मध्यप्रदेश में RTI के हजारों आवेदन अटके, 10 हजार 350 लोगों को अब तक नहीं मिली जानकारी, सरकारी जवाबदेही पर सवाल
आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक जानकारी मिलती है, तब तक कई मामलों में शिकायत का महत्व ही खत्म हो जाता है। खासकर सरकारी निर्माण कार्यों, वन विभाग और जल संसाधन से जुड़े मामलों में देरी का असर ज्यादा दिखाई देता है।
पहले ही खत्म हो जाता है मामले का महत्व
आरटीआई के जरिए लोग सरकारी कामकाज, योजनाओं और खर्च से जुड़ी जानकारी मांगते हैं। लेकिन कई बार समय पर जवाब नहीं मिलने से उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कुछ सरकारी कार्यालय प्रक्रियाओं में कमी बताकर आवेदनों को आगे बढ़ाने में देरी करते हैं। हालांकि, हर लंबित आवेदन को जानबूझकर रोकी गई जानकारी या भ्रष्टाचार का मामला नहीं माना जा सकता। समस्या तब और बढ़ जाती है, जब जानकारी मिलने तक संबंधित परियोजना पूरी हो जाती है या जिम्मेदार अधिकारी का तबादला हो जाता है। ऐसे में शिकायत से जुड़े दस्तावेजों का महत्व कम हो सकता है। सवाल यह है कि जब जानकारी समय पर नहीं मिलेगी, तो आम नागरिक अपने अधिकारों का इस्तेमाल कैसे करेगा?
10 हजार 350 आवेदन लंबित
मिली जानकारी के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में प्रदेश के 55 जिला कार्यालयों में कुल 14 हजार 586 आरटीआई आवेदन दर्ज किए गए। इनमें से 3,953 आवेदनों का निराकरण हुआ, जबकि 283 आवेदन निरस्त किए गए। बाकी 10,350 आवेदन अभी भी लंबित हैं। इस हिसाब से करीब 71 प्रतिशत आवेदन अब तक निपटाए नहीं गए हैं। ये आंकड़े जिला कार्यालयों के हैं। सूचना आयोग में लंबित अपीलों की संख्या इससे अलग है। जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो इंदौर में कुल 1,129 आवेदन आए, जिनमें से 875 लंबित हैं। भोपाल में 1,167 आवेदनों में 797 का जवाब बाकी है। शिवपुरी में 226 में से 221 और सिंगरौली में 338 में से 327 आवेदन लंबित हैं। वहीं कटनी, दमोह, बुरहानपुर, डिंडौरी और झाबुआ में एक भी आवेदन के निराकरण की जानकारी दर्ज नहीं है। इन जिलों में क्रमशः 236, 210, 62, 37 और 23 आवेदन मिले थे।
कानून में 30 दिन की समय सीमा
आरटीआई कानून के तहत सामान्य तौर पर आवेदन मिलने के 30 दिनों के भीतर जानकारी देना जरूरी है। अगर जानकारी नहीं दी जा सकती, तो इसकी वजह बताते हुए आवेदन अस्वीकार करना होता है। समय पर जवाब नहीं मिलने पर आवेदक संबंधित विभाग के प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास शिकायत कर सकता है। वहां से भी राहत नहीं मिलने पर राज्य सूचना आयोग में दूसरी अपील की जा सकती है। लेकिन जब आवेदक को जानकारी के लिए लगातार अपील करनी पड़े और सुनवाई में भी लंबा समय लगे, तो इस कानून का उद्देश्य प्रभावित होता है।
आरटीआई कार्यकर्ताओं ने जताई चिंता
आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकारी अधिकारियों की लापरवाही के कारण आम लोगों को जानकारी पाने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। पहली और दूसरी अपील तक पहुंचने में लोगों का समय और मेहनत दोनों लगते हैं। पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने भी जानकारी मिलने में वर्षों तक इंतजार की समस्या पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि लोगों को समय पर सूचना मिले, इसके लिए व्यवस्था में सख्ती जरूरी है।
अधिकारियों पर 25 हजार तक जुर्माने का प्रावधान
सूचना का अधिकार कानून में लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई का भी प्रावधान है। अगर कोई अधिकारी बिना उचित कारण जानकारी देने में देरी करता है या गलत जानकारी देता है, तो सूचना आयोग उस पर जुर्माना लगा सकता है। कानून के अनुसार, अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपए के हिसाब से अधिकतम 25 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि, सिर्फ जुर्माने का नियम बना देने से समस्या हल नहीं होगी। जरूरी है कि नियमों का सही तरीके से पालन हो और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
सरकार से उठ रहे हैं ये सवाल
प्रदेश में हजारों आवेदन लंबित होने के बाद अब सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। सरकार और संबंधित विभागों को बताना चाहिए कि इतने आवेदन लंबे समय से क्यों अटके हुए हैं। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इनमें कितने आवेदन एक साल या उससे ज्यादा समय से लंबित हैं और देरी के लिए कौन जिम्मेदार है। इसके अलावा सूचना आयोग में लंबित अपीलों और अधिकारियों पर हुई कार्रवाई का पूरा ब्योरा भी सामने आना चाहिए। आरटीआई का मकसद सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना और आम लोगों को जानकारी देना है। लेकिन जब लोगों को समय पर जवाब ही नहीं मिलेगा, तो इस अधिकार का फायदा कैसे मिलेगा? असली Accountability यही है कि नागरिकों को तय समय में सही जानकारी मिले।