केन बेतवा बांध: MP में विस्थापन का असली सच, घर टूटा, नाम नहीं जुड़ा फिर क्या होगा
पन्ना के जंगलों में पहली बार एक अलग तरह की आवाज सुनाई दी। हाइड्रोलिक ब्रेकर की चोट। बुलडोजर की गड़गड़ाहट। जहां सदियों से सिर्फ पत्थर, नदी और पेड़ थे, वहां अब कंक्रीट और स्टील पहुंच गया है। यह देश के सबसे बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट में से एक है। नाम है केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट। लागत 44,605 करोड़ रुपए।
सोचिए एक बार। जिस घर में आपकी तीन पीढ़ियां रहीं, अचानक सरकारी सर्वे कहे कि वो घर कभी था ही नहीं। छतरपुर जिले के दौधन गांव में यही हो रहा है। मई 2026 में प्रशासन ने बुलडोजर भेजे। दर्जनों घर आधे कटे पड़े हैं। छत उखड़ी है, दीवारें बीच से चीरी गई हैं।
समझें क्या है मामला
केन और बेतवा नदी को जोड़ने की योजना 1980 के दशक में शुरू हुई थी। दिसंबर 2021 में केंद्र सरकार ने इसे मंजूरी दी। छतरपुर, पन्ना और आसपास के 10 गांवों के लगभग 2,000 परिवार इससे प्रभावित हैं। दौधन बांध के डूब क्षेत्र में करीब 9,000 हेक्टेयर जमीन आती है। मुआवजा और पुनर्वास पर सर्वे को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। जुलाई 2026 में इसी मुद्दे पर बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
अगर आप बुंदेलखंड से हैं, तो यह प्रोजेक्ट सीधे आपकी सिंचाई और पानी की सप्लाई से जुड़ा है। लेकिन अगर आप कहीं और भी बैठे हैं, तब भी यह सवाल आपका है। सरकार जब बड़ी योजना बनाती है, तो कागज पर आंकड़े कैसे लोगों की असली जिंदगी से टकराते हैं, यह उसकी एक झलक है। कल यह आपके शहर में सड़क, मेट्रो या फैक्ट्री के नाम पर भी हो सकता है।
पहले क्या था
नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी ने 1982 में इस प्रोजेक्ट को प्राथमिकता में रखा था। 1995 में फिजिबिलिटी रिपोर्ट आई। 2005 में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और केंद्र के बीच समझौता हुआ। मार्च 2021 में तीनों पक्षों ने औपचारिक करार किया। इसके नौ महीने बाद दिसंबर 2021 में कैबिनेट ने अंतिम मंजूरी दी। तभी से जमीन पर काम असल में शुरू हुआ।
क्या हुआ और क्यों
प्रोजेक्ट का केंद्र बिंदु है दौधन बांध। यह केन नदी पर बन रहा है और दो किलोमीटर से ज्यादा लंबा है। इसका जलाशय 2,853 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी रोकने के लिए बनाया गया है। इस पानी को 218.6 किलोमीटर लंबी नहर के जरिए बेतवा बेसिन तक पहुंचाया जाएगा।
लेकिन असल बात यह है कि पानी पहुंचने से पहले जमीन खाली करनी होगी। और यहीं से मामला पलटता है।
पर्यावरण मंत्रालय की शर्त साफ है। प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले पुनर्वास पूरा होना चाहिए। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि 1,913 परिवार, यानी करीब 8,339 लोग, इससे सीधे प्रभावित हैं। इनमें से करीब एक तिहाई आदिवासी समुदाय से आते हैं।
छतरपुर के दौधन गांव के नंदकिशोर आदिवासी की कहानी इसे समझाने के लिए काफी है। उनका परिवार पुनर्वास कॉलोनी में शिफ्ट हो चुका है। लेकिन वो खुद रुके हैं, क्योंकि सर्वे में उनकी मां का नाम ही दर्ज नहीं हुआ। "मैं जाना चाहता हूं, लेकिन मां का मुआवजा मिले बिना नहीं," वे कहते हैं।
एक बार सोचिए। बिजली नहीं, पानी नहीं, फिर भी वे रुके हैं। सिर्फ एक कागजी नाम के लिए।
फूल चंद की बेटी का नाम भी सर्वे से छूट गया। मन्नू यादव के पास सिर्फ आधार कार्ड है यह साबित करने के लिए कि वे वहां मौजूद हैं। सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम नहीं है।
