केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट : प्रशासन के आश्वासन पर किसानों का उग्र आंदोलन 10 दिन के लिए टला
बुंदेलखंड की धरती पर केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को लेकर पिछले 12 दिनों से जो घमासान मचा था, उस पर फिलहाल 'अल्पविराम' लग गया है। छतरपुर में अपनी जमीन और हक की लड़ाई लड़ रहे किसानों ने प्रशासन के ठोस आश्वासन के बाद अपना आंदोलन 10 दिनों के लिए स्थगित कर दिया है। यह फैसला प्रशासन और किसान नेताओं के बीच हुई मैराथन चर्चा के बाद लिया गया।
आंदोलन में हुई अहम बातचीत
आंदोलन को 10 दिन के लिए स्थगित किया गया है। यह फैसला प्रशासन द्वारा कुछ अहम आश्वासनों के बाद लिया गया। जिला प्रशासन ने डिप्टी कलेक्टर और तहसीलदार स्तर के अधिकारियों के माध्यम से एक सप्ताह के भीतर नए सर्वे कराने का आश्वासन दिया। इस सर्वे में सभी प्रभावित व्यक्तियों को शामिल किया जाएगा, जिनका नाम पहले छुट गया था।
मुख्य मांगों पर बनी सहमति
आंदोलन के दौरान जो प्रमुख मांगें उठाई गई थीं, उन पर सहमति बन गई है। इनमें शामिल हैं:
- गांव बदलने का आश्वासन: प्रभावित गांवों को नए स्थानों पर बसाने का प्रस्ताव।
- मुआवजा बढ़ाने की सहमति: किसानों और प्रभावित परिवारों को मिलने वाले मुआवजे को बढ़ाया जाएगा।
- कटऑफ डेट: 1 अप्रैल 2026 तक मुआवजा प्राप्त करने की अंतिम तिथि तय की गई है।
जिला कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने इन सभी मांगों पर शीघ्र कार्यवाही करने का आदेश जारी किया है और सर्वे शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं।
गांव के बदले गांव और मुआवजे पर बनी सहमति
किसानों की सबसे बड़ी मांग 'गांव के बदले गांव' बसाने की थी। इसके साथ ही विशेष पैकेज और मुआवजा राशि बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। सरकार अब 1 अप्रैल 2026 को कटऑफ डेट मानकर मुआवजे की फाइल तैयार करेगी। जो मुद्दे जिला स्तर के थे, उन पर कलेक्टर ने तुरंत आदेश जारी कर एसडीएम को काम पर लगा दिया है। बाकी मांगों के लिए राज्य और केंद्र सरकार से बातचीत की जाएगी।
केन नदी की कसम और महाआंदोलन की चेतावनी
आंदोलन समाप्त होने के बाद, आंदोलनकारियों ने केन नदी में उतरकर संकल्प लिया कि वे जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकारों पर किसी भी प्रकार के अन्याय को स्वीकार नहीं करेंगे। किसान नेताओं ने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने झूठे आश्वासन दिए तो आंदोलन और भी व्यापक और उग्र रूप में होगा।
नदी का महत्व
केन नदी स्थानीय लोगों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। आंदोलन समाप्त करने के बाद, हजारों किसानों ने नदी में उतरकर संकल्प लिया कि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार की उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह नदी उनके लिए जीवनदायिनी है और इसके संरक्षण के लिए वे पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
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