बुंदेलखंड की ‘लाइफलाइन’ पर ब्रेक : केन–मंदाकिनी लिंक को मंजूरी से पहले पानी के बंटवारे ने अटकाया मामला

Ramanand Tiwari | Apr 12, 2026, 21:07 IST
Photograph: (the sootr)
केन-मंदाकिनी लिंक प्रोजेक्ट, जो बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए जीवनरेखा है, पानी के आंकड़ों की असहमति के कारण अटका है। दोनों राज्य इस प्रोजेक्ट को लेकर सहमत हैं, लेकिन पानी के बंटवारे पर मतभेद हैं।

चित्रकूट की मंदाकिनी को सालभर बहता देखने का सपना अभी अधूरा है। केन–मंदाकिनी लिंक प्रोजेक्ट में सबसे बड़ा रोड़ा तकनीकी नहीं, बल्कि राज्यों के बीच पानी के आंकड़ों की असहमति बन गया है। इसी वजह से मंजूरी की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही।



मामला सिर्फ देरी का नहीं, समीकरण का है

यह प्रोजेक्ट अब सिर्फ ‘लेट’ नहीं, बल्कि ‘कन्फ्यूज’ हो चुका है। उत्तर प्रदेश की पानी की जरूरत का डेटा तय न होने से पूरी योजना का बेस ही क्लियर नहीं है।



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कागज पर सहमति, जमीन पर असहमति

दोनों राज्यों ने सिद्धांत रूप में प्रोजेक्ट को सही माना है। लेकिन जब बारी आई पानी के बंटवारे और हिस्सेदारी तय करने की, तो मामला अटक गया।



मप्र कर रहा लगातार फॉलोअप

मप्र सरकार इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर मंत्री स्तर तक यूपी को कई बार पत्र भेजे जा चुके हैं।



मीटिंग तक नहीं पहुंचा मामला

ईएनसी स्तर की बैठक का प्रस्ताव भी दिया गया। लेकिन अब तक दोनों राज्यों के बीच कोई ठोस चर्चा तय नहीं हो पाई।



असल विवाद कहां है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि पानी आएगा कहां से। क्या यह केन-बेतवा प्रोजेक्ट के हिस्से से कटेगा या अलग से दिया जाएगा—यही पेच है।



मंदाकिनी पुनर्जीवन बनाम पानी का कोटा

मप्र इसे नदी पुनर्जीवन की अलग योजना मान रहा है। वहीं यूपी इसे अपने हिस्से के पानी से जुड़ा मामला मानकर सतर्क है।



प्रोजेक्ट के फायदे: क्यों जरूरी है यह लिंक

  • मंदाकिनी नदी सालभर बहती रहेगी
  • चित्रकूट में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा
  • स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर बनेंगे
  • इन्फ्रास्ट्रक्चर और सिंचाई का बड़ा प्लान
  • 110 किमी लंबी नहर: पन्ना से सतना तक
  • 82,000 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई
  • 25 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन की संभावना

तकनीकी रूपरेखा एक नजर में

  • 250 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी डायवर्ट होगा
  • एमपी और यूपी दोनों देंगे 125-125 एमसीएम पानी
  • लेकिन यह आंकड़ा अभी कागज पर ही सीमित है

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विशेषज्ञों की राय: प्रोजेक्ट सही, प्रक्रिया धीमी

आईआईटी रुड़की और जेएनयू जैसे संस्थानों के विशेषज्ञ इसे उपयोगी मान चुके हैं। लेकिन तकनीकी सहमति के बावजूद प्रशासनिक स्पष्टता की कमी दिख रही है।



आगे क्या?

जब तक पानी के बंटवारे पर स्पष्ट फॉर्मूला तय नहीं होता, तब तक यह प्रोजेक्ट ‘प्लान’ से आगे बढ़कर ‘ग्राउंड’ पर नहीं आ पाएगा।



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