क्या यह सिर्फ प्रशासनिक चूक है, या सिस्टम की बड़ी खामी? यही सवाल गांव-गांव में गूंज रहा है।
छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल का कहना है कि पहले चरण में करीब 380 परिवार शिफ्ट हो चुके हैं और 100 और परिवारों को लाभ दिया गया है। करीब 750 करोड़ रुपए मुआवजे में बांटे जा चुके हैं। उनके मुताबिक दौधन में सिर्फ 30 से 35 मामले अटके हैं, लेकिन वे सबसे जटिल हैं।
कौन कौन शामिल है
राज्य सरकार और जिला प्रशासन पुनर्वास और भूमि अधिग्रहण करा रहे हैं। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय प्रोजेक्ट की फंडिंग और निगरानी करता है। दौधन, पालखुआ और सुखवा गांवों के प्रभावित परिवार मुआवजे और सर्वे में सुधार मांग रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके हैं।
दोनों तरफ की बात
प्रशासन का पक्ष है कि हर घर की फोटो खींची गई, हर परिवार को ग्राम सभाओं में सूचित किया गया। कलेक्टर जायसवाल इसे सुनियोजित प्रक्रिया बताते हैं।
दूसरी तरफ ग्रामीणों का आरोप है कि पटवारी स्तर पर सर्वे में गड़बड़ी हुई। कुछ रिपोर्ट बताती हैं कि अमित भटनागर तीन जुलाई से भूख हड़ताल पर थे और 14 दिन बाद, 19 जुलाई की सुबह पांच बजे पुलिस ने कुपी गांव के पास बरना नदी किनारे से करीब 150 प्रदर्शनकारियों को हटाया गया। पुलिस अधिकारी का कहना था कि यह जगह निर्माणाधीन पुल के नीचे था और बढ़ते जलस्तर से खतरा था।
आगे क्या होगा
नदी मोड़ने का काम शुरू होते ही डूब क्षेत्र में बचे घरों को हटाना जरूरी होगा। प्रशासन का लक्ष्य है कि मानसून के बाद बचे 30 से 35 विवादित मामले सुलझा लिए जाएं। लेकिन सवाल यह है, क्या इतनी जल्दी में हर परिवार को न्याय मिल पाएगा?
एक बात जो आप नहीं जानते थे
मुआवजे का पैसा मिलना कहानी का अंत नहीं है, शुरुआत है। पुनर्वास कॉलोनी करोंडिया में पानी की सप्लाई नहीं है। लोग 5,000 लीटर पानी के टैंकर के लिए 500 रुपए देते हैं। जिस जमीन ने कभी मुफ्त में महुआ और तेंदूपत्ता दिया, वहां अब हर बूंद पानी खरीदनी पड़ रही है।
आज क्या हुआ: 22 गांवों में चूल्हाबंदी आंदोलन शुरू
छतरपुर में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के खिलाफ ग्रामीणों का विरोध प्रदर्शन उग्र रूप ले चुका है। कूपी गांव से प्रशासन द्वारा जबरन हटाए जाने के बाद अब 22 प्रभावित गांवों के लोगों ने चूल्हाबंदी आंदोलन का रास्ता अपनाया है। जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर का आमरण अनशन 17वें दिन भी जारी रहा, जिसके चलते गंभीर हालत में वे आईसीयू में भर्ती हैं। भारी बारिश और बिगड़ती सेहत के बीच पुलिस ने पहले चल रहे चिता आंदोलन को समाप्त कराया था।
इन गांवं के लोगों ने अब चूल्हाबंदी आंदोलन चालू कर दिया है। लोगों ने कहां कि अब वे घर में चूल्हा नहीं जलाएंगे।
मध्य प्रदेश कनेक्शन
यह प्रोजेक्ट पूरी तरह मध्य प्रदेश की कहानी है। छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह, विदिशा, सागर, शिवपुरी, दतिया और रायसेन जिलों को सीधा फायदा और नुकसान, दोनों झेलने हैं। दौधन बांध पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर बन रहा है, जिससे रिजर्व के कोर एरिया की करीब 4,141 हेक्टेयर जमीन भी डूब क्षेत्र में आती है। यह सिर्फ एक बांध की खबर नहीं, बुंदेलखंड के भविष्य की खबर है।
- अब आप क्या करें: अगर आप बुंदेलखंड क्षेत्र से हैं तो अपने गांव का सर्वे रिकॉर्ड जरूर चेक कराएं।
- क्यों अभी: नदी मोड़ने का काम शुरू होते ही डूब क्षेत्र खाली कराया जाएगा।
- आगे देखें: मानसून के बाद बचे विवादित मामलों का निपटारा।
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