बिजली चोरी पकड़ने के लिए और कितने अफसर चाहिए? मध्य प्रदेश की बिजली कंपनियों की 'द सूत्र' ने की पड़ताल

Atul Tiwari | Oct 15, 2026, 18:18 IST
मध्य प्रदेश की बिजली कंपनियों के विजिलेंस सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं।
मध्य प्रदेश की बिजली कंपनियों के विजिलेंस सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं। आम उपभोक्ता की कम खपत पर जांच होती है। दूसरी ओर जय विलास पैलेस के कुछ कनेक्शनों में बेहद कम बिल दर्ज हैं। 'द सूत्र' की पड़ताल में अफसरों की जिम्मेदारी, स्टाफ की कमी और जांच की अनुमति से जुड़े सवाल सामने आए हैं।

ग्वालियर के जय विलास पैलेस का मामला

यह कहानी शुरू होती है भोपाल से। संतोष शुक्ला (परिवर्तित नाम) सादगी से रहते हैं। घर में बिजली की खपत कम है, इसलिए हर महीने 100 यूनिट या इससे कम बिजली खर्च होती है, लेकिन बिजली की इतनी कम खपत भी विजिलेंस टीम के लिए संदेह की वजह बन जाती है। टीम उनके घर पहुंचती है, जांच करती है और पता चलता है कि परिवार अपनी जरूरत के हिसाब से ही बिजली खर्च कर रहा है।



आप सोचेंगे कि बिजली कंपनी की विजिलेंस टीम कितनी मुस्तैद है। कम खपत दिखी नहीं कि जांच शुरू, लेकिन जरा ग्वालियर के जय विलास पैलेस का मामला देखिए। ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीब 400 कमरों वाले इस महल में होटल उषा को छोड़कर 21 बिजली कनेक्शन हैं।



किसी कनेक्शन का बिल महज 10 रुपए 29 पैसे है, तो किसी में 12 महीने की खपत शून्य दर्ज हुई ​है। इतने बड़े परिसर के बिजली बिलों पर सवाल उठते हैं, लेकिन विजिलेंस टीम की जांच का मामला अलग ही कहानी बयां करता है। जिम्मेदार अधिकारी कहते हैं कि विभाग से प्राथमिकता के आधार पर जिन कनेक्शनों की जानकारी मिलती है, वे उन्हीं की जांच करते हैं।



तीनों बिजली वितरण कंपनियों के विजिलेंस तंत्र की पड़ताल

आम उपभोक्ता की कम खपत पर जांच, लेकिन बड़े परिसर के असामान्य आंकड़ों पर कार्रवाई का इंतजार। यही विरोधाभास मध्यप्रदेश की बिजली कंपनियों की विजिलेंस व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। 'द सूत्र' ने मध्य क्षेत्र, पश्चिम क्षेत्र और पूर्व क्षेत्र की तीनों बिजली वितरण कंपनियों के विजिलेंस तंत्र की पड़ताल की है।



इसमें सामने आया कि मध्य क्षेत्र के 55 डिवीजन में करीब 275 कर्मचारियों की टीम के हिसाब से हर महीने लगभग 7 करोड़ 37 लाख रुपए खर्च होने का अनुमान है। इसके बावजूद कहीं अधिकारी जांच की अनुमति का इंतजार कर रहे हैं तो कहीं आउटसोर्स कर्मचारियों के पास कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। आखिर बिजली चोरी पकड़ने के लिए तैनात इस तंत्र की प्राथमिकता क्या है? सरकारी खजाने से करोड़ों खर्च होने के बाद भी जांच और कार्रवाई के बीच इतनी दूरी क्यों है?



मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड

मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड ( Central Zone Electricity Distribution Company Limited) मुख्य तौर पर मध्य क्षेत्र, जिसमें भोपाल, नर्मदापुरम, ग्वालियर और चंबल संभाग में बिजली आपूर्ति करती है। हमारी पड़ताल में पता चला कि कंपनी में कुल 55 डिविजन हैं। हर एक डिवीजन में एक इंजीनियर होता है। एक असिस्टेंट इंजीनियर होता है। साथ ही 2 जूनियर इंजीनियर होते हैं। इसके साथ ही लाइन मैन भी टीम में होते हैं।



इन सभी का काम अपने डिवीजन में होने वाली बिजली चोरी को रोकना है। ग्वालियर में मौजूद सिंधिया के जय विलास पैलेस पर बिजली कंपनी की जो मेहरबानी है, वो यही बिजली कंपनी है। ग्वालियर में बिजली आपूर्ति का जिम्मा मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के पास ही है। द सूत्र की पड़ताल में पता चला कि जिले में विजिलेंस के कुल 3 बड़े अधिकारी हैं।



सबसे बड़े अधिकारी हैं आरके अग्रवाल, जो उप मुख्य महाप्रबंधक सतर्कता के पद पर हैं। दूसरे अधिकारी हैं मुकेश कुमार बंसल जिनका पद उप महाप्रबंधक सतर्कता है। तीसरे अधिकारी हैं विनेश सिंह राठौड़, इनका पद प्रबंधक का है।



