावजूद उसे आरोपी बनाना न केवल तथ्यहीन था, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर अनदेखी भी थी।
हाईकोर्ट ने फैसले को बताया ‘मैकेनिकल ऑर्डर’
जस्टिस बीपी शर्मा की बेंच ने निचली अदालत के आदेश को “मैकेनिकल” करार देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने आदेश पारित करते समय विवेकपूर्ण विचार नहीं किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के आदेश न्याय की मूल भावना के खिलाफ हैं और इससे निर्दोष लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़ता है।
FIR निरस्त, लेकिन बड़ा संदेश छोड़ गया फैसला
हाई कोर्ट ने धारा 482 CrPC के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए महिला पटवारी के खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट का यह फैसला केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निचली अदालतों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि हर आदेश तथ्यों और कानून के ठोस आधार पर ही पारित किया जाना चाहिए।
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