इसके अलावा ऑफिस में दूसरा स्टाफ है। जिसमें एक क्लर्क राजेंद्र शर्मा हैं, एक कीप पंच ऑपरेटर है, जो बाबू की मदद करता है। जब भी ये लोग कार्रवाई के लिए जाते हैं, तो उनके साथ चार आउटसोर्स कर्मचारियों का स्टाफ जाता है। उपमहाप्रबंधक मुकेश कुमार बंसल के मुताबिक हर महीने 250 केस बना लिए जाते हैं।



बिजली चोरी रोकने से झाड़ा पल्ला

द सूत्र ने जब कंपनी से बिजली चोरी पकड़ने के मामलों के जानकारी मांगी, तब कंपनी का कहना है कि बिजली चोरी पकड़ना आसान नहीं होता। जहां स्मार्ट मीटर लग चुके हैं, वहां थोड़ी आसानी होती है। जितने लोड का मीटर लगा है, खपत उससे कम है तो चोरी पकड़ी जा सकती है, वरना काम आसान नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि बिजली चोरी रोकना आसान काम नहीं है, तो फिर इन अफसरों को रखा ही क्यों है ? इन्हें रखा ही बिजली चोरी और गड़बड़ी को पकड़ने के लिए, इसी काम का तो ये पैसा लेते हैं, फिर लापरवाही क्यों ? सिस्टम में कहीं सुधार की गुंजाइश है, तो इसकी जानकारी भी तो इन्हीं लोगों को अपने सीनियर को देनी होगी।



जिम्मेदार क्या बोले ?

ग्वालियर जिले में मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के उप प्रबंधक मुकेश कुमार बंसल से भी द सूत्र ने बात की। उनका कहना है कि महल में जाने का हमें कभी मौका ही नहीं मिला। हमको जो विभाग की तरफ से प्रायोरिटी पर कनेक्शन नंबर दिए जाते हैं, हम उन्हें ही चेक कर पाते हैं। खबर छपने के बाद अब देखेंगे कि कौन चेक करता है, क्योंकि यह सीएस एस विद्युत जोन के अंतर्गत आता है। देखते हैं कि कौन चेक करता है, हमें आदेश मिलेगा तो हम करेंगे और अगर जोन के सहायक यंत्री को आदेश मिलेगा तो वो करेंगे।



पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड

पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड जबलपुर और रीवा संभाग में काम करती है। कंपनी के कुल चार रीजन हैं। जबलपुर, सागर, रीवा और शहडोल। कंपनी के कुल 21 सर्किल हैं। रही बात डिवीजन की तो कंपनी के कुल 60 डिवीजन हैं। जबकि सब डिवीजन की संख्या 125 है।



कितना स्टाफ मौजूद ?

द सूत्र की पड़ताल में पता चला कि पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के विजिलेंस विभाग में कुल 101 अधिकारी कर्मचारी हैं। इनमें मुख्य महाप्रबंधक के 3 अधिकारी हैं। अधीक्षण अभियंता भी 3 हैं। 21 अधिशासी अभियंता भी मौजूद हैं। ऐसे ही AE, JE और दूसरा लाइन स्टाफ मौजूद है। लेकिन फिर भी कंपनी कम कर्मचारी होने का रोना रो रही है। कंपनी दावा कर रही है कि नियमित कर्मचारियों की भारी कमी है। सारा काम आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है।



लेकिन एक मजे की बात तो ये है कि काम आउटसोर्स कर्मचारियों से लिया जा रहा है, लेकिन आउटसोर्स कर्मचारियों को बिजली चोरी के मामले में कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं है। आउटसोर्स कर्मचारियों के साथ जब तक नियमित पद पर मौजूद कोई अधिकारी नहीं होगा, कार्रवाई नहीं की जा सकती। यानी जब कार्रवाई का पंचनामा बनेगा ही नहीं, तो बिजली चोरी करने वालों के खिलाफ एक्शन कैसे होगा ?



पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड

पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड मुख्य रूप से इंदौर और उज्जैन क्षेत्र में बिजली सप्लाई करती है। कंपनी के कुल 15 सर्किल हैं। रही बात डिवीजन की तो टोटल 52 डिवीजन में बिजली आपूर्ति कंपनी कर रही है।



लाखों सैलरी पर खर्च, काम क्यों नहीं ?

एक इंजीनियर, उसके साथ एक असिस्टेंट इंजीनियर, साथ में 2 जूनियर इंजीनियर और औसतन एक लाइनमैन इन सभी की औसत सैलरी निकालें तो लगभग खर्च आता है 2 लाख 68 हजार। मध्य क्षेत्र कंपनी के 55 डिवीजन हैं। इनमें औसत अगर 275 अफसर हैं तो कुल खर्च आता है 7 करोड़ 37 लाख रुपए। यानी औसतन 275 कर्मचारियों पर सरकार 7 करोड़ 37 लाख रुपए खर्च कर रही है, फिर भी विजिलेंस की टीम और जिम्मेदार अधिकारी, ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि उन्हें चेकिंग करने की परमिशन ही नहीं है।

Tags:
  • ज्योतिरादित्य सिंधिया
  • जय विलास पैलेस
  • पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड
  • बिजली चोरी
  • द सूत्र
  • मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड
  • Central Zone Electricity Distribution Company Limited
  • बिजली कंपनी
  • मध्यप्रदेश की बिजली कंपनी